प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर अपने बयानों को लेकर सुर्ख़ियों में हैं. हाल ही में एक हिंदी न्यूज़ चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने एक के बाद एक तीन ऐसी बातें कहीं जिनसे पूरे देश में वे मजाक का पात्र बन गए. प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक़ उन्होंने बीती 26 फ़रवरी की रात को ख़राब मौसम होने के बावजूद भारतीय वायु सेना (आईएएफ) को इसलिए पाकिस्तान के बालाकोट में एयर स्ट्राइक करने भेजा, क्योंकि उनके ‘कच्चे ज्ञान (रॉ विज्डम)’ के मुताबिक़ बादलों के चलते आईएएफ़ के लड़ाकू विमानों के पाकिस्तानी रडार सिस्टम से बचने की संभावना थी. इसी इंटरव्यू में नरेंद्र मोदी का यह भी कहना था कि उन्होंने 1987-88 में ‘डिजिटल’ कैमरे से वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की तस्वीर ली थी. वहीं, एक अन्य दावे में मोदी ने कहा कि 1987-88 में ही वे संदेश भेजने के लिए ईमेल सिस्टम का इस्तेमाल कर चुके थे.

मोदी के पहले बयान पर कई विशेषज्ञों की दलील है कि अगर बादल छाने से रडार सिस्टम प्रभावित होता तो फिर हर बार बारिश होने पर मोबाइल नेटवर्क पर भी बिना बाधा के बातचीत संभव नहीं होती. रेडियो प्रोग्रामिंग भी रडार सिस्टम पर निर्भर है. लेकिन मौसम ख़राब होने पर भी रेडियो नेटवर्क बंद नहीं होता. हालांकि तेज़ बारिश और तेज़ हवा के चलते थोड़ा बहुत असर ज़रूर पड़ता है, लेकिन इससे रेडियो तरंगें के ज़रिये सिग्नल मिलना बंद नहीं होता. यानी बादलों की वजह से रडार सिस्टम बाधित होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता.

प्रधानमंत्री मोदी के रडार वाले बयान को और भी कई तरीक़ों से ग़लत साबित किया जा सकता है. कई वेबसाइटों ने इस बारे में रिपोर्टें लिखी हैं. लेकिन ज़्यादा गहराई में न जाएं और साधारण सी तर्कशक्ति लगाएं तो उससे भी समझ आ जाता है कि प्रधानमंत्री ने बिना सोचे-समझे यह बयान दे दिया.

दरअसल दुनियाभर में रडार सिस्टम केवल वायु सेनाएं इस्तेमाल नहीं करतीं, बल्कि हवाई यात्रा की सेवा भी इसके बिना संभव नहीं है. आज हजारों यात्री विमान हर समय आसमान में उड़ते हैं और हर जगह मौसम सामान्य से ख़राब होता रहता है. अगर बिगड़ते मौसम में किसी विमान में गड़बड़ी आ जाए और रडार भी काम करना बंद कर दे तो कल्पना कीजिए कि इससे हवाई दुर्घटनाओं की आशंका कितनी ज़्यादा बढ़ जाएगी, लेकिन हवाई दुर्घटनाएं शायद ही कभी इस वजह से होती हों. इन्हें रोकने के लिए एयरलाइनों का अपना रडार सिस्टम होता है जिसे ‘ट्रैफ़िक कॉलीजन अवॉइडेंस सिस्टम’ कहा जाता है और यह हर मौसम में सटीक तरीके से काम करता है.

प्रधानमंत्री का दूसरा दावा यह था कि उन्होंने 1987-88 में ही डिजिटल कैमरा इस्तेमाल कर लिया था. फ़ेक न्यूज़ का भंडाफोड़ करने वाली वेबसाइट फ़ैक्टचेकर ने एक मीडिया-डिजिटल कंसल्टेंट के हवाले से बताया है कि 1987 तक दुनिया में कोई भी डिजिटल कैमरा बिक्री के लिए बाजार में उपलब्ध ही नहीं था. इस बारे में हमने अपनी तरफ़ से भी कुछ जांच-पड़ताल की है. इसके मुताबिक पहला डिजिटल कैमरा 1987 में बिका था लेकिन यह कैमरा पोर्टेबल नहीं था. यानी यह इतना हल्का और छोटा नहीं था कि इसे कोई साथ में लेकर जा सके. वहीं, इस कैमरे की बिक्री को लेकर कोई दस्तावेज़ भी मौजूद नहीं हैं.

वहीं न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक ब्लॉग के मुताबिक पहला आधुनिक डिजिटल कैमरा 1989 में कोडेक कंपनी के इंजीनियर स्टीवन सजॉन द्वारा बनाया गया था और दिसंबर, 1991 में जापान में पहला ऐसा कैमरा बेचा गया. यानी प्रधानमंत्री मोदी के ‘डिजिटल कैमरा’ इस्तेमाल करने के दो साल बाद! वहीं 1995 तक डिजिटल कैमरा ज़्यादातर सेना और मेडिकल क्षेत्र में इस्तेमाल किया जा रहा था. आम लोगों के हाथ में पहुंचने में इसे काफी समय लगा और इसलिए नरेंद्र मोदी का यह दावा संदेहास्पद है कि वे 1987-88 में डिजिटल कैमरा इस्तेमाल कर रहे थे.

इसके अलावा नरेंद्र मोदी का 1987 में ईमेल इस्तेमाल करने का दावा भी सही नहीं लगता क्योंकि भारत में सार्वजनिक इंटरनेट सेवा 15 अगस्त, 1995 से शुरू हुई थी. वहीं, निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए इंटरनेट सेवा की शुरुआत नवंबर, 1998 में हुई. हालांकि देश में 1993 से पहले इंटरनेट सेवा का प्रयोग शुरू हो गया था. तब केवल दो ही राष्ट्रीय ईमेल सेवाएं उपलब्ध थीं. डिपार्टमेंट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स (डीओई) द्वारा शुरू किए गए एक एजुकेशन एंड रिसर्च नेटवर्क (ईआरनेट) के जरिये देश के आठ बड़े प्रौद्योगिकी संस्थान एक-दूसरे से जुड़े थे. इनमें नेशनल सेंटर फॉर सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी (एनसीएसटी) बॉम्बे, भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु, आईआईटी-दिल्ली, बॉम्बे, कानपुर, खड़गपुर, मद्रास और डीओई शामिल थे.

फैक्टचेकर ने भारत में एकेडमिक नेटवर्क की शुरुआत करने वालों में से एक श्रीनिवासन रमाणी के हवाले से बताया है कि 1988 तक केवल इन संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिक व शिक्षक सीमित ईमेल सेवा का इस्तेमाल कर रहे थे. दूसरी इंटरनेट सेवा ‘बिजनेस इंडिया एक्सेस’ थी. इसका इस्तेमाल सिर्फ व्यापारी वर्ग करता था, क्योंकि तब इसकी कीमत काफी ज्यादा थी. लेकिन बड़ी कीमत देने के बाद भी इसके जरिए केवल टेक्स्ट मैसेज भेजे जा सकते थे. इन इलेक्ट्रॉनिक मेल में किसी भी तरह की फ़ाइल अटैच करना संभव नहीं था. ईमेल में यह सहूलियत 1996 तक आ पाई, लेकिन बड़ी इमेज फ़ाइल तब भी अटैच नहीं की सकती थीं. ऐसे में प्रधानमंत्री से यह सवाल जायज़ है कि उन्होंने 1987 में कैसे आडवाणी की डिजिटल तस्वीर गुजरात से दिल्ली भेजी थी.