फिल्म जगत से राजनीति में आने वाले शत्रुघ्न सिन्हा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे हैं. उस वक्त वे राज्यसभा सांसद थे. 2009 में वे पटना साहिब से लोकसभा चुनाव लड़े और जीते. इसके बाद 2014 में भी वे इस सीट से जीतकर लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहे. पिछली दोनों बार वे भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर यहां से चुनाव लड़े थे. लेकिन इस बार वे कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में हैं. जमीनी स्थिति को देखने पर यह पता चलता है कि इस बार पार्टी बदलकर पटना साहिब से चुनाव लड़ना शत्रुघ्न सिन्हा को भारी पड़ सकता है. यहां आखिरी और सातवें चरण में 19 मई, 2019 को मतदान होना है.

शत्रुघ्न सिन्हा पटना साहिब सीट पर सिर्फ कांग्रेस के नहीं बल्कि महागठबंधन के उम्मीदवार भी हैं. इसका नेतृत्व 2015 के विधानसभा चुनावों में सबसे अधिक सीटों पर जीत हासिल करने वाल राष्ट्रीय जनता दल कर रही है. इस महागठबंधन में आरजेडी और कांग्रेस के अलावा कुछ और छोटी पार्टियां हैं. इसके बावजूद यहां पर शत्रुघ्न सिन्हा की राह इस बार मुश्किल लग रही है.

पटना साहिब सीट पर कायस्थ मतदाताओं की संख्या निर्णायक है. यहां के कुल मतदाताओं की संख्या तकरीबन 20.5 लाख है जिनमें से चार लाख से अधिक कायस्थ हैं. यही वजह है कि यहां से अक्सर कायस्थ उम्मीदवार ही चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचते रहे हैं. कांग्रेस उम्मीदवार शत्रुघ्न सिन्हा और भाजपा उम्मीदवार रविशंकर प्रसाद भी कायस्थ समाज से ही आते हैं.

भाजपा की ओर से इस सीट पर उम्मीदवारी का दावा भाजपा के राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा भी कर रहे थे. वे भी कायस्थ समाज से ही आते हैं. उन्हें टिकट नहीं मिलने पर उनके समर्थकों के विरोध-प्रदर्शन की खबरें भी आई थीं. यहां तक कि टिकट मिलने के बाद जब रविशंकर प्रसाद पटना पहुंचे तो उन्हें हवाई अड्डे पर ही आरके सिन्हा के समर्थकों के विरोध का सामना करना पड़ा था.

माना जा रहा था कि भाजपा की इस आंतरिक खींचतान का फायदा शत्रुघ्न सिन्हा को मिल सकता है. लेकिन आज की जमीनी स्थिति यह है कि भाजपा की ओर से दस साल तक लोकसभा सांसद रहने वाले शत्रुघ्न सिन्हा के लिए कांग्रेस सांसद बनने की राह आसान नहीं है. पटना साहिब संसदीय क्षेत्र के लोगों से बातचीत करने पर पता चलता है कि उन्हें यहां कई स्तर पर चुनौतियां का सामना करना पड़ रहा है.

पहली बात तो यह बताई जा रही है कि शत्रुघ्न सिन्हा को भाजपा की आंतरिक खींचतान की वजह से जितने लाभ की उम्मीद उन्हें थी, उतना उन्हें मिलता नहीं दिख रहा है. टिकट नहीं मिलने के बावजूद आरके सिन्हा और उनके समर्थक रविशंकर प्रसाद का उस तरह से विरोध नहीं कर रहे हैं जिस तरह की उम्मीद शत्रुघ्न सिन्हा को उनसे थी.

बिहार भाजपा के एक नेता इस बारे में बताते हैं कि शत्रुघ्न सिन्हा चाहते थे कि आरके सिन्हा अपना टिकट कटने पर कम से कम कायस्थ समाज के अंदर ही कुछ बोलें ताकि उसका समर्थन उन्हें मिल सके. बिहार भाजपा के इस नेता का दावा है कि शत्रुघ्न सिन्हा ने आरके सिन्हा से इस बारे में बातचीत करने की भी कोशिश की लेकिन वे उनसे फोन पर बात करने को भी तैयार नहीं हुए.

कुल मिलाकर भाजपा के आंतरिक मतभेदों का लाभ लेने की शत्रुघ्न सिन्हा की कोशिशों पर आरके सिन्हा ने पानी फेर दिया. इससे पटना साहिब सीट पर कायस्थ समाज के वोटों में बंटवारा हो रहा है. वोटों के इस बंटवारे की वजह से शत्रुघ्न सिन्हा के लिए यहां से जीत पाना मुश्किल लगने लगा है.

शत्रुघ्न सिन्हा की दूसरी चुनौती खुद कांग्रेस पार्टी है. भाजपा से जब वे चुनाव लड़ते थे तो उनके पास एक मजबूत संगठन था. पटना में भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य सहयोगी संगठनों का एक मजबूत तंत्र है. यह पूरा तंत्र पहले उनके लिए काम करता था. इस वजह से उनके लिए जीत आसान होती थी. लेकिन कांग्रेस पार्टी का सांगठनिक ढांचा बेहद लचर है. भाजपा के मुकाबले उसके पास मुखर और सक्रिय कार्यकर्ताओं का अभाव है. इस वजह से शत्रुघ्न सिन्हा का चुनाव प्रचार अभियान उस तरह से नहीं चल रहा है जिस तरह से पहले चलता था या वे चलाना चाहते हैं.

पटना साहिब संसदीय क्षेत्र के लोग शत्रुघ्न सिन्हा की तीसरी चुनौती यह बताते हैं कि लंबे समय से भाजपा में होने की वजह से उनके चुनावों में संसाधन लगाने वाले अधिकांश लोग ऐसे थे जो विचारधारा के स्तर पर पार्टी के करीब थे. इस बार ये लोग शत्रुघ्न सिन्हा का उस तरह से सहयोग नहीं कर रहे हैं जिस तरह से इन्होंने 2009 और 2014 के चुनावों में किया था.

शत्रुघ्न सिन्हा की चौथी चुनौती के तौर पर पटना के लोग उनके प्रचार अभियान के खराब प्रबंधन का जिक्र करते हैं. इन लोगों का कहना है कि पटना साहिब संसदीय क्षेत्र में छह विधानसभा सीटे हैं. इनमें से चार विधानसभा क्षेत्र - कुम्हरार, दीघा, फतुहा और बख्तियारपुर - ऐसे हैं जहां यादव और ठाकुर समाज के लोगों की संख्या अच्छी-खासी है. स्थानीय लोगों का कहना है कि शत्रुघ्न सिन्हा को इन क्षेत्रों में सघन प्रचार अभियान चलाना चाहिए था. लेकिन इन चारों विधानसभा क्षेत्रों में उनका प्रचार कोई खास जोर नहीं पकड़ पाया.

पटना साहिब में मुस्लिम और यादव समाज के मतदाताओं की कुल संख्या तकरीबन 3.5 लाख है. इसके अलावा यहां कारोबारी वर्ग के लोग भी काफी हैं. कांग्रेस के लोगों का मानना है कि इन्हें जीएसटी की वजह से तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ा है. ऐसे में शत्रुघ्न सिन्हा की आखिरी उम्मीद यादव, मुस्लिम और कारोबारी समाज के लोग ही हैं.