ग्लोबल वॉर्मिंग है या ग्लोबल वॉर्मिंग नहीं है? यह सवाल काफी पेचीदा है. 1824 में पहली बार जब जोसेफ़ फोरिएर ने ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट का पता लगाया तो दुनिया ने जाना कि कार्बन डाइऑक्साइड (सीओटू) का धरती के तापमान से क्या संबंध है. उसके बाद 1896 में स्वीडन के फ़िज़िकल कैमिस्ट स्वांते अर्हेनियस ने एक शोधपत्र में लिखा कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा दोगुनी होने का मतलब है धरती का औसत तापमान कई डिग्री तक बढ़ जाना.

19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में धरती के तापमान को लेकर कई वैज्ञानिक सिद्धांत-धारणाएं मौजूद थीं. इस संबंध में वैज्ञानिकों के लिए कार्बन डाइऑक्साइड का बढ़ना उतना ही महत्वपूर्ण कारण हो सकता था जितना कि कोई अन्य. और फिर अर्हेनियस के शोधपत्र में कई कारकों का संज्ञान नहीं लिया गया था, जैसे कि तापमान बढ़ने से हवा में नमी बढ़ेगी जिससे बादल बनेंगे, ज़्यादा बादल सूर्य के प्रकाश को ज़्यादा परावर्तित करेंगे और कार्बन डाइऑक्साइड को प्रभावहीन कर देंगे. ऐसी दलीलों के चलते तब से ही इस सिद्धांत पर सवाल उठते रहे हैं.

अगला तर्क इस यकीन का दिया गया कि धरती की प्राकृतिक व्यवस्था इतनी विशाल और मजबूत है कि मानवीय गतिविधियों की वजह से इसमें बदलाव नहीं आने वाला. वायुमंडल, समुद्र, चट्टानें और बर्फ़, यह पूरी व्यवस्था खुद को नियंत्रित करती है. समुद्रों में वायुमंडल से 50 गुना ज़्यादा कार्बन डाइऑक्साइड है, धरती की बढ़ी हुई गैस भी उसी में सोख ली जाएगी. लिहाज़ा ग्लोबल वॉर्मिंग संभव ही नहीं थी. लेकिन अर्हेनियस के विचार को एक संशय के तौर पर ही सही, किताबों में जगह मिलती रही. 1957 में रॉजर रिवैल और हाउस स्यूस ने अपने शोधपत्र में बताया कि समुद्र के पानी में एक निश्चित मात्रा में सीओटू घोलने के बाद उसकी एसिडिटी को इतना बदला जा सकता है कि फिर उसमें इस गैस को और सोख लेने की क्षमता नहीं बचती. इसके दो साल बाद चार्ल्स डेविड कीलिंग ने बाकायदा नापकर बताया कि धरती पर सीओटू स्तर लगातार बढ़ रहा था. अब ग्लोबल वार्मिंग के सिद्धांत को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो गया.

कीलिंग अकेले वैज्ञानिक थे जो इस पर काम करते रहे. सत्तर के दशक में कीलिंग कर्व (कीलिंग द्वारा मापा गया कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर) लगातार बढ़ता गया. मतलब साफ था कि मानवीय गतिविधियां वायुमंडल में गर्मी बढ़ा रही थीं. 1980 में ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक की बर्फ़ के भीतरी हिस्से (जो बीते हिमयुग में भी मौजूद था) की जांच करने पर पाया गया कि कार्बन डाइऑक्साइड के बढ़ने का सीधा संबंध तापमान बढ़ने से है. इसके बाद ज़्यादा से ज़्यादा वैज्ञानिकों ने ग्लोबल वॉर्मिंग को गंभीरता से लेना शुरू किया. आम जनता ने भी इस मसले में दिलचस्पी ली, जिसकी वजह से दुनिया की सरकारों पर ग्रीन हाउस गैसों की बढ़ोतरी पर रोक लगाने के लिए नीतियां बनाने का दबाव बढ़ा और उसी के साथ बढ़ा पेट्रोलियम उत्पादों का उपभोग घटाने का दबाव. और हां इसे पेट्रोलियम इंडस्ट्री से सबसे ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने वालों की बेचैनी भी बढ़ी क्योंकि वे किसी भी स्थिति में नहीं चाहते कि उनका मुनाफ़ा कम हो.

मैनहैटन प्रोजेक्ट (इसी के तहत अमेरिका ने परमाणु हथियार विकसित किए थे) के वैज्ञानिकों द्वारा शुरू किए गए बुलेटिन ऑफ एटॉमिक साइंटिस्ट्स में 2011 में छपा शोधपत्र ‘ग्लोबल वॉर्मिंग : हाउ स्केप्टिसिज़्म बिकेम डिनायल’ इस पर काफी जानकारी मुहैया कराता है. इसके मुताबिक़ ग्लोबल वॉर्मिंग की मुख़ालफ़त करने वालों को सीधे कहने की ज़रूरत नहीं थी कि ग्लोबल वॉर्मिंग झूठ है. इन्हें बस रूढ़िवादी मीडिया और थिंकटैंक के ज़रिए ग्लोबल वॉर्मिंग के सिद्धांत पर संशय पैदा करना था. 1989 में इसी तरह की एक रूढ़िवादी संस्था जॉर्ज सी मार्शल इंस्टीट्यूट ने एक गुमनाम रिपोर्ट छापी जिसमें ग्लोबल वॉर्मिंग पर बनी वैज्ञानिक समुदाय की सहमति पर सवाल उठाते हुए दलीलें दी गई थीं. इसे जाने-माने फिज़िसिस्ट फ़्रेड्रिक सीट्ज़ का समर्थन मिला, जिनका मौसम विज्ञान से कोई लेना-देना नहीं था. इसी साल विभिन्न जीवाश्म ईंधन और अन्य औद्योगिक कॉर्पोरेट्स ने मिलकर ग्लोबल क्लाइंट कोएलिशन भी बनाया, जिसने इस शोधपत्र में दी गई दलीलों को आगे बढ़ाना शुरू किया. इस कोएलिशन ने इसी तरह के लेख, भाषण और वीडियो बनाकर उन्हें पत्रकारों तक भेजने और सीधे विज्ञापन छपवाने पर लाखों डॉलर खर्च किए.

इस बीच ग्लोबल वॉर्मिंग और इसकी वजह से होने वाले जलवायु परिवर्तन की बात करने वालों पर आरोप लगाया गया कि लोगों को डराने के लिए यह सत्ता चाहने वाले नौकरशाहों और अतिवादियों की चाल है. चौंकाने वाली बात यह रही कि कुछ पत्रकारों ने इसे ऐसे परोसा जैसे यह वैज्ञानिकों के दो बराबर धड़ों के बीच की बहस हो. ग्लोबल वॉर्मिंग पर सवाल उठाने वालों के सभी सवालों के वैज्ञानिक जवाब दिए गए, लेकिन उनका रुख़ नहीं बदला. इन सवाल उठाने वालों में शामिल गिनती के वैज्ञानिकों पर‌ ग़ैर-वैज्ञानिक तरीक़े से अपनी पसंद का डेटा इस्तेमाल करने के भी आरोप रहे. इसके अलावा इनके ज़्यादातर शोध साथियों द्वारा रिव्यू किए जाने वाले भरोसेमंद जर्नलों के बजाय किताबों, पैंफलेटों और रूढ़िवादियों के पसंदीदा अख़बारों में छप रहे थे.

1996 में आई इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आइपीसीसी) की दूसरी रिपोर्ट में जब यह साफ किया गया कि बदलती जलवायु के लिए मानव गतिविधियों की ज़िम्मेदारी स्पष्ट है, तो तेल लॉबी सकते में आ गई. अमेरिकी अख़बारों में संपादक के लिए लिखे जाने वाले पत्रों, रिपोर्टों आदि के ज़रिए आरोप लगाए गए कि रिपोर्ट के नतीज़े जानबूझकर ग़लत लिखे गए हैं. फिज़िसिस्ट फ्रेड्रिक सीट्ज़ ने वॉल स्ट्रीट जर्नल में रिपोर्ट के मुख्य लेखक और वैज्ञानिक बेंजमिन डी सेंटर पर भ्रष्टाचार और रिपोर्ट से छेड़छाड़ का आरोप लगाया. वैज्ञानिक समुदाय में ऐसा पहले नहीं हुआ था. इसने न सिर्फ लेखक को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया बल्कि ग्लोबल वॉर्मिंग की वैज्ञानिक बहस को इस तरह धुंधला कर दिया कि पत्रकारों और लोगों के लिए यह पहचानना मुश्किल होने लगा कि किस पर भरोसा किया जाए.

हालांकि यह रिपोर्ट आने के करीब आठ साल पहले तक यह स्थिति नहीं थी. जून 1988 में नासा के इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्पेस स्टडीज़ के तत्कालीन निदेशक जेम्स हैनसन ने यूएस सीनेट इनर्जी एंड नेशनल रिसोर्सेज़ कमेटी के सामने कहा था कि अब हम यकीन के साथ कह सकते हैं कि बढ़ते तापमान के लिए ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट ज़िम्मेदार है और इसके चलते जलवायु बदल रही है.

इस घटना के चार साल बाद, 1992 में यूनाइटेड नेशंस फ़्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज का ड्राफ़्ट बना जिसपर 165 देशों ने दस्तखत किए. फ़िलहाल इन देशों की संख्या 191 है. इसका मक़सद था मानवीय गतिविधियों के कारण बढ़ीं ग्रीन हाउस गैसों को उस स्तर पर ले आना कि वे जलवायु परिवर्तन का कारण न बनें. यानी ऑद्योगिक क्रांति से पहले विश्व का जितना तापमान था, अब उसके बाद तापमान में होने वाली बढ़ोतरी को दो डिग्री सेल्सियस के भीतर रखा जाए. दस्तखत करने वाले ये देश अब तक 25 बार बैठक करके जलवायु परिवर्तन से जुड़े लक्ष्यों पर चर्चा कर चुके हैं. इनका ही नतीजा था कि 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल तैयार हुआ और 2015 में पेरिस समझौता किया गया. इनका मकसद और तेजी से ग्लोबल वॉर्मिंग रोकने की दिशा में काम करना है.

पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को कार्बन उत्सर्जन कम करने की योजना बनाकर उस पर अमल करना था. इसके अलावा विकसित देशों को इस काम के लिए विकासशील और अल्प विकसित देशों की आर्थिक मदद भी करनी थी. इस ग़ैर-बाध्यकारी समझौते में अपने आप में तमाम ख़ामियां हैं. जैसे कि यह मापने की कोई व्यवस्था नहीं कि जितना कार्बन उत्सर्जन कम करने का वादा किया गया, क्या वाक़ई उतना काम भी हुआ. भारत और चीन जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की योजनाओं को यूं भी शक की नज़र से देखा गया, क्योंकि यहां एक तरफ तो बिजली उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भरता को 40 फीसदी कम करने की बात हो रही थी, वहीं कोयला उत्पादन दोगुना करने की तैयारियां भी जारी थीं!

जून 2017 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहते हुए इस समझौते से पीछे हटने के इरादे ज़ाहिर कर दिए कि चीन और भारत जैसे देशों को इसका अनुचित लाभ मिल रहा है. वे कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ाएंगे और विकसित देशों से पैसा भी लेंगे. ट्रंप के पीछे हटने के कारणों में अमेरिका के पेट्रोलियम उद्योगों को होने वाला संभावित नुक़सान भी शामिल था. मगर ध्यान दिया जाए तो अमेरिका का राष्ट्रपति बनने से बहुत पहले ही ट्रंप उन लोगों में शामिल थे जिनके लिए ग्लोबल वॉर्मिंग एक बेतुका ख़याल था. 2012 में उन्होंने कहा भी था कि ग्लोबल वॉर्मिंग को चीन के लोगों द्वारा ईजाद किया गया है ताकि वे अमेरिकी उद्योगों को प्रतियोगिता से बाहर कर सकें. वे अक्सर ट्विटर पर ग्लोबल वॉर्मिंग की रोकथाम पर खर्च होने वाले अमेरिकी डॉलर पर नाराज़गी जताते रहे हैं.

तो बात सिर्फ वैज्ञानिकों और कॉर्पोरेट तक नहीं रही. राजनेता भी इस विवाद का हिस्सा बन गए. देखा जा रहा है कि रूढ़िवादी दक्षिणपंथी पार्टियां जहां ग्लोबल वॉर्मिंग को समस्या या मानव जनित समस्या की तरह देखने को तैयार नहीं हैं, वहीं उदारवादी पार्टियों के लिए पर्यावरण अहम मसला है. कंज़र्वेटिव ट्रंप की बात हम ऊपर कर चुके हैं, वहीं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी हमने कहते हुए सुना कि ‘क्लाइमेट चेंज नहीं हुआ है, हम चेंज हो गए हैं.’ दिलचस्प बात यह है कि स्वीडन की चामर्स यूनिवर्सिटी के असोसिएट प्रोफ़ेसर ने अपने एक शोध के ज़रिए दिखाया है कि दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद और जलवायु परिवर्तन से इनकार करने में परस्पर संबंध है.

एक बात तो तय है कि बाज़ारवाद और सतत विकास या फिर कार्बन उत्सर्जन में कमी और औद्योगीकरण, ये सब एक साथ नहीं चल सकते. तो फिर ग्लोबल वॉर्मिंग का क्या किया जाए, ये सवाल वाक़ई पेचीदा है. लेकिन नवंबर 2018 में जलवायु परिवर्तन के खिलाफ स्वीडन में स्कूली बच्चों की हड़ताल शुरू करने वालीं 16 साल की ग्रेटा थुनबारी को यह ज़रा भी पेचीदा नहीं लगता.

सोशल मीडिया पर काफी चर्चित रहे यूनाइटेड नेशंस क्लाइमेट चेंज कॉन्फ़्रेंस में ग्रेटा कहती हैं, ‘...आप सिर्फ हरित, सतत, आर्थिक विकास की बात करते हैं क्योंकि आप अपनी लोकप्रियता खोने से डरते हैं. आप सिर्फ उन्हीं खराब विचारों के साथ आगे बढ़ते रहने की बात करते हैं जिन्होंने हमें इस मुसीबत में डाल दिया है. जबकि इस वक्त अगर कोई समझदारी भरा काम करने को बचता है तो वो है आपातकालीन ब्रेक लगा देना. जो जैसा है, उसे वैसा बताने की परिपक्वता तक आपके पास नहीं है, इसका बोझ भी आपने हम बच्चों के ऊपर डाल दिया है. लेकिन मुझे अलोकप्रिय होने की चिंता नहीं है, मुझे जलवायु के लिए न्याय और एक जीवित धरती की चिंता है. मुट्ठीभर लोगों के लिए ढेरों पैसा कमाने के अवसर बनाए रखने के लिए हमारी सभ्यता को क़ुर्बान किया जा रहा है. हमारे जैवमंडल की बलि चढ़ाई जा रही है ताकि मेरे जैसे देशों के अमीर लोग ऐश-ओ-आराम के साथ रह सकें.’

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