विकास बहुगुणा सत्याग्रह के सह-संस्थापक और वरिष्ठ संपादक हैं.


मंगसिरू! हे मंगसिरू! बिजोक पड़गि..बल्द खयालि बाघन (मंगसिरू! वज्रपात हो गया..बाघ ने बैल को खा लिया)

सुबह-सुबह मैं आधी नींद में सोया हुआ था कि चाचा को लगाई जा रही दादी की इस हांक से मुझे भी जैसे करंट सा लगा. जून का महीना था. मॉनसून से पहले होने वाली बारिशें शुरू हो गई थीं. इसके साथ ही हवा में काई की वह गंध समाने लगी थी जो पहाड़ों में चौमासे की पहचान होती है. रात भर बिजली की तेज गड़गड़ाहट के साथ मेघ बरसते रहे थे. उधर, दादी की बड़बड़ाहट जारी थी. उसका कुल जमा सार यह था कि रात को उसने कहा भी था कि बारिश हो सकती है और बैलों को भीतर ही बांध दिया जाए, लेकिन बूढ़ों की सुनता कौन है.

दोनों बैल घर से थोड़ी दूर, खाली पड़े एक दूसरे मकान के दालान में बांधे गए थे. हड़बड़ाए चाचा उधर की तरफ निकले. उत्सुकता में मैं भी उनके साथ हो लिया. लेकिन मौके पर पहुंचते ही मेरे होश फाख्ता हो गए. एक बैल की लाश जमीन पर पड़ी थी. बाघ उसका करीब आधा हिस्सा चट कर चुका था. पास बंधा दूसरा बैल घबराहट के मारे रंभाता हुआ अपनी खूंटी के चारों तरफ घूमे जा रहा था.

मेरी कल्पना में रात का दृश्य घूमने लगा. कैसे अंधेरे में कड़कती बिजली और बरसते पानी में बाघ आया होगा, उसने इस बैल की गर्दन पर दांत गड़ाए होंगे और खूंटे से बंधा यह असहाय जीव सिर्फ छटपटाकर रह गया होगा. बगल में खड़ा उसका दूसरा जोड़ीदार भी बस देखने और एक दायरे में कूदने-फांदने के अलावा कुछ नहीं कर पाया होगा. सोचते-सोचते मुझे सिहरन हो आई.

उधर, चाचा के चेहरे पर अफसोस उभर आया था. 30 साल पहले उन दिनों पहाड़ों में पशुधन बड़ी संपत्ति हुआ करता था. चाचा ने कुछ दिन पहले ही बैलों की यह जोड़ी बनाने में कामयाबी पाई थी. यह उनका हुनर भी था और शौक भी. पहले वे कहीं से दो बछड़े जुटाकर लाते. उन्हें साथ बांधते. उनके सींग बढ़ाने के लिए उन पर तेल की मालिश करते. बछड़े एक दूसरे के साथ सहज हो जाते तो धीरे-धीरे उनके कंधे पर जुआ रखा जाता और इसके साथ ही थोड़ी देर के लिए उन्हें चलाया जाता. फिर जुए के साथ हल भी जोड़ा जाता. बछड़ों को खेत में साथ चलने, रुकने और मुड़ने के लिए खास आवाजों की ट्रेनिंग दी जाती. करीब साल भर की मशक्कत के बाद ही बैल हीरा-मोती बन पाते थे. इसके बाद चाचा कोई अच्छा खरीदार मिलने पर उन्हें बेच देते.

तो कुल मिलाकर बाघ ने समय और पैसे दोनों का नुकसान कर दिया था. लेकिन यह चाचा की चिंता थी. मेरे मन में तो इस बात ने खलबली मचा दी थी कि बाघ आसपास ही कहीं घूम रहा है. मैं जितना इस ख्याल को झटकने की कोशिश करता वह उतना ही दिमाग में जमता जाता. उधर, दादी का कहना था कि बैल की लाश ठिकाने लगाए जाने के बाद भी बाघ बचा हुआ माल उड़ाने की फिराक में रोज रात उसी जगह पर आ रहा है. इसने मेरी हालत और खराब कर दी. हालत यह हो गई कि रात घिरते ही मेरी घिग्घी बंधने लगती. इसकी एक वजह यह भी थी कि शौचालय घर से थोड़ी दूरी पर था और इस तरह की दशा में रात-बेरात वहां जाना बड़ी हिम्मत का काम था. वैसे भी ऐसी मजबूरी कभी न कभी आ ही जाती थी. ऐसे में साथ के लिए दादी को उठाया जाता.

खैर, अगले दो-तीन हफ्ते गुजर गए. इस दौरान कोई तीन-चार बार रात में दादी को जगाकर शौचालय जाने की नौबत आई. लेकिन कोई डराने वाली बात नहीं हुई. फिर एक-दो बार हिम्मत करके अकेले भी हो आया. अपना डर भगाने के लिए मैंने एक तरीका भी खोज लिया था. मैं हल्की आवाज में कुछ गुनगुनाने लगता था. धीरे-धीरे बाघ का डर पीछे छूट गया.

लेकिन पीछे छूटने वाली चीजें कभी-कभी अचानक सामने आकर आपको झटका दे ही जाती हैं. एक रात मैं शौचालय की तरफ जाते हुए और अपने डरभगाऊ फॉर्मूले पर अमल हुए कुछ गुनगुना रहा था कि एक हल्की गुर्राहट सी सुनाई पड़ी. मेरे डर पर बीते कुछ दिनों में लगे हिम्मत के सारे ताले क्षण भर में टूट गए. चंद्रमा की हल्की रोशनी में मैंने देखा कि शौचालय की छोटी सी छत पर एक काली छाया पसरी हुई है. मां-दादी से सुनता रहा था कि बाघ जब सामने होता है तो आदमी पर वशीकरण जैसा कुछ हो जाता है, वह अपनी जगह से हिल नहीं पाता. वशीकरण का तो पता नहीं, पर मेरे पांव डर के मारे अपनी जगह पर जम गए थे. भागने में इस जीव को मात नहीं दी जा सकती थी, यह पहले से साफ था.

इसके बाद कुछ ही पल गुजरे होंगे, लेकिन मेरे दिमाग में न जाने कितने ख्याल आकर चले गए. जैसे कि मैं भाग रहा हूं और बाघ ने पीछे से झपट्टा मारकर मेरी गर्दन दबोच ली. या फिर उसने खड़े-खड़े ही मेरा काम-तमाम कर दिया. मुझे भगवान भी याद आया और उसका नाम लेकर खाई गई और बार-बार तोड़ी गई वह कसम भी कि कल से जरूर मैं गर्मियों की छुट्टियों के लिए स्कूल से मिला होमवर्क करना शुरू कर दूंगा. मैंने मन ही मन फिर कसम खाई कि इस बार कसम नहीं तोड़ूंगा.

तभी बाघ ने हरकत की. वह उठा. इसके बाद अगले दो पैरों पर झुककर उसने एक लंबी अंगड़ाई ली और फिर छलांग मारते हुए पास ही लहराती झाड़ियों में गुम हो गया.

अगले ही पल मैंने भी उल्टी तरफ दौड़ लगा दी.