प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी पाकिस्तान को ‘लव लेटर’ लिखने के बजाय उसे ‘समझने वाली (गोली की) भाषा’ में समझाने की बात करते थे. पाकिस्तान और उसके प्रायोजित आतंकवाद को लेकर भाजपा का स्टैंड भी यही था कि वह ‘गोली का जवाब गोली से’ देगी. इसीलिए मई 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद जब सेना और अन्य सुरक्षा बलों पर एक के बाद एक आतंकी हमले हुए तो मोदी सरकार ज़बर्दस्त दबाव में आती चली गई. सितंबर, 2016 में उड़ी में हुए सैन्य कैंप पर आतंकी हमले ने तो लोगों के सब्र का बांध ही तोड़ दिया. तब विरोधी ही नहीं समर्थकों ने भी नरेंद्र मोदी और भाजपा को पाकिस्तान को लेकर उनकी चुनावी बातें याद दिलाना शुरू कर दिया था. कई जानकार मानते हैं कि उस समय भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक की कार्रवाई करना उसी दबाव का नतीजा था.

लेकिन अतीत में जिस तरह के दावे भाजपा और नरेंद्र मोदी ने किए थे, उन्हें निभाते हुए दिखाने के चक्कर में सेना की इस कार्रवाई को सार्वजनिक कर दिया गया. यह कहना ग़लत नहीं होगा कि देश में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की राजनीति उसी दिन से शुरू हुई. सत्तारूढ़ भाजपा और उसके समर्थकों ने इस शब्द को इतना ज़्यादा और इस तरह प्रचारित किया जैसे यह अपनी तरह का पहला सैन्य अभियान था. राजनीतिक आलोचक कहते हैं कि इसी का नतीजा है कि आज देश में सेना के कामों का श्रेय ख़ुद लेने की होड़-सी लग गई है.

सेना की विश्वसनीयता पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

हाल के समय तक यह आरोप कांग्रेस और विपक्षी दलों पर लग रहा था कि वे भारतीय सेनाओं के अभियानों का सबूत मांग कर उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं. लेकिन अब यही काम भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर रहे हैं. कुछ दिनों पहले उन्होंने सीधे दावा किया कि उनकी सरकार को पूर्व की यूपीए सरकार के कार्यकाल के समय में की गई किसी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के ‘सबूत’ नहीं मिले हैं. इतना ही नहीं, एक अन्य रैली में उन्होंने यूपीए सरकार के समय में हुईं कार्रवाइयों को ‘वीडियो गेम’ तक बता दिया. उनके इस बयान की लोगों ने तो आलोचना की ही, कई पूर्व सैनिकों ने भी इसे सेना और उसके लिए दी अपनी सेवा का अपमान बताया है.

उधर, तमाम प्रतिक्रियाओं के बीच यह सवाल भी उठा है कि क्या अब सच में सर्जिकल स्ट्राइक की राजनीति के चलते सेना की विश्वसनीयता पर लंबे वक़्त के लिए सवाल खड़ा हो गया है? केंद्र की सत्ता में रहने वाले दोनों बड़े दल एक-दूसरे के कार्यकाल में हुए सैन्य अभियानों पर सवाल उठा चुके हैं. ऐसे में क्या अब भविष्य में उसे अपने हर बड़े ऑपरेशन को सार्वजनिक करने पर मजबूर होना पड़ेगा?

इस सवाल को लेकर सत्याग्रह ने मेजर प्रियदर्शी चौधरी (रिटायर्ड) से बात की. वे सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर नरेंद्र मोदी के दावे को तो सिरे से ख़ारिज करते ही हैं, साथ ही इस चर्चित टर्म को लेकर ख़ास जानकारी भी देते हैं. मेजर प्रियदर्शी के मुताबिक, ‘(हाल में) एक आरटीआई के ज़रिये सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर सेना से जानकारी मांगी गई थी. लेकिन उसमें सवाल ग़लत पूछा गया था. आरटीआई में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का ज़िक्र था, जबकि सेना में इस तरह का कोई टर्म ही नहीं है. आर्मी में ऐसे अभियानों को ‘क्रॉस बॉर्डर रेड्स’ या ‘क्रॉस बॉर्डर ऑपरेशंस’ कहा जाता है. अगर आरटीआई में ठीक प्रकार से सवाल किए गए होते तो संभवतः जवाब मिल जाते.’

सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर जो जानकारी मेजर प्रियदर्शी ने हमें दी, बिलकुल यही जानकारी एक और पूर्व सैन्य अधिकारी कर्नल अशोक कुमार (रिटायर्ड) ने कुछ दिन पहले ट्विटर पर दी थी. ग़ैर-भाजपाई सरकारों के समय में हुए सेना के अभियानों को ‘वीडियो गेम’ बताए जाने पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए उन्होंने लिखा था, ‘मैंने दस साल सक्रिय अभियानों में अपनी ज़िंदगी दांव पर लगाई... यह व्यक्ति नरेंद्र मोदी जो भारत के प्रधानमंत्री भी हैं, कहते हैं कि मैं वीडियो गेम खेल रहा था.’ वहीं, एक ट्विटर यूज़र की टिप्पणी पर जवाब देते हुए रिटायर्ड कर्नल ने ट्वीट किया, ‘...सर्जिकल स्ट्राइक्स जैसा कोई मिलिट्री टर्म नहीं है. वहां इसे रेड कहा जाता है जो पहले भी कई बार की गई हैं.’

‘सेना अपने सभी अभियानों के रिकॉर्ड रखती है’

सेना अपने अभियानों के रिकॉर्ड रखती है या नहीं, इस सवाल पर मेजर प्रियदर्शी ने हमें बताया, ‘सेना अपने सभी बड़े ऑपरेशन्स की डिटेल्स सैन्य अभियान महानिदेशक (डीजीएमओ) के पास रखती है. डीजीएमओ सभी बड़े सैन्य अभियानों के दस्तावेज़ रखता है... और सैन्य यूनिट स्तर पर (ऑपरेशन के रिकॉर्ड के लिए) ‘वॉर डायरी’ होती है. 200 सालों से सेनाएं वॉर डायरी रखती हैं. सरकार की यह बात झूठ है कि आर्मी के पास रिकॉर्ड नहीं है. उसके पास सभी दस्तावेज़ होते हैं.’

नरेंद्र मोदी द्वारा यूपीए के समय के सैन्य अभियानों को ‘वीडियो गेम’ बताए जाने पर जिन पूर्व सैन्य अधिकारियों ने सख़्त नाराज़गी ज़ाहिर की है उनमें मेजर प्रियदर्शी भी शामिल हैं. इस हवाले से वे कहते हैं, ‘1947 से इस तरह के ऑपरेशंस होते आए हैं. मैं ख़ुद कुछ अभियानों का हिस्सा रहा हूं. नरेंद्र मोदी जी की यह बात झूठ है कि क्रॉस बॉर्डर ऑपरेशन नहीं हुए. कई हुए हैं. मेरे कार्यकाल में छह ऑपरेशन हुए थे.’

यहां बताते चलें कि मेजर प्रियदर्शी उन्हीं पूर्व सैनिकों व सैन्याधिकारियों में से एक हैं जिन्होंने कुछ समय पहले राष्ट्रपति को पत्र लिखकर सेना के नाम पर हो रही राजनीति के ख़िलाफ़ क़दम उठाने की अपील की थी. हमने मेजर से पूछा कि क्या इससे भविष्य में सेना की विश्वसनीयता पर प्रश्चचिह्न नहीं लग जाएगा. इस पर उन्होंने कहा, ‘सेना को ही नहीं देश को भी इससे बहुत ज़्यादा नुक़सान होगा. सैन्य अभियानों का राजनीतिकरण होने से सेनाओं को लगता है कि उनके ऑपरेशनों की वजह से किसी का राजनीतिक भाग्य चमक सकता है या ख़राब हो सकता है. (इस समय) हम अपने लोकतांत्रिक वजूद पर आए ख़तरे से लड़ रहे हैं. इस तरह हम तानाशाही के कगार पर आ जाएंगे. 70 के दशक के अंत में पाकिस्तान में यही हुआ था.’

मेजर प्रियदर्शी कहते हैं कि सेना को लेकर हो रही राजनीति तुरंत बंद होनी चाहिए. इसके साथ ही राजनीतिक दलों और आम नागरिकों को चेतावनी देते हुए उनका यह भी कहना था, ‘राजनीतिक दलों को यह सब बंद करना होगा. उनकी राजनीति लोकतंत्र के लिए ख़तरा बन गई है. वे ऐसा ही करते रहे तो हमें बर्बादी के लिए तैयार रहना चाहिए.’