निर्देशक : आकिव अली

लेखक : लव रंजन, तरुण जैन, सुरभि भटनागर

कलाकार : अजय देवगन, तब्बू, रकुल प्रीत सिंह, जावेद जाफरी, जिमी शेरगिल, आलोकनाथ, कुमुद मिश्रा

रेटिंग : 2/5

यह माना जा चुका है कि निर्देशक लव रंजन ने मिसॉजिनी अर्थात् स्त्री-द्वेष को हिंदी सिनेमा के एक सफल जॉनर में तब्दील कर दिया है. ‘प्यार का पंचनामा’ से लेकर ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ तक की उनकी तमाम फिल्में हास्य की टेक लेकर तीन ही बातें मुख्य रूप से करती आई हैं – ब्रोमांस, लड़कियों से पीड़ित लड़के और चालू लड़कियां. उनकी शुरुआती फिल्म हल्की-फुल्की मजाकिया लगी भी थी, लेकिन जल्द ही समझ आ गया था कि जैसे इम्तियाज अली प्रेम-कहानियों से बेइंतहा प्रेम करते हैं, वैसे ही लव रंजन का सिनेमा स्त्री-द्वेष के बिना सांस नहीं ले सकता.

‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ नामक उनकी सफलतम फिल्म में तो लड़कों के बीच की दोस्ती की मिसालें देने के लिए भी उन्हें एक लड़की को नीचा दिखाने की जरूरत आन पड़ी थी. पूरी फिल्म इस बारे में थी कि सोनू (कार्तिक आर्यन) अपने लंगोटिया यार टीटू (सनी सिंह) की पसंद की लड़की को उसके लिए सही नहीं मानता और आखिर में टीटू भी अपनी टूटी अक्ल के मारे ‘तेरा यार हूं मैं’ गाना सुनते हुए अपने दोस्त की इस बायस्ड बात को सच मान लेता है. लेकिन फिल्म एक बार भी सलीके से नहीं दिखा पाती कि आखिर इस लड़की में ऐसी क्या खराबी है जो वो टीटू के लायक नहीं है. समझने वाले समझेंगे कि ऐसा करना एक किरदार को प्रॉपर कैरेक्टर-ग्रॉफ नहीं दे पाने की कमी तक सीमित नहीं था, बल्कि ये स्त्री-द्वेष का एक ऐसा चालू एजेंडा था जो लव रंजन की तमाम फिल्मों में स्थायी रूप में मिलता रहा है.

आश्चर्यजनक रूप से ‘दे दे प्यार दे’ उस तरह की फिल्म नहीं है. फिल्म में सेक्सिस्ट जोक्स व संवाद जरूर हैं, द्विअर्थी चुटकुले भी हैं और अखरने वाले आलोक नाथ भी मौजूद हैं. लेकिन फिल्म स्त्री-द्वेष की समस्या से कम से कम उस तरह पीड़ित नहीं है जैसे कि लव रंजन की बाकी फिल्में रही हैं. इस फिल्म को मिलाकर अब तक पांच फिल्में बना चुके लव रंजन ने पहली बार किसी लेखिका को अपनी पटकथा का हिस्सा बनाया है (सुरभि भटनागर) और हम मानकर चल रहे हैं कि उनके होने से भी ऐसा हुआ होगा कि फिल्म की दोनों प्रमुख नायिकाएं (तब्बू और रकुल प्रीत सिंह) मजबूत किरदार बनकर उभरी हैं. चालू लड़कियां नहीं.

लेकिन, यह मत समझिए कि ऐसा होने से फिल्म शानदार हो गई है! वैसे तो 50 साल के आदमी और 26 साल की लड़की की प्रेम-कहानी में तमाम संभावनाएं निकलकर आती हैं और जब असल में 50 की उम्र का सुपरस्टार (अजय देवगन) ऐसे रोल स्वीकार करता है तो फिल्म के प्रति उत्सुकता बढ़ना स्वाभाविक भी हो जाता है. हॉलीवुड में ‘अमेरिकन ब्यूटी’ (1999), ‘लॉस्ट इन ट्रान्सलेशन’ (2003) से लेकर ‘एन एजुकेशन’ (2009) और ‘फैंटम थ्रैड’ (2017) जैसी दर्जनों फिल्मों ने प्रौढ़ नायक और कम उम्र नायिका वाली कहानियां कही हैं और हिंदी फिल्मों में भी हम ‘लम्हे’ (1991) और ‘चीनी कम’ (2007) से लेकर ‘द लंचबॉक्स’ (2013) तक में ऐसे किरदारों के बीच के विभिन्न डायनामिक्स देख चुके हैं. सिचुएशनल कॉमेडी की टेक लेकर एक बार फिर ऐसी कहानी देखना दिलचस्प हो सकता था.

लेकिन ‘दे दे प्यार दे’ एडल्ट रोमांटिक कॉमेडी होने की चाहत और करण जौहर की फिल्मों सा पारिवारिक (मेलो) ड्रामा होने की महत्वाकांक्षा के बीच पिस जाने वाली फिल्म साबित होती है. फिल्म की शुरुआत में करण जौहर को स्पेशल थैंक्स अदा किया जाता है और फिल्म का दूसरा हिस्सा देखते हुए आप समझ पाते हैं कि ऐसा जौहर की सिनेमाई समझ का तगड़ा हैंगओवर होने की वजह से किया गया होगा.

अपने शुरुआती हिस्से में यह फिल्म रकुल प्रीत सिंह के 26 वर्षीय युवा और अजय देवगन के 50 वर्षीय मैच्योर पात्र के बीच इम्तियाज अली मार्का मनोरंजक बतकही से समां बांधने में कामयाब रहती है. सेक्सिस्ट ह्यूमर की यहां भी कमी नहीं है लेकिन उम्र के बड़े फर्क पर बनी रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों में जिस तरह की मजेदार सिचुएशन्स होनी चाहिए वो यहां आपको मिलती हैं. इंटरवल के बाद वाले हिस्से में यह मनोरंजन थोड़ी-थोड़ी देर के लिए लौटता है जब देवगन और रकुल प्रीत के किरदार देवगन के परिवार से मिलने पहुंचते हैं और कुछ दिलचस्प सिचुएशन्स हमारी नजर होती हैं.

लेकिन, खुद को स्त्री-द्वेष की लगातार होने वाली आलोचनाओं से दूर कर प्रगतिशील दिखाने के चक्कर में यह फिल्म इतने सारे प्रोग्रेसिव थॉट्स खुद में भर लेती है कि वो सब ऑर्गेनिक तरीके से कहानी का हिस्सा न लगकर दिखावा ज्यादा लगते हैं. लगता है कि लव रंजन की फिल्म का यह हिस्सा अगर पारिवारिक स्पेस में ले जाकर करण जौहर बनाते तो शायद वो ऐसा ही बनता! लिव-इन रिलेशन से लेकर राखी वाले सीन तक, और एक नायिका का बाकियों से ज्यादा समझदार निकलना जैसे कई बोल्ड तथा प्रोग्रेसिव घटनाक्रम व्यक्तिगत रूप से लुभा सकते हैं लेकिन कूल दिखने की यह चाहत पटकथा को ज्यादा मनोरंजक और दिलचस्प नहीं बना पाती. आखिर में ‘दे दे प्यार दे’ बड़ी उम्र के प्यार वाली मुख्य थीम से भटककर प्रिडिक्टिबल पारिवारिक मसाइल में उलझती चली जाती है और लव रंजन की फिल्मों का वो ‘एटीट्यूड’ तथा ‘इरवरेंस’ खो देती है जिनके लिए उनका सिनेमा मशहूर रहा है.

बताते चलें कि हमें भी पता है कि ‘दे दे प्यार दे’ का निर्देशन आकिव अली ने किया है और लव रंजन केवल उसके निर्माता व लेखक हैं! आकिव अली फिल्म इंडस्ट्री के वरिष्ठ एडीटर हैं और लव रंजन द्वारा निर्देशित सभी फिल्मों का संपादन उन्होंने किया है. वे रंजन की सिनेमाई दुनिया, सिनेमाई भाषा और रंग-रूप से भली भांति परिचित मालूम होते हैं और शायद इसीलिए ‘दे दे प्यार दे’ देखते हुए आपको लगता ही नहीं कि आप लव रंजन निर्देशित फिल्म नहीं देख रहे हैं. शुरू से हमने इसीलिए केवल लव रंजन का जिक्र किया क्योंकि आकिव अली की कोई मुख्तलिफ छाप इस फिल्म में नजर नहीं आती. फिल्म जरूरत से ज्यादा लंबी जरूर है और एडीटर से डायरेक्टर बने किसी भी शख्स के लिए इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है.

बाकी फिल्म में ह्यूमर के काफी छींटे मौजूद हैं और लव रंजन के सिनेमा को पसंद करने वाले दर्शकों को – जिनकी कि तादाद काफी है! – उनके सिनेमा की विशेषता इस फिल्म में आसानी से मिलने वाली है. साथ ही प्यार पर मैच्योर बतकही भी मिलेगी जिसे कि देखकर कुछ दर्शकों को लगेगा कि फिल्म वाकई प्रोग्रेसिव विचारों से पटी पड़ी है. लेकिन समझने वाले समझेंगे कि इन विचारों के ऊपर आखिर में बात वही है जो लव रंजन का सिनेमा हमेशा कहता रहता है, बस इस बार दूसरी तरह से कही गई है – मर्द आज भी ‘पीड़ित’ है और उसके लिए उसकी तमाम कमियों और गलतियों के बावजूद वो नहीं समाज तथा औरतें जिम्मेदार हैं. औरतें सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं!

स्क्रीन प्रेजेंस के मामले में रकुल प्रीत सिंह युवाओं को पसंद आएंगी क्योंकि चंचल, बिंदास, युवा और खूबसूरत नायिकाओं को दर्शक हमेशा से पसंद करता रहा है. इमोशनल दृश्यों में अभिव्यक्ति के मामले में वे आज भी कच्ची हैं लेकिन हल्के-फुल्के और रोमांटिक दृश्यों में प्रभावित करती हैं. ऐसी प्रभावशाली ग्लैमरस भूमिकाएं वे कई दक्षिण भारतीय फिल्मों में निभा चुकी हैं लेकिन चूंकि हिंदी फिल्मों के दर्शकों ने उनका यह रूप ज्यादा नहीं देखा है इसलिए इस बार वे रकुल प्रीत सिंह से पहली बार सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले हैं.

अजय देवगन वही करते हैं जो वे सालों से करते आ रहे हैं. चेहरे पर थकान इस फिल्म में भी मौजूद मिलती है और सारे इमोशन्स की अभिव्यक्ति वैसी ही है जैसी वे सैकड़ों बार दोहरा चुके हैं. लेकिन किरदार में जंचते हैं और इंटरवल के बाद वाले हिस्से में खासे प्रभावित करते हैं. उनको लेकर ज्यादा नुक्ताचीन होने का मन इसलिए भी नहीं करता कि वे 50 का होकर 50 साल के किरदार को जीवंत करना स्वीकार करते हैं, और हमारी आत्ममुग्ध इंडस्ट्री में ऐसा कम ही होता है.

ये अलग बात है कि 50 साल के आम आदमी जैसा दिखने के विपरीत वे 50 साल के सुपरफिट, सुपरस्मार्ट, सुपरहेल्दी, सुपररिच और सुपर-डिजायर्ड व्यक्ति की सुपरस्टार नुमा आसान भूमिका निभाना ही चुनते हैं!

तब्बू के कद लायक यह फिल्म थी ही नहीं. लेकिन उनका मैच्योर और लेयर्ड किरदार धीरे-धीरे असर छोड़ता है और फिल्म के आखिरी हिस्से में वे सबपर भारी पड़ जाती हैं. ‘मैं ही क्यों हमेशा बड़ी बनूं’ वाले एक संजीदा मोनोलॉग में तो दिल ही जीत लेती हैं और एक बार फिर बता देती हैं कि उनके कद की मकबूल अभिनेत्री इस फिल्म इंडस्ट्री के पास है ही नहीं. उनके लिए चाहें तो ‘अंधाधुन’ (2018) एक बार फिर से देख लीजिए!