भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में खाद्य उत्पादों के दाम नियंत्रण में रहे हैं. लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद जो भी सरकार आएगी, उसे खाद्य महंगाई की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है. इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के मुताबिक बीते कुछ महीनों में खेती से जुड़ी चीजों के दाम बढ़े हैं, खास तौर पर पश्चिम और दक्षिण भारत में जहां व्यापक रूप से सूखे की मार पड़ी है.

रिपोर्ट की मानें तो शुक्रवार को कर्नाटक के दावनगेरे में मक्के का औसत दाम 2,010 रुपये प्रति क्विंटल रहा. जबकि पिछले साल यह 1,120 रुपये प्रति क्विंटल रहा था. वहीं, महाराष्ट्र के जलगांव और राजस्थान के चौमू में ज्वार और बाजरे की कीमत क्रमशः 2,750 रुपये और 1,900 रुपये प्रति क्विंटल रही. पिछले साल इन दोनों राज्यों में इनके दाम 1,600 और 1,100 रुपये (क्रमशः) प्रति क्विंटल रहे थे. कपास की पैदावार में भी कमी आई है. इस कारण पिछले साल गुजरात के राजकोट में 5,800 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत पर मिल रहा कपास, इस साल 5,250 रुपये प्रति क्विंटल पर मिल रहा है.

ऐसा नहीं है कि केवल अनाज और चारे के दाम बढ़े हैं. जानकार बताते हैं कि साल दर साल बागवानी उत्पादन की लागत भी 13-15 प्रतिशत बढ़ती रही है. रिपोर्ट के मुताबिक इसके चलते कर्नाटक के कोलार बाजार में टमाटर 2,000 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा है. एक साल पहले यह 580 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत पर मिल रहा था. उधर, महाराष्ट्र के लासलगांव में प्याज का दाम 655 रुपये से बढ़ कर 850 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है. इतना ही नहीं, भिंडी, लौकी और करेले के दाम भी पिछले साल के मुकाबले 36-39 प्रतिशत ज्यादा हैं.

लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल उन खाद्य उत्पादों को लेकर हो सकती है जिनका संबंध दूध उत्पादन से है. रिपोर्ट के मुताबिक मवेशियों के खाने से जुड़ी चीजों के दाम बहुत ज्यादा बढ़ गए हैं. इनमें मकई और चावल की भूसी के दाम 8,950 रुपये प्रति टन से बढ़ कर 14,350 रुपये प्रति टन तक हो गए हैं. वहीं, साफ चावल 16,750 रुपये से बढ़ करर 20,350 रुपये प्रति टन हो गया है. इसके अलावा गुड़ 3,950 रुपये से 7,200 रुपये और ग्वार चूरी 20,000 से 23,650 रुपये प्रति टन हो गया है.

जानकारों के मुताबिक यह अब समय की बात है कि इन उत्पादों की बढ़ती कीमत का असर बाजार में मिलने वाले दूध पर कब पड़ता है. हालांकि अखबार के मुताबिक दाम बढ़ने से उपभोक्ताओं की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, लेकिन किसानों के लिए यह अच्छी खबर होगी. वहीं, केंद्र में आने वाली अगली सरकार के लिए यह बड़ी चुनौती साबित होगी.