लोकसभा चुनाव के नतीजों से पहले आए एग्जिट पोल के नतीजे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए अच्छी खबर लेकर आए हैं. बिहार की बात करें तो इनके मुताबिक यहां उसकी अगुवाई वाला एनडीए 40 सीटों में से कम से कम 30 और सबसे अच्छी हालत में सभी 40 सीटें जीत सकता है.

2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य बना था. अविभाजित बिहार में लोकसभा की 54 सीटें थीं. बंटवारे के बाद इनमें से 14 झारखंड में चली गईं और बिहार में 40 सीटें बचीं. तब से अब तक तीन लोकसभा चुनाव (2004, 2009 और 2014 में) हुए हैं. इन तीनों चुनावों में बिहार के लोगों ने हर बार किसी एक गठबंधन को तकरीबन तीन चौथाई सीटें दी हैं.

क्या इस बार भी यह ट्रेंड जारी रहेगा? इस सवाल को लेकर बिहार के राजनीतिक ​दलों और लोगों के के बीच अलग-अलग बात चल रही है. कुछ लोग कह रहे हैं कि भाजपा, जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) का राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन एक बार फिर से प्रदेश में तीन चौथाई सीटें हासिल कर सकता है. वहीं दूसरी तरफ निष्पक्ष तौर पर बिहार के चुनावों पर नजर रखने वाले प्रदेश के राजनीतिक जानकार कह रहे हैं कि एनडीए के लिए सबसे अच्छी स्थिति भी रही तो भी इस बार उनके पक्ष में आंकड़ा तीन-चौथाई नहीं बल्कि अधिक से अधिक दो-तिहाई का रहेगा. तीन-चौथाई के लिए 40 में से 30 सीटें चाहिए जबकि दो-तिहाई का आंकड़ा 27 सीटों पर जीत मिलने पर हासिल हो जाएगा.

झारखंड के अलग होने के बाद बिहार में पहला लोकसभा चुनाव 2004 में हुआ था. उस चुनाव में भाजपा और जेडीयू एक साथ चुनाव लड़े थे. वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और लोक जनशक्ति पार्टी का गठबंधन था. बाद में यही गठबंधन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन बना. लालू यादव की अगुवाई वाले इस गठबंधन ने 2004 के लोकसभा चुनावों में कुल 40 सीटों में से 29 सीटों पर जीत हासिल की थी. यह आंकड़ा तीन चौथाई के 30 सीटों के आंकड़े के बेहद करीब है. राष्ट्रीय स्तर पर यूपीए की सहयोगी रही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को भी बिहार में एक सीट मिली थी. अगर इस सीट को भी बिहार में यूपीए के खाते में जोड़ दें तो बिहार में इस गठबंधन को दो तिहाई सीटें मिली थीं. अकेले आरजेडी ने 22 सीटों पर जीत हासिल की थी. ज​बकि रामविलास पासवान की एलजेपी को चार सीटें और कांग्रेस को तीन सीटें हासिल हुई थीं. जेडीयू को छह और भाजपा को सिर्फ दो सीटों से संतोष करना पड़ा था.

2009 के लोकसभा चुनावों में यह बाजी एनडीए के पक्ष में पलट गई. भाजपा और जेडीयू वाले एनडीए को 40 में से 32 सीटों पर कामयाबी मिली. इनमें जेडीयू के खाते में 20 सीटें आईं तो भाजपा ने 12 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की. आरजेडी को चार और कांग्रेस को सिर्फ दो सीटों पर संतोष करना पड़ा. रामविलास पासवान की एलजेपी का खाता तक नहीं खुला.

2014 के लोकसभा चुनावों में गठबंधनों का यह समीकरण पूरी तरह बदल गया. बिहार एनडीए की मुख्य धुरी रहे नीतीश कुमार अलग से चुनाव लड़े. यूपीए के साथ रहने वाले रामविलास पासवान एनडीए के पाले में आ गए. नीतीश कुमार के साथ लंबे समय तक रहे उपेंद्र कुशवाहा अपनी अलग राष्ट्रीय लोक समता पार्टी बनाकर एनडीए के साथ आ गए. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस और आरजेडी साथ रहे. 2014 में एनडीए को बिहार की जनता ने 31 सीटें दीं. इनमें भाजपा को 22 सीटें मिलीं. एलजेपी को छह और आरएलएसपी को तीन. राष्ट्रीय जनता दल चार सीटों के साथ और कांग्रेस दो सीटों के साथ अपने 2009 के आंकड़े पर बने रहे. नीतीश कुमार की जेडीयू 20 सीटों से घटकर दो सीटों पर आ गई.

2019 में यानी इस बार भाजपा, जेडीयू और एलजेपी से बना एनडीए एक तरफ है तो दूसरी तरफ आरजेडी, कांग्रेस, आरएलएसपी, हिंदुस्तान आवाम मोर्चा और विकासशील इंसान पार्टी का महागठबंधन है. दोनों गठबंधनों की स्थिति को देखते हुए यह लग रहा है कि राज्य के बंटवारे के बाद बिहार में यह पहला लोकसभा चुनाव होगा जिसमें किसी एक गठबंधन को दो तिहाई सीटें हासिल न हों.

मोटे तौर पर इसकी दो वजहें बताई जा रही हैं. पहली बात तो यह कही जा रही है कि दोनों गठबंधन कागज पर मजबूत दिख रही हैं. एनडीए के उम्मीदवार जहां अपने स्तर पर जातिगत समीकरण साधने के साथ केंद्र और प्रदेश की सरकार के विकास कार्यो की बात करते हुए वोट मांग रहे हैं तो महागठबंधन भी जातिगत समीकरण साधने के मामले में एनडीए से उन्नीस नहीं है. महागठबंधन की ओर से केंद्र और राज्य सरकार की नाकामियों को मुद्दा बनाया जा रहा है. रामविलास पासवान की कमजोर होती सियासी स्थिति भी एनडीए को इस चुनाव में नरेंद्र मोदी के नाम पर माहौल बनाकर एकतरफा जीत हासिल करने की राह में बाधा साबित हो रही है.

यहीं से पिछले दो दशक का ट्रेंड बदलने की दूसरी वजह दिखती है. बिहार में अधिकांश सीटों पर इस बार कड़ा मुकाबला बताया जा रहा है. जिन सीटों को पारंपरिक तौर पर किसी पार्टी का गढ़ बताया जाता था, वैसी सीटों के बारे में भी कहा जा रहा है कि वहां इस बार कोई भी चुनाव जीत सकता है. उदाहरण के तौर पर औरंगाबाद सीट को लें. सुशील सिंह यहां से 2009 में जेडीयू के टिकट पर और 2014 में भाजपा के टिकट पर जीते थे. इसका मतलब यह हुआ कि पिछले दस साल से यह सीट एनडीए के पाले में है. लेकिन इस बार यह कहा जा रहा है कि वे बेहद कड़े मुकाबले में हैं और यह सीट महागठबंधन को भी जा सकती है. यही स्थिति दूसरी और कई सीटों पर दिख रही है. इससे यह भी पता चलता है कि नीतीश कुमार के एनडीए के पाले में जाने के बावजूद महागठबंधन से उसे कड़ी टक्कर मिल रही है.

इस वजह से यह भी कहा जा रहा है कि इस कड़े मुकाबले की वजह से जीत-हार का अंतर कम रहेगा. एकतरफा जीत वाली सीटें इस बार अपेक्षाकृत कम रहेंगी. ऐसे में बिहार में लोकसभा चुनावों में एक गठबंधन को तीन-चौथाई सीटें देने वाले ट्रेंड का बरकरार रह पाना भी मुश्किल लग रहा है. बिहार के कुछ राजनीतिक जानकारों का दावा है कि अगर मोदी लहर बिहार में चला तब भी इस बार एनडीए के पक्ष में तीन-चौथाई का आंकड़ा तो मुश्किल है. उनके मुताबिक सबसे अच्छे हालात में भी एनडीए को करीब दो-तिहाई सीटें मिल सकती हैं.