पोलियो वायरस के कारण होने वाली एक बीमारी है जो हज़ारों वर्षों से इंसान को होती आई है. पोलियो के 90 से 95 प्रतिशत मामलों में वायरस का इंसान के शरीर पर कोई असर नहीं होता. 5 से 10 प्रतिशत मामलों में हल्का बुखार, उल्टी और दर्द होकर रह जाता है. केवल 0.5 प्रतिशत मामलों में वायरस तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है और इससे मांसपेशियां बेकार हो जाती हैं.

प्रकृति मां ने मेरा चुनाव उन्हीं 0.5 प्रतिशत लोगों में किया था.

यह सन् 1980 के उस समय की बात है, जब गर्मी का मौसम धीरे-धीरे समाह्रश्वत हो सुखद मानसून के लिए रास्ता बना रहा था. भीषण गर्मी के बाद जब मानसून आता है तो दिल्ली के लोग बहुत खुश हो जाते हैं, लेकिन मेरी मां के मन में कोई प्रसन्नता नहीं थी. वह चिंतित और अधीर थीं, क्योंकि मुझे कई दिन से तेज़ बुखार था. बुखार लगातार 103 डिग्री फेरेनहाइट के आस-पास बना हुआ था.

बीमारी की स्थिति में हमारे जैसे निम्न मध्यवर्गीय घरों में पहली प्रतिक्रिया यही होती थी कि थोड़ा इंतज़ार किया जाए. हो सकता है कि बीमारी मौसमी सर्दी-ज़ुकाम की तरह खुद ही चलती बने. इस तरह की प्रतिक्रिया कई बार बीमार की स्थिति को गंभीर भी बना देती थी, लेकिन इसके पीछे तर्कपूर्ण कारण थे. धन की कमी ने हमारे जैसे परिवारों के मन में डॉक्टर से परामर्श लेने के प्रति अनिच्छा भर दी थी. डॉक्टर जो फीस लेते थे, वह निम्न मध्यवर्गीय परिवार के लिए चुका पाना थोड़ा मुश्किल होता था. डॉक्टर के परामर्श से बचने की एक और वजह अशिक्षा भी थी. बीमारी का इलाज जल्द-से-जल्द आरंभ किए जाने के महत्त्व को कम ही समर्थन हासिल था. ये तमाम चीज़ें आज भी करीब-करीब वैसी ही हैं.

‘इंतज़ार करो और देखो’ के दौरान ही कभी घरेलू इलाज भी शुरू हो जाया करता था. बुखार में बीमार को क्रोसिन की गोली दो, पानी में भीगा कपड़ा माथे पर रखो, मौसम यदि ठंडा है तो उसे तुलसी, अदरक इत्यादि जड़ी-बूटियों वाली चाय दो. बहरहाल, मेरा बुखार इतना तेज़ था कि अगले ही दिन मुझे डॉक्टर को दिखा दिया गया था और डॉक्टर ने बुखार की कुछ दवाइयां भी दी थीं. इसके अलावा घरेलू इलाज भी किया जा रहा था.

लेकिन मेरा बुखार सामान्य नहीं था.

किसी को अनुमान नहीं था कि मेरे शरीर के भीतर पोलियो वायरस प्रवेश कर चुका था और उसने अपना आक्रमण शुरू कर दिया था.

बुखार चार दिन बाद भी अपनी जि़द पर जस-का-तस अड़ा रहा और तमाम कोशिशों के बावजूद थर्मामीटर का पारा नीचे नहीं उतरा. इस परिस्थिति ने परिवार में काफी घबराहट पैदा कर दी. बाबा मुझे लेकर एक अन्य डॉक्टर के पास पहुंचे. उन्हें लगा कि शायद पहला डॉक्टर बीमारी को ठीक से समझ नहीं पा रहा था और स्थिति को नए सिरे से देखे जाने की ज़रूरत थी. दूसरे डॉक्टर ने कुछ नई दवाइयां बताईं, लेकिन उनसे भी कोई फर्क नहीं पड़ा. अगली सुबह मुझे तीसरे डॉक्टर के पास ले जाया गया. जैसे ही उस डॉक्टर ने सुना कि मेरा बुखार कई दिन से नहीं उतरा था; उसने मुझे एक इंजेक्शन दे दिया. डॉक्टर ने बाबा को भरोसा दिलाया कि बच्चा जल्द ही ठीक हो जाएगा. बाबा मुझे वापस घर ले आए. डॉक्टर के आश्वासन के विपरीत, दोपहर तक मेरा बुखार और अधिक बढ़ गया और स्थिति बहुत अधिक खराब लगने लगी.

हालांकि वायरस कई दिन पहले मेरे शरीर में आ चुका था, लेकिन यही वह दोपहर थी जब पोलियो से मेरी मुलाकात हुई.

मैं लगातार रोए जा रहा था. मां मुझे सुलाने की कोशिश कर रही थीं, पर मैं बिल्कुल नहीं सो पा रहा था. सुलाने के सभी प्रयासों में असफल रहने के बाद आखिर वह पलंग पर बैठ गईं और मुझे अपनी गोद में लेकर अपने नर्म हाथों से मेरे माथे को सहलाने लगीं. वह काफी देर तक मुझे शांत करने की कोशिश करती रहीं. मैं कुछ भी नहीं बोल रहा था — बस रो रहा था. मां को इस बात का कोई अंदाज़ नहीं था कि मैं इतना क्यों रो रहा हूं, उन्हें लगा कि शायद मुझे कहीं दर्द है. उन्होंने दर्द की ओर से मेरा ध्यान हटाने के लिए एक मां द्वारा अपनाए जाने वाले सभी तरीके अपनाए. मुझे बांहों में झुलाया, गले से लगाया, चूमा... मेरे साथ खेलने की कोशिश की.

इसी कोशिश में मां ने मुझे पलंग पर खड़ा किया, लेकिन फिर उन्होंने जो देखा उससे उनका दिल दहल गया.

मैं खड़ा ही नहीं हो पाया और एक बेजान पत्थर की तरह उनकी गोद में गिर गया. मां ने मुझे फिर से खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन मेरे पांव मेरा वज़न नहीं उठा पा रहे थे. मैं फिर से उसी तरह गिर गया. मां ने फिर कोशिश की, लेकिन फिर से वही नतीजा देखा. अब मां बहुत अधिक डर गईं, उन्हें एहसास हो गया था कि जिस तरह से मैं गिर रहा था उसका कारण केवल कमज़ोरी नहीं थी. बात अवश्य कुछ और ही थी. गिरते समय मेरा शरीर कोई प्रतिरोध नहीं कर रहा था. मां यह सब देखकर घबरा गईं और उन्होंने आंगन में चारपाई पर उनींदी-सी लेटी अम्मा को आवाज़ लगाई.

‘अम्माजी, ललित अपने पांवों पर खड़ा नहीं हो पा रहा है. मैं इसे सहारा देकर खड़ा कर रही हूं तो भी खड़ा नहीं हो पा रहा है’, मां ने लगभग रोते-रोते कहा. अम्मा यह सुनकर मां के पास आईं.

‘ऐसा कमज़ोरी के वजह से हो रहा होगा. कई दिन से बुखार नहीं उतरा है ना. ललति को मुझे दे और तू कुछ देर आराम कर ले’, अम्मा ने मां को तसल्ली देते हुए कहा. अम्मा मुझे ‘ललति’ ही कहा करती थीं.

अब अम्मा मुझे गोद में लेकर चुप कराने की कोशिश करने लगीं. मां ने जो कहा था उसे जांचने के लिए अम्मा ने भी मुझे पलंग पर खड़ा किया. नतीजा फिर से वही, मैं खड़ा नहीं हो पाया और एकदम से पलंग पर गिर गया.

अब घबराने की बारी अम्मा की थी. किसी अनहोनी की आशंका हल्की झुर्रियों वाले उनके चेहरे पर साफ दिखने लगी थी. अम्मा ने खूब ज़ोर से बाबा को आवाज़ लगाई और कुछ ही देर बाद मैं वापस उसी डॉक्टर की दुकान में था जिसने सुबह मुझे इंजेक्शन लगाया था. तब तक सूरज ने डूबना शुरू कर दिया था और रात की परछाईं हर चीज़ पर दिखाई देने लगी थी, लेकिन अंधेरे की सबसे गहरी परछाईं मेरे परिवार के मन पर पड़ रही थी. डॉक्टर भी मेरी स्थिति देखकर चिंतित हो गए और उन्होंने बाबा से कहा कि इस बच्चे को अस्पताल ले जाना होगा ताकि आगे जांच हो सके. चूंकि अंधेरा हो चुका था इसलिए अगले दिन का इंतज़ार करना पड़ा.

अगले दिन सूरज निकलते ही बाबा ने मेरे बुखार से तपते शरीर को अपनी बांहों में उठाया और अ6मा ने मुझे कपड़े से अच्छी तरह ढक दिया. मां ने उस समय तक रोटियां बना दी थीं. कुछ रोटी और थोड़ा-सा अचार एक पुराने अखबार में लपेटकर अम्मा ने साथ ले लिया. बाबा-अम्मा मेरी हालत देखकर समझ गए थे कि अस्पताल में देर लग सकती है, लेकिन अस्पताल में ज़रा भी देर नहीं लगी.

पहले मेरा मुआयना सफदरजंग अस्पताल की ओपीडी में एक डॉक्टर ने किया. उस डॉक्टर को किसी बात का शक हुआ तो उसने एक सीनियर डॉक्टर को बुलवा भेजा. सीनियर डॉक्टर आए और उन्होंने भी मेरी स्थिति देखी.

‘इस बच्चे को पोलियो हो गया है’, सीनियर डॉक्टर ने चिंतित आवाज़ में बाबा को बताया. बाबा को शायद पोलियो के बारे में कुछ नहीं पता था, पर डॉक्टर के चिंतित चेहरे को देखकर वह समझ गए कि स्थिति बहुत गंभीर है.

‘लेकिन डॉक्टर साब, ये ठीक तो हो जाएगा ना? इस बीमारी का इलाज तो होगा ही?’ बाबा ने अपनी आशाओं को बनाए रखने की साहस भरी कोशिश करते हुए पूछा.

‘नहीं. इस बीमारी का पूरी दुनिया में कोई इलाज नहीं है. यह बच्चा अब कभी नहीं चल पाएगा. इसके पैर कभी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाएंगे. हो सकता है कि ये थोड़ा-बहुत ठीक हो जाए, लेकिन वैसा कभी नहीं होगा जैसा यह पहले था’, डॉक्टर ने एकदम से कह दिया.

मुझे नहीं पता कि इन शब्दों को सुनकर बाबा पर क्या गुज़री. असीम दुख से रुंधे उनके गले की मैं केवल कल्पना ही कर सकता हूं. अस्पताल के डॉक्टरों ने मेरे लिए कुछ और दवाइयां दे दीं और बाबा से कह दिया कि बच्चे को घर ले जाओ.

भाग्य से पराजित दो वृद्धों की तरह अम्मा-बाबा आंखों में आंसू लिए और मुझे गले से लगाए, घर लौट आए. उस दिन ऐसा लग रहा था जैसे घर में किसी की मृत्यु हो गई हो. हर कोई रो रहा था. पापा, बाबा और कैलाश चाचा इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि अब मेरे इलाज को कैसे आगे बढ़ाया जाए.

मेरे परिवारजन आशा नहीं खोना चाहते थे... और इरादे के पक्के ये लोग आने वाले कई वर्षों तक इस बात के प्रति आशावान और कर्मशील बने रहे कि कोई तो इलाज होगा जो मुझे पूरी तरह ठीक कर देगा.

इधर मेरा बुखार अभी भी न उतरने की जि़द पर अड़ा था और मेरा दाहिना पैर पूरी तरह से निर्जीव हो चुका था. मैं दाहिने पांव को बिल्कुल भी नहीं हिला पा रहा था. यदि कोई इस पांव को हवा में उठाता और छोड़ देता तो मैं पांव को उठाए नहीं रख पाता था. मेरी कमर और कूल्हों की मांसपेशियाँ भी बुरी तरह से प्रभावित हुई थीं. इसके कारण मैं बैठ भी नहीं पा रहा था. बैठाने की कोशिश करने पर मैं लुढ़ककर इधर-उधर गिर जाता था. परिवारजन और मेरा हाल दरियाफ़्त करने आ रहे पड़ोसी बार-बार मुझे खड़ा करने या बैठाने की कोशिश कर रहे थे. जो मुझे इस हालत में पहली बार देख रहे थे, वे सुनाए गए हाल को स्वयं होता देखने के लिए मुझे खड़ा करने की कोशिश कर रहे थे. जो मुझे गिरते हुए देख चुके थे, वे भी मुझे बार-बार इस उम्मीद से खड़ा कर रहे थे कि शायद हालत में सुधार की कोई झलक दिख जाए.

लेकिन भविष्य में सुधार नहीं... बल्कि स्थिति का और बिगड़ना लिखा था.

प्रकृति मां के दिए काँटे को अभी और गहरा धंसना था. अभी और दर्द आना बाकी था.

अगले दिन भी मेरा बुखार तेज़ बना रहा और शाम होते-होते पोलियो का एक और हमला मुझ पर हुआ. शाम के वक्त मैं फिर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा और कुछ ही घंटों में मेरे बाएं पैर ने भी काम करना बंद कर दिया. परिवार के लोगों की बची-खुची आशाएं भी इस दूसरे हमले की भेंट चढ़ गईं. अब कमर से नीचे मेरा शरीर पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुका था. परिवारजनों की आशाएं निराशा के गहन अंधेरे में खो चुकी थीं. वायरस के दूसरे हमले से सभी को लगने लगा कि इस तरह एक-एक करके मेरे सभी अंग काम करना बंद कर देंगे और मेरा पूरा शरीर निष्क्रिय व निष्प्राण हो जाएगा. उस समय ऐसा लगने लगा था जैसे मैं धीमे-धीमे मौत की ओर बढ़ रहा था.

अगली सुबह बाबा मुझे फिर से सफदरजंग अस्पताल लेकर गए ताकि डॉक्टरों को बता सकें कि मेरे बाएं पैर ने भी काम करना बंद कर दिया है. मेरी स्थिति को जांचने के बाद डॉक्टर ने बाबा को बताया कि इस दूसरे हमले के बाद मेरे थोड़ा-बहुत ठीक होने के आसार और भी कम हो गए थे.

‘अब आपका पोता कभी भी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाएगा’, डॉक्टर ने बाबा से कहा.

पिछले कुछ दिन से जो कुछ हो रहा था, उसे देखते हुए बाबा को भी यह अंदाज़ा हो ही गया था. हर किसी को डॉक्टर से ऐसा ही जवाब मिलने की आशंका थी और परिवार के सब लोग खुद को इस खबर के लिए तैयार किए हुए थे, लेकिन फिर भी यह खबर पूरे परिवार पर आसमानी बिजली की तरह पूरी निर्ममता के साथ टूटकर गिरी.

आशाएं और दिल टूट चुके थे.

मेरे लिए यह एक ऐसे जीवन की शुरुआत थी जो निश्चित रूप से असामान्य होने वाला था. यह तय हो चुका था कि मेरे जीवन को ऐसे किसी भी सांचे से नहीं गुज़रना था जिन सांचों से अधिकांश लोगों के जीवन बने होते हैं.

आगे आने वाले भविष्य में मुझे तोड़कर बिखेर देने की बेपनाह ताकत थी और यह मुझ पर था कि मैं इस असामान्य जीवन की कठिनाइयों का प्रतिरोध करूं या इन कठिनाइयों के सामने आत्म-समर्पण कर पराजय स्वीकार कर लूँ.

प्रकृति मां का उपहार, वह कांटा, अब मेरे भीतर पूरा धंस चुका था. मैंने प्रकृति मां से नहीं पूछा कि आपने मुझे ही क्यों चुना. पोलियो वायरस के जिन कणों ने मेरे शरीर को तहस-नहस कर दिया था, वे कण मुझ पर हमला न करते तो हो सकता है कि किसी और को अपना निशाना बनाते. प्रकृति मां ने उन कणों को मेरे शरीर में कैद करके शायद किसी और की रक्षा की हो! प्रकृति मां से क्या पूछना... उनका आदेश सिर-आंखों पर!

मेरी जि़न्दगी के रजिस्टर में पोलियो ने अपनी उपस्थिति के हस्ताक्षर कर दिए थे. जीवन भर चलने वाली मेरी लड़ाई अब शुरू हो चुकी थी.