किसी ने मुझसे पूछा कि क्या हिंदी में इस समय कोई ऐसे लेखक हैं जो हिंदुत्व का सर्जनात्मक या बौद्धिक समर्थन करते हों? मुझे तुरंत कोई नाम नहीं सूझा और अब जब ये पंक्तियां लिखी जा रही हैं, तब भी मुझे ऐसा कोई नाम नहीं सूझ रहा है. मेरे ज्ञान की सीमा है और हो सकता है कि ऐसे लेखक हों जिसके बारे में मुझे पता नहीं. ऐसे लेखक तो हैं, जो नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के समर्थक हैं और जिनको पांच साल और सत्तारूढ़ करने के लिए उन्होंने चुनाव के दौरान अपील जारी की है. उनमें से कुछ को मैं जानता हूं और सर्जनात्मक या बौद्धिक लेखन में हिंदुत्व के समर्थन का संदेह मुझे नहीं होता है. मैं यह मानता हूं कि शायद उनमें से अधिकांश का लेखन मैंने इस दृष्टि से ध्यान से नहीं पढ़ा है. पर मेरे ऊपर कुल मिलाकर यह प्रभाव पड़ा है कि जो बहुत थोड़े लेखक नमो भाजपा के ज़ाहिरा तौर पर समर्थक हैं, अपने लेखन में उनके द्वारा प्रचारित संकीर्णता, भेदभाव, दूसरों के साथ अन्याय आदि का समर्थन नहीं करते हैं.

इसके कम से कम दो आशय निकलते हैं. एक कि जिस राजनीति का मुखर समर्थन ये लेखक धड़ल्ले से कर रहे हैं उसकी कोई प्रासंगिकता उनके लेखन के लिए नहीं है याने यह एक तरह का दुचित्तापन है, नैतिक अन्तर्विरोध है. दूसरा कि इस राजनैतिक दृष्टि की साहित्य में सर्जनात्मक संभावनाएं न के बराबर हैं- वह एक अनुर्वर राजनीति है. एक तीसरा आशय भी निकाला जा सकता है कि हिंदी में साहित्यसृजन के स्तर पर हिंदुत्व का सहारा या समर्थन नहीं लिया या किया जा सकता.

इस अन्तर्विरोध या दुचित्तेपन का हिंदी में कुछ इतिहास भी है. विद्यानिवास मिश्र भाजपा सरकार द्वारा ही राज्यसभा में नामज़द किये गये थे. उन्होंने बाबरी मस्जिद के ध्वंस पर लगभग प्रसन्नता ज़ाहिर की थी, अपने द्वारा संपादित अख़बार में. पर उनकी दृष्टि साहित्य में सकलतामूलक थी और उन्होंने कालिदास, जयदेव, महाभारत और रामायण पर जो विस्तार से लिखा है उसमें, अन्य चीज़ों के अलावा, जिस भारतीय दृष्टि पर बल दिया है उसमें न तो हिंदू दृष्टि को भारतीय दृष्टि का केन्द्रीय तत्व मानने का कोई दुराग्रह है, न ही हिंदुत्व की जग ज़ाहिर संकीर्णता, भेदभाव, घृणा आदि का कोई दबा-छुपा सही समर्थन ही. निर्मल वर्मा अपने जीवन और लेखन के अन्तिम दशक में भाजपा के प्रति आकर्षित हुए थे लेकिन उनके लेखक और विचार में किसी तरह की संकीर्णता नहीं आयी थी. वे भारतीय मनीषा में आयी फांक का ज़िक्र करते थे, आत्मबोध के अभाव का भी. पर किसी हिंसक-आक्रामक या घृणापरक संकीर्ण राजनीति का समर्थन कहीं नहीं मिलता.

इस विश्लेषण से एक उत्साहवर्द्धक नतीजा निकालने के लोभ से मैं नहीं बच पा रहा हूं. वह यह है कि चूंकि साहित्य सत्य की रंगभूमि है और भारतीय दृष्टि अनेक बहुलताओं से गढ़ी गयी है, उसमें किसी संकीर्ण दृष्टि की जगह हो ही नहीं सकती. साहित्य-व्यवहार और समाज-व्यवहार में फांक हो सकती है पर भरोसा तो हम साहित्य पर ही कर सकते हैं. समाज में झूठ का व्यापार और उसका समर्थन चल सकता है पर साहित्य में प्रथमतः और अन्ततः सत्य की ही जगह है.

न जाने क्यों मुझे याद आया कि जब अमरीकी उपनिवेशों को स्वतंत्रता देने पर लंदन में हाउस ऑफ कॉमन्स में बहस चल रही थी तो एडमण्ड बर्क ने अपने एक प्रसिद्ध भाषण में कहा था (वह अंग्रेज़ी गद्य का अद्भुत नमूना माना जाता है) कि अंग्रेज़ी स्वतंत्रता की भाषा है और उसमें स्वतंत्रता के विरुद्ध तर्क किया ही नहीं जा सकता. मैं कहना चाह रहा हूं कि शायद हिंदी बहुलता और समावेश की भाषा है जिसमें बहुलता और समावेशिता के विरुद्ध साहित्य रचा ही नहीं जा सकता. बर्क ने अंग्रेज़ी में एक सुलेमानी अभिमान से दावा किया था. क्या मैं हिंदी में अपनी लोकतांत्रिक कलावादी आस्था से ऐसा दावा कर सकता हूं? जबकि उसी हिंदी अंचल में संकीर्णता, धर्मान्धता, परस्पर दुर्भाव, जातिवाद, स्त्रियों-दलितों-मुसलमानों-आदिवासियों की ग़ैर-बराबरी और उनके साथ अन्याय का ऐसा बोलबाला है. कई बार यह कह चुका हूं कि कम से कम आज हिंदी साहित्य हिन्दी समाज का असली और लगभग स्थायी प्रतिपक्ष है.

एक रोमिला शाम

हाल में एक शाम पहली बार मूर्धन्य वयोवृद्ध इतिहासकार रोमिला थापर के घर गुज़री. वे अकेले जिस घर में दशकों से रहती आयी हैं एक बड़ा किताबघर है. बड़े घर में हर कमरे में किताबों की करीने से लगी कतारें हैं. मेरा छोटा सा फ्लैट भी ऐसा ही, आकार में छोटा, पर आकांक्षा में बड़ा किताबघर है. जैसे मैं चिंतित हूं कि मेरे बाद इन हज़ारों किताबों का क्या होगा वैसे रोमिला जी भी चिंतित हैं. यह एक स्थायी विडंबना है कि किताब लिखनेवालों को लगातार यह चिन्ता सताती है कि किताबों का क्या होगा, आगे जाकर.

रोमिला जी इस समय देश में जो हो रहा है उससे भी बहुत चिंतित हैं. उन्हें लगता है कि जैसे चीन में सांस्कृतिक क्रान्ति के नाम पर परम्परा, इतिहास, स्मृति, ज्ञान,सृजन का बहुत कुछ नष्ट कर दिया गया था और उस क्षति की पूर्ति दशकों बाद भी चीन नहीं कर पाया है वैसी ही स्थिति भारत में हिन्दुत्व, धर्मान्धता, संकीर्णता, हिंसा,हत्यारी और ज्ञान तथा परंपरा विरोधी मानसिकता पैदा कर रही है. ज्ञान, बुद्धि, इतिहास और स्मृति की ऐसी अवमानना पहले कभी नहीं हुई है. उनको लगता है कि भारतीय धार्मिक परम्परा में प्रायः हर धर्म में रूढ़िवादिता और उसका विरोध लगातार रहे हैं. इधर लग रहा है कि रूढ़िवादिता ने सभी धर्मों को प्रायः इकहरा बना दिया है और उनमें कोई आन्तरिक विरोध बाक़ी नहीं रहा.

हम देर तक सार्वजनिक संवाद में आयी अभद्रता, असहिष्णुता, तर्कतथ्यहीनता, गाली-गलौज पर बात करते हैं. रोमिला जी के इतिहासलेखन से असहमत हुआ जा सकता है पर उनकी भद्रता और प्रखरता को नज़रंदाज नहीं किया जा सकता. उनका स्पष्ट मत है कि अगर वर्तमान सत्तारूढ़ शक्तियां फिर सत्ता में आ गयीं तो भारत में बौद्धिक और सर्जनात्मक जीवन और संस्थाएं गहरे अत्यन्त क्षतिकारी संकट में फंस जायेंगी. जो भी हो, बुद्धिजीवी, लेखक और कलाकार, पाठक और दर्शक-श्रोता प्रतिरोधात्मक भूमिका में रहे आये यह ज़रूरी है. मैंने कहा हमें अड़ंगे बने रहना होगा.

पुरस्कार-वापसी, तपस्या और फ़कीरी

2015 में जब कुछ लेखकों और कुछ अल्पसंख्यकों की हत्याओं ने यह प्रभाव पैदा किया था कि देश में असहिष्णुता बढ़ रही है और सत्ता उसे चुपचाप देख रही है, स्वतःस्फूर्त ढंग से कई भाषाओं के लेखकों ने अपने पुरस्कार वापस कर इसका मुखर और ध्यानाकर्षक विरोध किया था. तब उस पर प्रधानमंत्री ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी. अब लगभग 4 वर्ष बाद, चुनाव के दौरान, उन्हें कम से कम दो बार अपने प्रहारों के लिए इस वापसी की याद आयी है. लेखकों के उस असंगठित समूह को गैंग कहकर, मानो कि वे अपराधी हों. उन्हें विदेशी धन द्वारा पोषित बताया गया और जो राजस्थान में एक दलित की हत्या पर चुप्पी साधकर सो गया.

जिन लेखकों ने पुरस्कार वापस किये थे वे अपने क्षेत्र में अलग-अलग ऐसी घटनाओं पर तीव्र प्रतिक्रिया करते रहे हैं. मैं ही अपने इस स्तम्भ और अनेक वक्तव्यों में दलितों-अल्पसंख्यकों-स्त्रियों आदि पर बढ़ रहे अत्याचारों और उससे प्रगट हिंसक-हत्यारी राजनीति के विरुद्ध लगातार लिखता रहा हूं. प्रधानमंत्री के पास अपार शक्ति, साधन और खुफ़िया एजेंसियां हैं और उन्होंने आज तक एक भी लेखक के बारे में यह पता लगाया कि उसे पुरस्कार वापसी के लिए कहीं से धन मिला. लेखक पुरस्कार वापस कर चुके. अब अगर ऐसी घटनाएं हों तो वे और क्या कर सकते हैं, सिवाय लिखकर विरोध करने के अलावा? यह विरोध अगर सत्ता के ध्यान में नहीं आता तो यह उसकी अक्षमता है, लेखकों की ज़िम्मेदारी नहीं. सत्ता यह भी भूल जाती है, जैसे कि मीडिया भी, कि लेखकों की पहल का लगभग पांच सौ वैज्ञानिकों ने भी मुखर और तर्कसंगत समर्थन किया था चार सौ कलाकारों-कलाविदों के साथ-साथ.

हमारे यहां तपस्या मुक्ति के लिए किये जाने की परम्परा है, सत्ता के लिए नहीं. प्रधानमंत्री भूल जाते हैं कि उनकी लंबी तपस्या के अलावा कई लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी आदि भी इतने ही लम्बे समय से बुद्धि, सृजन, ज्ञान के लिए तपस्या करते रहे हैं और अगर उन्हें भारतीय समाज में आदर-सम्मान मिला है तो इसी कारण. कृष्णा सोबती, नयनतारा सहगल, गणेश देवी, पुष्प भार्गव आदि हमारे समय में सर्जनात्मक और वैज्ञानिक तपस्या की ही शबीहें हैं. उनमें से किसी ने ऐसे तपस्वी होने का स्वयं कोई बड़बोला दावा नहीं किया है.

इन दिनों अतर्किक उत्साह में जो सबसे सुवेशित है वही फ़कीरी का दावा कर रहा है. ‘मन लागा मेरा यार फ़कीरी में’ कविता एक कवि की है, किसी सत्ताधारी की नहीं. इस देश में फ़कीरी के कई प्रकार रहे हैं. आम तौर पर लेखक और कलाकार, साधनों और अवसर के अभाव में, कठिन साधना कर अपना जीवन किसी न किसी तरह की फ़कीरी में ही बिताते हैं. भीष्म पितामह ने, एक बार फिर दुहराना ज़रूरी है, कहा था कि राजा का धर्म है कि वह अपने राज्य में रहनेवाले बुद्धिमान व्यक्तियों का आदर करे. तुलसीदास के राम ने कहा था अयोध्यावासियों से, अगर उन्हें लगे कि वह कोई अनीति कर रहे हैं तो वे उन्हें बिना भय के टोकें. हमने टोकने का यही नागरिक धर्म निभाया जो लोकतंत्र और भारतीय परम्परा दोनों का उजला उत्तराधिकार है और उसे लांछनों द्वारा दबाया या मैला या ख़ारिज नहीं किया जा सकता.