‘यह समझौता एक ऐतिहासिक क़दम है... ढ़ाई साल से चल रहे सावधानीपूर्ण अनथक प्रयास की सफल परिणति है,’ 30 जून 2018 की सुबह जर्मनी की थ्यिसनक्रुप इस्पात कंपनी के तत्कालीन प्रमुख हाइनरिश हीज़िंगर ने कहा था. उस दिन थ्यिसनक्रुप ने टाटा स्टील की यूरोपीय शाखा ने साथ मिल कर एक नयी साझी इस्पात कंपनी बनाने का समझौता किया था.

थ्यिसनक्रुप’ नाम जर्मन इस्पात की गुणवत्ता की पहचान रहा है. 130 वर्षों से दुनिया भर में प्रसिद्ध यह नाम 2019 से ‘थ्यिसनक्रुप-टाटा स्टील यूरोप’ हो जाना था. जर्मनी की किसी बड़ी और नामी कंपनी के साथ किसी बड़ी और नामी भारतीय कंपनी की साझेदारी का यह पहला उदाहरण बनता. एक ऐतिहासिक उदाहरण होता. लेकिन पूरी संभावना यही है कि अब ऐसा नहीं हो सकेगा.

यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी इस्पात कंपनी होती

नयी कंपनी ब्रिटेन के निवासी लक्ष्मीपति मित्तल की ‘आर्सेलर मित्तल’ के बाद यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी इस्पात निर्माता कंपनी होती. नया साझा मुख्यालय न तो जर्मनी में होता और न ब्रिटेन में. वह होता नीदरलैंड (हॉलैंड) के मुख्य नगर एम्सटरडम में. 2018 में यही माना जा रहा था कि यूरोपीय संघ और जर्मनी के एकाधिकार निरोधक (एंटी मोनोपॉली) कार्यालयों को यदि कोई आपत्ति नहीं हुई, तो 2018 के अंत या 2019 की शुरुआत में नयी कंपनी अपना काम शुरू कर देगी.

लेकिन जर्मनी तो नहीं,पर ब्रसेल्स स्थित यूरोपीय संघ के एकाधिकार निरोधक आयुक्त को इस बीच कुछ ऐसी बड़ी आपत्तियां ज़रूर हैं, जिनके कारण ‘थ्यिसनक्रुप’ और ‘टाटा स्टील यूरोप’ ने बीती 10 मई को एक ट्वीट में कहा कि दोनों कंपनियां यह मान कर चल रही हैं कि यूरोपीय संघ उनके विलय की अनुमति नहीं देगा.

छह हज़ार कर्मचारियों की छंटनी

‘थ्यिसनक्रुप’ ने यह भी कहा कि इसी के साथ अब उसके इस्पात विभाग को शेष कंपनी से अलग करने की प्रक्रिया को रोक दिया जायेगा. साथ ही जर्मनी के भीतर चार हज़ार तथा जर्मनी के बाहर दो हज़ार कर्मचारियों की छंटनी अब अपरिहार्य हो जायेगी. विलय के लिए यदि यूरोपीय आयोग का अनुमोदन मिल जाता, तो केवल दो हज़ार कर्मचारियों को ही छंटनी का का सामना करना पड़ा होता.

पत्रकारों ने जब ब्रसेल्स स्थित यूरोपीय संघ की एकाधिकार निरोधक आयुक्त, स्वीडन की मार्गरेते वेस्तागर के कार्यालय से इस बारे में पूछा, तो कार्यालय के प्रवक्ता ने कहा, ‘जांच अभी भी चल रही है. यूरोपीय आयोग द्वरा अपना निर्णय सुनाने की अंतिम तारीख़ 17 जून है.’ प्रवक्ता का कहना था कि इस तारीख़ को देखते हुए यूरोपीय आयोग के पास अभी दो महीने का समय और है. जानकार इस उत्तर को एक टरकाऊ बहाना मानते हैं.

अस्वीकार्य शर्तें

जानकारों का कहना है कि मार्गरेते वेस्तागर का अब तक का रंग-ढंग यही दिखाता है कि वे जर्मनी और भारत की इन दोनों बड़ी कंपनियों के बीच मेलजोल के पक्ष में नहीं हैं. उनका मानना है कि ‘थ्यिसनक्रुप’ और ‘टाटा स्टील यूरोप’ के विलय से जो नयी साझी कंपनी बनेगी, वह यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी इस्पात कंपनी होगी. उसका कारोबार 17 अरब यूरो वार्षिक के बराबर होगा और उसके पास 48 हज़ार कर्मचारी होंगे. विशेषकर वाहन-निर्माण उद्योग के लिए इस्पात और पैकिंग-सामग्री उद्योग के लिए टिन और दूसरा सामान बनाने में उसका एकाधिकार जैसा हो जाएगा. इसे रोकने के लिए मार्गरेते वेस्तागर नयी कंपनी पर कुछ ऐसी शर्तें थोपना चाहती हैं, जिन्हें मानने के लिए न तो ‘थ्यिसनक्रुप’ तैयार है और न ही ‘टाटा स्टील यूरोप’.

दोनों कंपनियों के प्रबंधकों का मानना है कि वेस्तागर, क़ानूनी लक़ीर का फ़कीर बन कर यूरोपीय आयोग के माध्यम से उन पर जो शर्तें थोपना चाहती हैं, उनसे वह उद्देश्य ही परास्त हो जायेगा जो दोनों की 50-50 प्रतिशत साझेदारी का मूल कारण है. दोनों कंपनियों के प्रबंधकों ने पिछले वर्ष जुलाई में बड़े उत्साह और विश्वास के साथ ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के मुख्यालय से कुछ ही सौ मीटर दूर के एक ऐतिहासिक पुस्तकालय में अपनी भावी योजनाएं पेश की थीं.

‘आसमान से गिरा, खजूर में अटका’

‘थ्यिसनक्रुप’ के तत्कालीन प्रमुख हाइनरिश हीज़िंगर ने या किसी दूसरे ने तब यह नहीं सोचा था कि उनकी भावी साझी कंपनी का जन्म ‘आसमान से गिरा, खजूर में अटका’ वाली कहावत बन जायेगा. इस विलय को किसी तरह संभव बनाने के लिए जर्मन चांसलर (प्रधानमंत्री) अंगेला मेर्कल ने अपने उद्योगमंत्री पेटर अल्टमायर को ब्रसेल्स भेजा. वे वहां मार्गरेते वेस्तागर से मिले. उन्हें मनाने-समझाने का पूरा प्रयास किया. पर लगता है कि वे भी कोई ऐसा आश्वासन नहीं पा सके कि थ्यिसनक्रुप और टाटा स्टील के विलय को यूरोपीय आयोग की हरी झंडी दिखा दी जायेगी.

विलय के लिए सबसे अधिक उत्साहित और लालायित हाइनरिश हीज़िंगर अब ‘थ्यिसनक्रुप’ के प्रमुख नहीं रहे. उनके उत्तराधिकारियों का माथा तब ठनका जब यूरोपीय संघ ने अपनी एकाधिकार-निरोधक आयुक्त मार्गरेते वेस्तागर के कहने पर जर्मन कंपनी सीमेन्स की तेज़ गति रेलगाड़ियां बनाने वाली शाखा ‘सीमेन्स मोबिलिटी’ और फ्रांस की तेज़गति ट्रेन-निर्माता ‘अल्सटोम’ के विलय की अनुमति देने से मना कर दिया. यह छह फ़रवरी 2019 की बात है. इस विलय के प्रयास भी जुलाई 2018 से चल रहे थे.

सीमेन्स-अल्सटोम की साझी कंपनी भी नहीं बन सकी

बताया जाता है कि रेलगाड़ियां और रेल-सामग्रियां बनाने वाली यूरोप की अन्य कंपनियों की ओर से मार्गरेते वेस्तागर के कार्यालय को इतनी आपत्तियां मिलीं कि उनके आधार पर विलय की अनुमति नहीं देना ही उचित समझा गया. सीमेन्स और ‘अल्सटोम’ ने अपनी ओर से कई विकल्प एवं आश्वासन आदि सुझाए, पर उनकी एक नहीं चली. यूरोपीय आयोग का कहना था कि इस विलय की अनुमति देने से एक दूसरी बड़ी कंपनी को बाज़ार से हटना पड़ जायेगा. इससे बाज़ारी प्रतिस्पर्धा को हानि पहुंचेगी. यूरोपीय आयोग कंपनियों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा चाहता है, न कि किसी एक कंपनी का वर्चस्व.

जहा तक थ्यिसनक्रुप और टाटा स्टील यूरोप के विलय का प्रश्न है, उसके कर्मचारी तीन देशों जर्मनी, ब्रिटेन और नीदरलैंड में रह कर काम करते. विलय की अनुमति नहीं मिल सकने के समाचार से वे सबसे अधिक हैरान और निराश हैं. थ्यिसनक्रुप के जर्मन कर्मचारियों को वचन दिया गया था कि वे जर्मनी में जहां कहीं इस समय थ्यिसनक्रुप के किसी कारख़ाने या कार्यालय में काम कर रहे हैं, वहीं काम करते रहेंगे. उनकी नौकरियां कम से कम 30 सितंबर 2026 तक पक्की रहेंगी.

नौकरियों की गारंटी का समझौता निरस्त

कंपनी के प्रबंधन और धातुकर्मी ट्रेड यूनियन ‘आईजी मेटल’ के बीच हुआ इस आशय का समझौता अब निष्प्रभावी हो जायेगा. नौकरियों की अब कोई गारंटी नहीं रह जायेगी. ट्रेड यूनियन अधिकारी और थ्यिसनक्रुप के कर्मचारी समझ नहीं पा रहे हैं कि यूरोपीय संघ की एकाधिकार निरोधक आयुक्त, मार्गरेते वेस्तागर के लिए, किसी संभावित वर्चस्व को रोकना हज़ारों लोगों की रोज़ी-रोटी छीनने से अधिक महत्वपू्र्ण कैसे हो सकता है! थ्यिसनक्रुप का प्रबंधन भी इस संभावना से चिंतित है कि ‘टाटा स्टील यूरोप’ के साथ विलय हो जाने पर हर साल 40 से 50 करोड़ यूरो की जो बचत होती, वह अब नहीं हो पायेगी. इसलिए कंपनी को अब दो हज़ार के बदले कुल छह हज़ार कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ेगी.

थ्यिसनक्रुप और ‘टाटा स्टील यूरोप’ के विलय का इन दोनों कंपनियों के कारोबारी हितों के लिए चाहे जो महत्व होता, एक देश के तौर पर भारत के लिए भी उसकी एक अलग ही महत्ता होती. इससे यूरोप में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश जर्मनी में ही नहीं, पूरे यूरोप में भारत की इस छवि को खंडित करने में सहायता मिलती कि भारत के पास दरिद्रता, ग़ंदगी, भ्रष्टाचार और ऊल-जलूल धार्मिक अंधविश्वास देने के सिवाय और कुछ नहीं है. नयी कंपनी यदि सफल रहती, तो इससे भारतीय प्रबंधकौशल का सिक्का भी जमता.