पश्चिम बंगाल में प्रचार के मसले पर चुनाव आयोग का हालिया फ़ैसला विपक्षी दलों के निशाने पर आ गया है. आयोग ने राज्य में हो रही हिंसा के मद्देनज़र वहां चुनाव प्रचार पर निर्धारित समय से एक दिन पहले रोक लगा दी है. इस फ़ैसले की विपक्षी दल आलोचना कर रहे हैं.

लोक सभा चुनाव के सातवें और आख़िरी चरण में 19 मई को पश्चिम बंगाल की नौ सीटों पर मतदान है. इन सीटों पर 17 मई को शाम पांच बजे चुनाव प्रचार थमना था. लेकिन इसी बुधवार को आयोग ने आदेश जारी कर इन सभी सीटों पर 16 मई को रात 10 बजे से चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी है. आयोग ने पश्चिम बंगाल सीआईडी के अतिरिक्त महानिदेशक और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के ख़ास आईपीएस अफसर राजीव कुमार को भी सेवामुक्त कर उन्हें केंद्रीय गृह मंत्रालय से संबद्ध कर दिया है. साथ ही राज्य के गृह सचिव अत्रि भट्टाचार्य को हटाकर उनका प्रभार मुख्य सचिव को सौंप दिया है. उप चुनाव आयुक्त चंद्रभूषण कुमार ने मीडिया को बताया, ‘कोलकाता में इसी मंगलवार को समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़े जाने के बाद राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति काफ़ी बिगड़ गई है. इसीलिए आयोग ने संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह कार्रवाई की है. देश के इतिहास में संभवत: यह पहला मौका है जब आयोग को किसी चुनाव में निर्धारित अवधि से पहले प्रचार प्रतिबंधित करना पड़ा है.’

आयोग के फ़ैसले को पक्षपातपूर्ण बताते हुए बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने कहा, ‘गुरुवार को पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो रैलियां हैं. उनकी रैलियां ठीक से हो जाएं इसीलिए आयोग ने गुरुवार रात दस बजे से चुनाव प्रचार प्रतिबंधित किया है. अगर वह वाकई निष्पक्ष है तो उसने गुरुवार सुबह से चुनाव प्रचार प्रतिबंधित क्यों नहीं किया?’ कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी कहा, ‘चुनाव आयोग ने अपनी विश्वसनीयता पर ख़ुद ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है. ऐसा लग रहा है जैसे वह भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय से आदेश ले रहा है. और उसी के मुताबिक काम कर रहा है.’ तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने भी आयोग के फ़ैसले को ‘अनैतिक’ बताया है.