12 अगस्त 1945, मॉस्को का लाल चौक. सोवियत तानाशाह स्टालिन, हिटलर के जर्मनी पर अपनी विजय का उत्सव मना रहा था. जर्मनी ने तीन महीन पहले आठ मई को आत्मसमर्पण कर दिया था. तब भी, द्वितीय विश्वयुद्ध का अंत अभी नहीं हुआ था. हिटलर के मित्र जापान ने हार नहीं मानी थी. उसने हार दो सितंबर 1945 को तब मानी, जब देख लिया कि अमेरिका ने छह और नौ अगस्त को हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरा कर कैसा कहर बरपा दिया. इसी सब के बीच सोवियत संघ ने उत्तरी चीन में जापानी सेना पर हमला बोल कर उसके क़ब्ज़े का अंत कर दिया.

अमेरिकी सेनाध्यक्ष जनरल आइज़नहॉवर और राजदूत एविरल हैरीमैन मॉस्को में स्टालिन के साथ खड़े हो कर जब साझी विजय-परेड की सलामी ले रहे थे, तब तक दोनों मित्र देशों के बीच युद्ध-पश्चात की नयी व्यवस्था को लेकर नयी अनबन हो चुकी थी. उसी को बाद में ‘शीतयुद्ध’ का नाम दिया गया. चीन भी दो विरोधी पार्टियों के बीच बंट कर इस नये युद्ध की एक रणभूमि बना. एक तरफ थी अमेरिका समर्थित च्यांग काई-शेक की राष्ट्रवादी पार्टी गुओमिंदांग, और दूसरी तरफ़ थी सोवियत संघ का समर्थन प्राप्त माओ त्सेदोंग की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी. जापानियों के प्रति शत्रुता ने इन दोनों गलाकाट विरोधियों को एकजुट कर रखा था. जापानियों के जाते ही सत्ता हथियाने की होड़ में दोनों एक बार फिर भिड़ गये.

लड़ाई सत्ता के लिए थी

कम्युनिस्टों की मानें तो च्यांग काई-शेक के राष्ट्रवादी चीन की श्रमजीवी जनता के निर्लज्ज शोषक थे. राष्ट्रवादियों की सुनें तो कम्युनिस्ट निरे राक्षस थे. लड़ाई सत्ता के लिए थी. उसे रंग विचारधारा का दिया जा रहा था. च्यांग काई-शेक पूंजीवाद चाहते थे, माओ त्सेदोंग साम्यवाद. एक किसान परिवार में जन्मे माओ 1920 वाले दशक से ही मार्क्स और लेनिन के भक्त बन गये थे. चीन में ‘सर्वहारा के शासन’ के लिए लड़ रहे थे.

1934 में एक करारी हार के बाद कम्युनिस्टों को दूर-दराज़ के एक इलाके में भागना पड़ा. 370 दिनों में उनको पांच हज़ार किलोमीटर से भी अधिक रास्ता तय करना पड़ा. 90 हज़ार अनुयायी माओ के साथ चले थे. मरते-खपते अंत में मात्र आठ हज़ार बचे. इसी को चीनी इतिहास में ‘लंबा मार्च’ कहते हैं. माओ ने इस विभीषिका को भी विजयगाथा में बदल दिया. ‘लंबे मार्च’ की कथा-कहानियों ने उन्हें चीन का महानायक बना दिया. ‘लंबा मार्च’ ही इस अर्थ में उन के राजनैतिक कार्यक्रम का घोषणापत्र बन गया कि मरने-मारने का उनका रास्ता ही चीन के उद्धार का एकमात्र सही रास्ता है.

‘शहरों को मरघट बना दो’

इन्हीं परिस्थितियों में, 1948 में, चीन के उत्तरपूर्वी याओमिंग प्रांत में माओ के कम्युनिस्टों और च्यांग काई-शेक के राष्ट्रवादियों के बीच आर-पार की लड़ाई हुई. महीनों चली लड़ाई के बाद कम्युनिस्टों ने अपने विरोधियों को घेर लिया. नागरिक जनता भी घिर गई. एक मानवीय त्रासदी की पराकाष्ठा होने लगी. लेकिन, माओ को विजय चाहिये थी - हर क़ीमत पर विजय. उन्होंने आदेश दिया, ‘नागरिक जनता की कोई परवाह नहीं करनी है! शहरों को मरघट बना दो!’ लिन बियाओ माओ की लाल सेना के सेनाध्यक्ष थे. उन्होंने माओ के आदेशों का आंख मूंद कर पालन किया.

अपनी एक रिपोर्ट में लिन बियाओ ने लिखा, ‘घेराव के फ़ायदे दिखने लगे हैं. लोग भूख से तड़पने लगे हैं. पेड़ों की पत्तियां और घास खा रहे हैं. कई तो मर चुके हैं... हमने हर 500 मीटर पर निगरानी-चौकी बना रखी है. खंदकें खोदी और कंटीली बाड़ें लगा दी हैं. जो कोई भागने का प्रयास करता है, वापस लौटने पर मजबूर कर दिया जाता है. कुछ तो पैर पड़कर प्रार्थना करते रहे कि उन्हें जाने दिया जाये. माताओं ने अपने दुधमुंहे बच्चे वहीं छोड़ दिये और भाग गयीं. कुछ दूसरों ने हमारी आंखों के सामने फंदा डाल कर फांसी लगा ली.’

उस समय के एक सैनिक ने लिखा, ‘युद्ध ने हमें हृदयहीन बना दिया था... लेकिन जब हम शहर में पहुंचे, तो निर्विकार रहना दूभर हो गया. हम में से कई रोने लग जाते... हमने मान लिया था कि हम ग़रीबों के उद्धार के लिए लड़ रहे थे. पर, अब सोचने लगे कि कंकालों जैसी वे लाशें, जो हमें मिल रही थीं, क्या ग़रीबों की ही नहीं थीं?’

माओ अवसरवादी बने

इस लड़ाई में च्यांग काई-शेक की सेना पिट गयी. चीन के शहरों में चार लाख सैनिकों के शव गिरे. मरने वाले सामान्य नागरिकों की संख्या इससे कहीं अधिक थी. माओ खुशी से चहक रहे थे, हालांकि च्यांग काई-शेक ने घुटने नहीं टेके थे. अंतिम विजय के लिए माओ अवसरवादी बन गये. वे विपक्षी सैनिकों और अफ़सरों से अपील करने लगे कि वे पाला बदल कर लाल सेना के साथ हो जायें. उन्हें खाना-कपड़ा तो मिलेगा ही, पुराना ओहदा भी बना रहेगा. देंग श्याओ-पिंग जैसे बड़े नेता इस चाल से हैरान थे. लेकिन माओ बोले, ‘यदि तुम लोग भगोड़ों और पाला बदलने वालों को स्वीकार नहीं करते, तो हम अपने आक्रमण जारी रखते हुए अपने रास्ते पर टिके नहीं रह सकते. सो मेरी मानो और मेरे आदेशों का पालन करो.’

दिसंबर 1948 बीतने तक इस गृहयुद्ध में दोनों तरफ के 70 लाख से अधिक सैनिक लड़ रहे थे. उनमें से 50 लाख माओ की लाल सेना के थे. माओ की चाल चल गयी. लाल सेना के भारी संख्याबल के आगे च्यांग काई-शेक के राष्ट्रवादी सैनिकों का मनोबल पस्त होने लगा. उनके बहुत से सैनिक और वरिष्ठ अफ़सर माओ की सेना में भर्ती हो गये. 22 जनवरी 1949 को माओ की लाल सेना ने राजधानी बीजिंग पर भी क़ब्ज़ा कर लिया. विजयोत्सव के समय जनरल लिन बियाओ ने सैनिक परेड की सलामी ली. माओ पर्दे के पीछे कहीं छिपे रहे. कहा जाता है कि उन्हें अपने मारे जाने का डर सता रहा था.

गृहयुद्ध में हार-जीत का अंतिम फैसला

च्यांग काई-शेक ने राजधानी बीजिंग खोने के बाद भी हथियार नहीं डाले. गृहयुद्ध की आग पूरे चीन में एक बार फिर धधक उठी. तब भी, माओ की लाल सेना राष्ट्रवादियों के सभी गढ़ों पर अपने झंडे गाड़ती गयी. मई 1949 में उसने चीन के सबसे बड़े आर्थिक केंद्र शंघाई पर धावा बोला. शंघाई में ही 1920 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी बनी थी. च्यांग काई-शेक द्वारा एक घमासान लड़ाई में शंघाई से भगाये जाने से पहले यह शहर ही कम्युनिस्टों का गढ़ हुआ करता था. 25 मई 1945 को शंघाई पर भी माओ की लाल सेना का झंडा फहराने लगा. इसी के साथ गृहयुद्ध में हार-जीत का अंतिम फैसला भी हो गया.

माओ के विरोधी च्यांग काई-शेक को पास के फ़ार्मोसा (अब ताइवान) द्वीप पर भागना पड़ा. वहां उन्होंने ‘चीन गणराज्य’ की स्थापना की और अपनी एक अलग सरकार बनायी. माओ त्सेदोंग मुख्य भूमि वाले चीन की उस समय की 55 करोड़ जनता के एकछत्र निरंकुश शासक बने. एक अक्टूबर 1949 के दिन बीजिंग के ‘तिआन अनमेन चौक’ पर माओ ने घोषणा की कि चीन अब एक जनवादी (यानी कम्युनिस्ट) गणराज्य है. उस समय भी माओ अंगरक्षकों के बीच ही सुरक्षित महसूस कर पा रहे थे. उन्हें हमेशा अपनी हत्या का डर लगा रहता था.

अपरिचितों के बीच माओ कांपने लगते

माओ की एक सुपरिचित मदाम लू फू ने, इस घोषणा से कुछ ही पहले, माओ और उनकी चौथी पत्नी च्यांग चिंग से भेंट की थी. उन्होंने नोट किया, ‘वे बहुत घबराये हुए थे. उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछने पर च्यांग चिंग ने मुझसे कहा कि कुल मिला कर वे ठीक ही हैं. जब भी अनजाने लोग पास में होते हैं, तो कांपने लगते हैं. मैं इस बात को तुरंत समझ नहीं पायी और उनसे (माओ से) कहा, आज तो आप बहुत अच्छे दिख रहे हैं. उन्होंने जवाब दिया, ‘तुम भी तो मेरी एक पुरानी मित्र हो न, न कि कोई अपरिचित.’

हाल ही में मिली उस समय की फ़िल्मों में दिखायी पड़ता है कि चीन को एक जनवादी गणराज्य बनाने की एक अक्टूबर 1949 वाली घोषणा का वहां एकत्रित जनसमूह ने बड़े उत्साह के साथ स्वागत किया था. लेकिन यह उत्साह बहुत समय तक नहीं टिक पाया. माओ ने जल्द ही देश भर में ऐसे सैनिकों और पार्टी-कार्यकर्ताओं को भेजना शुरू किया, जिन्हें दिमाग़ी धुलाई द्वारा जनता को साम्यावाद की माओवादी व्याख्या पढ़ा कर ‘पुनर्शिक्षित’ करना था. माओ का मानना था कि साम्यवाद के बारे में उनकी समझ ही सबसे सही है. इसलिए हर व्यक्ति के दिमाग में उसे गहराई तक बैठाया जाना चाहिये. ज़रूरी हो, तो बलपूर्वक भी.

‘पुनर्शिक्षा’ अभियान

इस ‘पुनर्शिक्षा’ अभियान के लिए जिन ‘जनशिक्षकों’ को देश भर में भेजा गया, उनमें माओ का सबसे बड़ा बेटा 27 वर्षीय ऑनजिंग भी था. ‘पुनर्शिक्षा’ के लिए हर जगह जनसभाएं की जाती थीं,’ ऑनजिंग ने अपनी गोपनीय डायरी में एक बार नोट किया. ‘तब आरोप लगाने का दौर शुरू होता था. हम लोगों से कहते थे कि वे अपने हथियार उठायें और ज़ोर-ज़ोर से बोलें – मार डालो, मार डालो, मार डालो... पुनर्शिक्षा सभाएं अनेक लोगों की पीट-पीट कर हुई मौतों के साथ समाप्त होती थीं. नए रंगरूटों के बीच अपराधी या जापानी आक्रमणकारियों के साथ मिलीभगत रखने वाला सामाजिक कूड़ा-करकट भी तो वहां होता था.’

पुनर्शिक्षा के नाम पर होने वाले अत्याचारों में सहभागी रही चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की एक युवती ने भी ऐसे ही वीभत्स दृश्य देखे थे, ‘हमने एक गांव के चार निवासियों को हाथ की कलाइयां बांध कर लटका दिया. हर ग्रामवासी को, चाहे वह मर्द था, औरत थी या कोई बच्चा था, इसे देखना पड़ा. एक ज़मींदार महिला को भी इसी तरह सताया गया, हालांकि उसके पास बहुत थोड़ी-सी ज़मीन थी. उससे पूछा गया, अनाज कहां छिपा रखा है? मुझे पता था कि उसके पास कुछ नहीं था. लेकिन, पूछताछ और पिटाई चलती रही. अंत में उसका ब्लाउज़ फाड़ दिया गया. उसने कुछ ही समय पहले एक बच्चे को जन्म दिया था. उसके स्तनों से दूध टपक रहा था. उसका नवजात शिशु ज़मीन पर पड़ा बिलख रहा था... सबको यह दृश्य देखने के लिए मजबूर किया गया. ना-नुकुर करने पर पिटाई कर दी गई.’

‘हमें किसी की मौत से पीछे नहीं हटना है’

माओ की बर्बर विचारधारा को दिमाग़ में ठूंसने वाले चाबुकमारों में पार्टी की केंद्रीय समिति के एक सदस्य कांगचेन का कहना था, ‘बलप्रयोग ज़रूरी है. वही किसानों को सिखाता है कि उनके साथ दया के लिए कोई जगह नहीं है. हां, लोग मरेंगे! लेकिन हमें किसी की मौत से पीछे नहीं हटना है.’ माओ ने कह रखा था कि जनता की ‘पुनर्शिक्षा’ के लिए बलप्रयोग या हिंसा पूर्णतः उचित है. मुख्य निशाना सामंतों और अभिजात्यों, ज़मींदारों और बुद्धिजीवियों का वह वर्ग था, जिसे साम्यवादी ‘बुर्जुआ’ कहते हैं. अकेले हुनान प्रांत में एक लाख से अधिक लोगों को हड़काया गया. दस हज़ार जेलों में सड़े. एक हज़ार को फांसी दे दी गयी.

ज़मींदार मामूली किसान रह गये. पूंजीपति मज़दूर बन गये. ‘बुर्जुआ’ वर्ग को सर्वहारा की तरह रहना-जीना सीखना पड़ा. साम्यवाद का अर्थ है एकसमान ग़रीबी. जनता की ‘पुनर्शिक्षा’ अपनी ही जनता के विरुद्ध माओ का पहला आतंकवादी अभियान था. उनका कहना था, ‘सोवियत संघ ने अपने बुर्जुआ वर्ग का 16 वर्षों में सफ़ाया किया. हमारा लक्ष्य इससे बढ़-चढ़ कर है. हमने सब जगह–खेतों-खलिहानों में भी और कल-कारख़ानो में भी–सामूहिक स्वामित्व लागू करने का एक दृढ़निश्चय निर्दय अभियान छेड़ रखा है. अब वही सबके खाने-पीने, कपड़े-लत्ते और घर-बार का आधार होगा. सोवियत सरकार निजी मकानों के निर्माण में सहायता देती है, लेकिन हम मकानों के निजी स्वामित्व पर रोक लगा देंगे.’

‘उन्हें मार डालो! बड़े पैमाने पर मार डालो!’

बड़बोले माओ त्सेदोंग सामूहिक स्वामित्व की जादुई छड़ी घुमा कर चीन को स्वर्ग बना देने का न केवल सब्ज़बाग़ दिखा रहे थे, अपने कृषिप्रधान पिछड़े देश को एक उन्नत औद्योगिक महाशक्ति में बदल देने की शेखी भी बघार रहे थे. ग्रामीण लघु-उद्योगों को ज़बर्दस्ती विलय द्वारा बड़े- बड़े सहकारी उद्योगों में बदल दिया गया. एक ही चीज़ के भारी मात्रा में उत्पादन को बढ़ावा दिया गया. माओ कहने लगे कि उन्हें सोवियत संघ जैसे ही भारी उद्योगों का बड़े पैमाने पर निर्माण करना है. वे तीन पंचवर्षीय योजनाओं में इस्पात का उत्पादन नौ लाख टन से बढ़ा कर दो करोड़ टन करने की भी बात कर रहे थे. माओ, किसानों और श्रमिकों को याद दिलाया करते थे कि सभी ज़मींदारों और सभ्रान्तों से–जिन्हें आंख मूंदकर थोक में ‘प्रतिक्रांतिकारी’ कहा जाता था – हमेशा लड़ते रहना है, उनका सफ़ाया कर देना है. ‘उन्हें मार डालो! बड़े पैमाने पर मार डालो!’ माओ की ललकार होती थी.

माओ की बेढब नीतियों और सिरफिरे अभियानों का आतंक चीन के जनजीवन का अभिन्न अंग बन गया. कौन कब इस आतंक का शिकार बन जाये, किसकी कब मार-मार कर हत्या कर दी जाये, कोई नहीं जान सकता था. दुनिया भीड़ द्वारा जिस पीट-पीट कर मार डालने को घोर निंदनीय ‘लिंच जस्टिस’ कहती है, माओ त्सेदोंग के चीन में वही राज्य-आदेशित सबसे प्रशंसनीय न्याय था. 30 लाख लोग अकेले इस अमानुषिक न्याय की मौत मरे.

पार्टी कार्यकर्ता यमदूत बने

30 मार्च 1950 को माओ ने शिकायत की, ‘बहुत-सी जगहों पर प्रतिक्रांतिकारियों को पकड़ा और मार नहीं डाला गया. इस स्थिति को बदलना होगा.’ माओ के इस आदेश ने उनकी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं को शब्दशः यमदूत बना दिया. दक्षिण-पश्चिमी चीन की निवासी वांग इशी को अच्छी तरह याद है, ‘वे लोगों को यातनाएं देते और चाबुक से मारते थे. डंडों से या पत्थरों से पीटते थे. बहुतों के मुंह से ख़ून बहने लगता था. लोग मर भी जाते थे.’ माओ कहते थे कि पार्टी-कार्यकर्ताओं के हाथों हो रही मौतें ‘जनता-जनार्दन की इच्छा के अनुसार’ हो रही हैं.

1950, 1951 और 1952 के दौरान किसी को भी ‘प्रतिक्रांतिकारी’ बता कर सात लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया. माओ ने कहा, ‘हमें यह करना ही पड़ा... जनता सामूहिक हत्याओं की मांग कर रही थी, ताकि उसे प्रतिक्रांति की रीढ़ बन गये इन निरंकुश हत्यारों से छुटकारा मिले.’ अब तक की खोजों से पता चला है कि कथित प्रतिक्रांतिकारियों का सफ़ाया कर देने के अभियान ने लाखों नहीं, दसियों लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया. इस्पात के उत्पादन में तो नहीं, पर सामूहिक हत्याओं के मामले में माओ ने स्टालिन के सोवियत संघ को ज़रूर पीछे छोड़ दिया.

‘लंबी छलांग’

1958 में माओ पर एक नयी सनक सवार हुई. उन्हें लगा कि देश में यदि तीन मुख्य अंतर तेज़ी से मिट जायें – गांव और शहर, दिमाग़ और हाथ तथा कृषिकार्य और औद्योगीकरण के बीच – तो चीन, पश्चिम के औद्योगिक देशों को पीछे छोड़ कर, अपने समाज का बहुत जल्द ही साम्यवादी कायापलट कर सकता है. यह विलक्षण ज्ञान मिलते ही उन्होंने दूसरी पंचवर्षीय योजना रोक कर आगे की ओर ‘लंबी छलांग’ लगाने का एक नया अभियान छेड़ दिया. शुरुआात गांवों से हुई. किसानों से उनके खेत-खलिहान छीन कर उन्हें सामूहिक खेती के लिए विवश कर दिया गया.

ज़ोर-ज़बर्दस्ती भरा खेती का यह तरीका बिल्कुल नया था. किसान परेशान थे. कृषि-पैदावार रसातल में चली गयी. भुखमरी से हाहाकार मच गया. सिचुआन प्रदेश के एक ग्रामीण शुाआगे ने एक बातचीत में याद किया है, ‘(कम्युनिस्ट) पार्टी के कार्यकर्ता हमारे बर्तन-भांडे उठा ले गये. खाना केवल सामूहिक रसोईघरों में ही पकाया- खाया जाता था. हर चीज़ सामूहिक थी. हमारे पास कुछ नहीं बचा था. हम धान की बालियां मुरझाते देख रहे थे, कुछ नहीं कर सके. पार्टी-कार्यकर्ता निर्दयता से घरों में कोने-कोने की तलाशी ले रहे थे. अल्मारियां और बिस्तर तोड़-फोड़ देते थे. उनमें लगी लकड़ी को जला कर अलाव तापते थे. हमारे कच्चे घरों को भी अक्सर गिरा देते थे.’ किसान शहरों की ओर भागने लगे. भयंकर अकाल पड़ गया.

‘जज सुनवाई के समय पीटता रहा’

विरोध और प्रतिरोध की सज़ा और भी भयंकर होती थी. उस समय 19 साल की रही पूर्वी चीन की ह्वान मांग-ही याद करती हैंः ‘मैं बहुत डरी हुई थी. मेरे अध्यापक ने ‘लंबी छलांग’ को एक बार एक ग़लती कह दिया. बदले में उसे आठ साल तक एक श्रमशिवर में खटना पड़ा. मेरी चाची ने एक खेत में गिरे गेहूं के दाने बीन कर खा लिये. किसी ने शिकायत कर दी. उसके साथ ऐसी बर्बरता हुई कि मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती. जज सुनवाई के समय तब तक उसे पीटता रहा, जब तक वह मर नहीं गयी. मेरी बड़ी काकी के साथ भी यही हुआ. वो भी ज़िंदा नहीं बची. उस दिन बर्फ गिरी थी. वह खाने लायक किसी चीज़ की तलाश में बाहर गयी. जैसे ही उसे गेहूं की कुछ बालियां मिलीं और उसने उन्हें चबाना शुरू किया, किसी ने देख लिया. वह भागी, पर एक खोजी दस्ता भी पीछे लग गया. भागते-भागते ठंड और भूख से वह पस्त हो गयी थी. मर गयी.’

माओ त्सेदोंग की ‘लंबी छलांग’ एक ऐसा छलावा सिद्ध हुई, जो चीन के ही नहीं, संपूर्ण मानव जाति के इतिहास की सबसे बड़ी भुखमरी कहलायी. कुछ इतिहासकारों के अनुसार इसने साढ़े चार से साढ़े पांच करोड़ लोगों के प्राण लिये. पहली बार माओ की पूजा-प्रतिष्ठा को किंचित आंच पहुंचती दिखी. उनके भावी उत्तराधिकारी देंग श्याओपिंग और तत्कालीन राष्ट्रपति ल्यू शाओ-ची उन गिने-चुने लोगों में थे, जिन्होंने दबी ज़बान में मुंह खोलने का साहस किया. माओ ने ऐसे लोगों को रास्ते से हटाने के लिए 1966 में ‘सांस्कृतिक क्रांति’ के नाम से एक नयी भ्रांति का बिगुल बजा दिया. उद्देश्य था, विरोधियों पर ‘वर्गशत्रु’ या ‘संशोधनवादी’ होने का ठप्पा लगा कर उनका सफ़ाया कर देना.

‘सांस्कृतिक क्रांति’ जीने-मरने की लड़ाई

16 मई, 1966 ‘सांस्कृतिक क्रांति’ का जन्मदिन था. माओ के कहने पर कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्वमंडल ‘पोलित ब्यूरो’ की एक बैठक हुई. इसमें पोलित ब्यूरो के चार सदस्यों और 13 में से सात पार्टी-सचिवों की छुट्टी कर दी गयी. ये सभी लोग चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति ल्यू शाओची के समर्थक थे. तब तक ल्यू को ही माओ का उत्तराधिकारी माना जाता था. उसी दिन ‘16 मई की सूचना’ नाम से एक विज्ञप्ति जारी की गयी. उसमें कहा गया था कि विज्ञान, शिक्षा, साहित्य, कला, समाचार, पुस्तक-प्रकाशन इत्यादि कई क्षेत्रों का नेतृत्व अब ‘सर्वहारा वर्ग के हाथों में नहीं रह गया है. उन्हें चला रहे सारे बुद्धिजीवी साम्यवाद-विरोधी हैं, जनता के शत्रु प्रतिक्रांतिवादियों का ढेर हैं... जिनके विरुद्ध जीने-मरने की लड़ाई लड़नी होगी.’ माओ ने इन लोगों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर ‘मसल देने’ का आह्वान किया.

चीन के युवा माओ को अपनी सनक के बीज बोने की सबसे उपजाऊ भूमि लगे. अपने लेखों में वे युवाओं से कहने लगे, ‘हमें एक नया आरंभ करना है.’ अन्य कम्युनिस्ट देशों की तरह ही चीन के शिक्षा संस्थान ही नहीं, बच्चों और युवाओं के लिए बने राष्ट्रीय संगठन भी, बाल्यकाल से ही उनके दिमाग़ में माओ की अंधभक्ति ठूंसा करते थे. एक बालगीत के शब्द थे, ‘पिता हमारे निकट हैं, मां हमारे निकट है. लेकिन कोई हमारे उतना निकट नहीं, जितना निकट अध्यक्ष माओ हैं.’ 1966 से 1976 तक चली ‘सांस्कृतिक क्रांति’ के भयावह दिनों में ऐसे ही गीतों, कविताओं व नारों द्वारा, स्कूली बच्चों व उच्च शिक्षा के छात्रों को अपने माता-पिता को ‘प्रतिक्रांतिकारी’ बता कर उनकी भी सरेआम निंदा-आलोचना के लिए उकसाया गया.

लाल पुस्तक वाले लाल रक्षक

माओ लिखित ‘लाल पुस्तक’ लिये बच्चे और छात्र सांस्कृतिक क्रांति के ‘लाल रक्षक’ (रेड गार्ड) कहलाते थे. हर दिन हज़ारों-लाखों की संख्या में गांवों-शहरों की सड़कों पर निकल कर माओ के कथित ‘शत्रुओं’ को ढूंढते हुए वे उन पर टूट पड़ते थे. अपने माता-पिता, बड़ों-बूढों, शिक्षकों, प्राध्यापकों आदि उन सब लोगों को सरेआम निंदित, अपमानित और प्रताड़ित करते थे, जो उनके विचार से ‘चेयरमैन माओ’ के प्रति निष्ठावान नहीं थे. ऐसी हर चीज़ – पुस्तकालय, देवालय, मूर्तियां, स्मारक इत्यादि सब कुछ – ध्वस्त करने और जलाने लगे, जो लाल पुस्तक के अनुसार ग़लत, भ्रामक, बुर्जुआ, पुरातनपंथी या धार्मिक लगती थी. माओ के आलोचकों के लिए उनके पास एक ही उत्तर था– मार डालो. हालत यह थी कि भारत सहित कई देशों को अपने दूतावास-कर्मचारियों तक को वापस बुलाना पड़ा.

18 जून 1966 को विश्वविद्यालयों के 60 वरिष्ठ प्रोफ़ेसरों की अपराधियों जैसी सुनवाई के बाद सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर उन्हें लातों-मुक्कों से मारा गया. एक बस-चालक ने बाद के वर्षों में बताया, ‘मैंने खुद देखा है कि सड़कों पर पकड़-पकड़ कर किसी को किस तरह मरते-दम तक मारा गया.’ एक पीड़ित ने कहा, ‘1970 में मुझे सुरक्षा बलों ने बंदी बना लिया. असहनीय यातनाएं दीं. मेरे हाथ पीठ पर बांध कर उन्हें कानों तक खींचते हुए ऐंठा गया. कानों में आज तक मेरी नसों और मांसपेशियों के फटने और मुंह से ख़ून का फ़व्वारा फूटने की आवाज़ें गूंजती हैं. इससे तो अच्छा रहा होता कि वे मेरा सिर धड़ से अलग कर देते.’ इस व्यक्ति को 22 साल जेल में बिताने पड़े. अनुमान है कि माओ के इस सफ़ाई अभियान ने 10 से 30 लाख लोगों की बलि ली. ‘सांस्कृतिक क्रांति’ ने माओ की सत्ता को किसी बादशाह जैसी अक्षुण्ण प्रभुसत्ता प्रदान कर दी.

माओ बच गये, लिन मारे गये

‘सांस्कृतिक क्रांति’ से मची उथल-पुथल के बीच माओ के सेनाध्यक्ष और विश्वासपात्र रहे लिन बियाओ ने, 12 सितंबर 1971 को माओ से सत्ता छीन लेने और उस दिन नियोजित शंघाई यात्रा के दौरान उनकी हत्या कर देने की योजना बनायी. लेकिन, माओ को इसका पता चला गया. सारी योजना धरी रह गयी. अभागे लिन बियाओ रात पौने दो बजे विमान से मंगोलिया की तरफ़ भागे. विमान ईंधन की कमी के कारण मंगोलिया के एक शहर के पास गिर कर ध्वस्त हो गया. माओ बच गये. लिन मारे गये. चीन ने चार महींने बाद यह ख़बर दी.

ली चीस्युई 22 वर्षों तक माओ त्सेदोंग के निजी डॉक्टर थे. समय के साथ वे भी माओ से दूर होते गये. 1976 में माओ की मृत्यु के बाद ‘सांस्कृतिक क्रांति’ का अंत होते ही वे अमेरिका चले गये. वहां प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘द प्राइवेट लाइफ़ ऑफ़ चेयरमैन माओ’ (पार्टी अध्यक्ष माओ का निजी जीवन) में डॉक्टर ली ने ‘लंबी छलांग’ और ‘सांस्कृतिक क्रांति’ जैसे राजनैतिक अभियानों के साथ-साथ माओ की आदतों, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य तथा दूसरों के प्रति उनके व्यवहार का भी बेलाग-लपेट वर्णन किया है.

सफ़ाई अभियान, पर दांत साफ़ नहीं

चीन में आज भी प्रतिबंधित इस पुस्तक में डॉक्टर ली ने लिाखा है कि देश में एक से एक राजनैतिक सफ़ाई अभियान चलाने वाले ‘माओ अपने दांत एक बार भी साफ़ नहीं करते थे. चीन के अनेक किसानों की तरह माओ भी सुबह चाय पीते हुए मुंह में चाय घुमाते-फिराते थे और चाय की पत्तियां भी निगल जाते थे. समय के साथ उनके दांत काले पड़ कर गिरते गये. दांतों के बीच की खाली जगह को वे अपने होंठों से इस छिपा लेते थे कि यह जगह केवल बोलते या हंसते समय दिखती थी.’

डॉक्टर ली ने चीन के ‘लाल बादशाह’ की बहुत ही गोपनीय अंतरंग कमज़ोरियों को भी नहीं छिपाया है. उनके लिखे के अनुसार एक सेवक उनके लिेए नियमित रूप से औरतों का इंतज़ाम किया करता था. ली ने जब इस पर नाक-भौं सिकोड़ी तो माओ ने कहा कि ‘युवा औरतों के साथ सेक्स से जीवन लंबा होता है.’ ली ने लिखा है, ‘उनका यौन-चस्का मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था. कम आयु की अनगिनत महिलाओं का यौन शोषण मेरे लिए असह्य हो गया था.’ डॉक्टर ली की बात मानें तो ‘माओ को ऐसे-ऐसे यौनरोग हो गये थे, जिनका किसी डॉक्टर को उपचार नहीं करना चाहिये.’ माओ ने इस पर डॉक्टर ली से कहा, ‘कोई बात नहीं, मैं जवान औरतों के शरीर से अपने आप को साफ़ कर लिया करता हूं.’

माओ त्सेदोंग की दोहरी नैतिकता

डॉक्टर ली ने माओ त्सेदोंग पर दोहरी नैतिकता का आरोप लगाया है. वे लिखते हैं, ‘उन्होंने अपने लिए अनेक महल बनवाए. हर महल में एक बड़ा-सा स्वीमिंग-पूल भी था. जब कभी वे अपनी वैभवशाली ट्रेन से यात्रा कर रहे होते थे, तब सारा रेल यातायात रोक दिया जाता था. जब कभी वे हवाई जहाज़ से यात्रा कर रहे होते, तब देश के बाक़ी सभी विमानों को ज़मीन पर ही रहना पड़ता था. मुझे इस पाखंड से घृणा थी... माओ को लेकर मेरी सारी आशाएं मिट गयी थीं. एक नए, बेहतर समाज में रहने के सपने उजड़ गये थे. हम लोग नामहीन निरीह गुलामों की भीड़ भर रह गये थे. माओ का नया चीन भी आख़िरकार भ्रष्ट ही था.’

वर्षों से चीन को शेष दुनिया से अलग-थलग रखे हुए और दमनपूर्ण आत्याचारों के बल पर सत्ता के अधिष्ठाता बने रहे माओ को, 1972 में, एक बड़ी विदेश नैतिक मान्यता मिली. जिस अमेरिका को उन्होंने सबसे बड़ा ‘वर्गशत्रु’ घोषित कर रखा था, उसके राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन उनसे मिलने बीजिंग पहुंचे. माओ का स्वास्थ्य उस समय बहुत अच्छा नहीं चल रहा था. बताया जाता है कि वे सिगरेट और नींद की गोलियों के सहारे जी रहे थे. 1976 में उन्हें तीन बार दिल का दौरा पड़ा. 82 वर्ष की आयु में, नौ सितंबर 1976 को आखिरकार उनकी मृत्यु हो गयी. लाखों चीनी, जिन्होंने अपने देश के पूरे इतिहास में दमन और अत्याचार से परे निजी स्वतंत्रता और सम्मान को कभी जाना-सुना ही नहीं था, माओ के काले कारनामों को भुला कर सच्चे मन से शोक मनाते दिखे. उनके लिए माओ ही ‘राष्ट्रपिता’ थे.

सात करोड़ चीनियों की असमय मौतों के दोषी

चार करोड़ से अधिक चीनियों को अकेले उस भुखमरी के कारण अपने प्राण गंवाने पड़े, जो माओ की शेखचिल्ली जैसी ‘लंबी छलांग’ का प्रतिफल बनी. शोधककर्ताओं का कहना है कि इस भुखमरी के अतिरिक्त माओ द्वरा चलाये गये लंबे गृहयुद्ध, राजनैतिक आतंकवाद, सफ़ाई अभियानों और सांस्कृतिक क्रांति जैसे पागलपनों को यदि जोड़ कर देखें, तो कम से कम सात करोड़ चीनियों की असमय मौतों के लिए वे अकेले ज़िम्मेदार थे. पूरे मानव इतिहास में कोई दूसरा व्यक्ति इतना बड़ा यमराज नहीं रहा है – हिटलर और स्टालिन भी नहीं.

संख्या की दृष्टि से अब तक के सबसे बड़े युद्ध द्वितीय विश्वयुद्ध में भी पूरी दुनिया में सात करोड़ लोग नहीं मरे थे! माओ ने तो अकेले अपने ही देश में इतने सारे लोगों की जीवनबाती बुझा दी. तब भी उन्हें एक ऐसे देश का ‘राष्ट्रपिता’ होने का सम्मान दिया जाता है, जो दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति बनने के ‘एक्सप्रेस हाईवे’ पर है. इसकी क्या गारंटी है कि यदि माओ का बनाया देश कभी दुनिया का सर्वशक्तिमान देश बन गया, तो दुनिया का सर्वनाश बहुत दूर नहीं रह जायेगा!

आज के चीन में माओ की दो हज़ार से अधिक ऊंची-ऊंची प्रतिमाएं खड़ी हैं. पर, एक भी ऐसा स्मारक नहीं है, जो उनकी सनक और बहक के कारण मरने वालों की भी याद दिलाता हो. जर्मनी में हिटलर की या रूस में स्टालिन की कोई प्रतिमा नहीं मिलती. लोग उनके नाम पर थूकते हैं, न कि उन्हें पूजते हैं.