चुनाव ख़त्म होते ही रविवार को आख़िरी चरण के मतदान के तुरंत बाद एक्ज़िट पोल के अनुमान भी आ चुके हैं. इन अनुमानों की मानें तो भारतीय जनता पार्टी मध्य प्रदेश की 29 में से 24 से 27 सीटें तक जीत सकती है. वहीं कांग्रेस को दो से पांच सीटें ही मिलने का अनुमान है. हालांकि इन अनुमानाें को उतनी ही फुर्ती से राज्य के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी कमलनाथ ने ख़ारिज़ भी कर दिया. उन्होंने ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया में लिखा, ‘2004 के लोक सभा चुनाव के बाद ज़्यादातर एक्ज़िट पोल कांग्रेस की हार का अनुमान ज़ता रहे थे. लेकिन वे सब ग़लत साबित हुए. बीते साल विधानसभा चुनाव (मध्य प्रदेश) के समय भी एक्ज़िट पोल के अनुमान ग़लत ही रहे. इस बार भी 23 मई को सच्चाई सामने आ जाएगी. मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सीटें बढ़ने वाली हैं.’

इन अनुमानों और दावों के बीच एक तथ्य ये भी है कि मध्य प्रदेश की 10 से 12 सीटों के बारे में ये माना जा रहा है कि वे नज़दीकी मुकाबले में रही हैं. यानी इन पर पलड़ा किसी भी तरफ़ झुक सकता है. जानकारों की मानें तो मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस बार कांग्रेस की सीटें बढ़ने का जो दावा किया है, उसके पीछे भी संभवत: यही तथ्य काम कर रहा है. हालांकि उनका दावा सही बैठता है या एक्ज़िट पोल के अनुमान, यह तो 23 तारीख़ को पता चल ही जाएगा लेकिन इतना तय है कि इन सीटों के नतीज़ों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों की नज़र रहने वाली है. लिहाज़ा इन सीटों के बारे में इस वक़्त कुछ जायज़ा तो लिया ही जा सकता है.

1. भोपाल : इसे मध्य प्रदेश की सबसे हॉट सीट कहें तो ग़लत नहीं होगा. प्रदेश ही नहीं पूरे देश की निग़ाह इस सीट पर है. यह शायद देश का इक़लाैता संसदीय क्षेत्र हैं जहां चुनाव के दौरान प्रतीकों की राजनीति हुई. कांग्रेस ने यहां से दस साल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह को उतारकर चुनौती पेश करने की कोशिश की. लेकिन यही दिग्विजय ‘भगवा आतंकवाद’ जैसी शब्दावली को हवा देने वाले और राज्य में ‘सड़क-बिजली-पानी के कुशासन’ के प्रतीक के तौर पर प्रचारित किए गए. दूसरी तरफ भाजपा ने उनके ख़िलाफ़ प्रज्ञा सिंह ठाकुर को उतारा तो वे भी एक प्रतीक थीं, ‘कट्‌टर राष्ट्रवाद के लिहाफ़ में ढंके हिंदुत्व’ का. वे इस बात की भी प्रतीक थीं कि उन्होंने ‘हिंदुत्व पर कथित तौर आतंकवाद का मुलम्मा चढ़ाने की कोशिश करने वालों से मुक़ाबला किया. उनके ज़ुल्म सहे.’

लिहाज़ा यहां पूरा चुनाव प्रचार बस इन्हीं प्रतीकों के इर्द-ग़िर्द घूमता रहा. हालांकि इस बीच दोनों उम्मीदवारों की तरफ़ से आए दृष्टिपत्रों के जरिए कुछ बातें विकास की भी हुईं लेकिन वे रस्मी ही ज़्यादा लगीं, मुद्दा नहीं बनीं. ऐसे में प्रचार के आख़िर तक दिग्विजय भी धर्म आधारित ध्रुवीकरण और धर्म-कांड की वैसी ही कोशिशाें का सहारा लेते देखे जैसी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रज्ञा ठाकुर के पक्ष में कर रहा था. दिग्विजय की चिंता भी ठीक ही थी क्योंकि इस सीट से जीत-हार उनका राजनीतिक भविष्य तय कर सकती है और दूसरा- यहां 1984 के बाद से कांग्रेस को कभी जीत भी नसीब नहीं हुई है. लगातार भाजपा ही जीतती आई है.

2. इंदौर : इसे राज्य की दूसरी दिलचस्प सीट कह सकते हैं. यहां से 2014 में भाजपा की सुमित्रा महाजन जीती थीं. वे इससे पहले सात चुनाव (यानी कुल आठ बार) यहां से जीतीं. लेकिन भाजपा ने 75 की उम्र का पैमाना बनाकर उनका टिकट इस बार काट दिया. इस पर उन्होंने शुरूआत में अपने क्षेत्र के मतदाताओं के नाम खुला पत्र लिखकर नाराज़गी भी जताई. लेकिन उनकी पार्टी पर इसका कोई असर नहीं हुआ. तीन दशक में पहली बार इस सीट पर भाजपा ने अपना चेहरा बदला और सिंधी समाज के शंकर लालवानी को टिकट दिया. उनके मुकाबले कांग्रेस ने पंकज संघवी को उतारा, जो 1998 में सुमित्रा महाजन से चार लाख से अधिक वोटों से हार गए थे. यानी वे दूसरी बार किस्मत आज़मा रहे हैं वहीं लालवानी पहली बार के प्रत्याशी हैं. फिर भी इंदौर में आरएसएस की मज़बूत पकड़ के बलबूते भाजपा को जीत की उम्मीद है.

3. खंडवा : कांग्रेस और भाजपा के दो पूर्व प्रदेश अध्यक्ष क्रमश: अरुण यादव और नंदकुमार सिंह चौहान यहां आमने-सामने हैं. नंदकुमार फिसलती ज़ुबान के मालिक माने जाते हैं. वहीं अरुण यादव पर बाहरी प्रत्याशी का तमगा है. अरुण मूल रूप से खरगौन जिले के हैं. इसीलिए नंदकुमार को भाजपा नेता और प्रदेश की पूर्व मंत्री अर्चना चिटनीस तथा अरुण यादव काे विधायक सुरेंद्र सिंह का सीधा विरोध झेलना पड़ा. हालांकि यहां से नंदकुमार सिंह को पांच बार जीत हासिल हुई है. वहीं 2009 में अरुण यादव ही उन्हें हरा भी चुके हैं.

4. मंदसौर : यह वही इलाका है जहां भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के कार्यकाल में पुलिस की गोली से 2017 में छह किसानों की मौत हो गई थी. दूसरा 2014 में जीते भाजपा सांसद सुधीर गुप्ता के प्रति असंतोष भी काफी बताया जाता है. गुप्ता ही इस बार फिर भाजपा प्रत्याशी हैं. शायद इसीलिए कांग्रेस यह उम्मीद कर रही होगी कि उसकी प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन के सिर पर इस बार भी 2009 की तरह जीत का सेहरा बंध जाएगा. अलबत्ता यहां ध्यान रखने लायक यह भी है कि आरएसएस की मज़बूत पकड़ वाले मालवा क्षेत्र की इस सीट पर 2009 को छाेड़कर 1991 से लगातार भाजपा ही जीतती रही है.

5. गुना : इस सीट को किसी पार्टी की कहना शायद ग़लत होगा. यह सही मायने में ग्वालियर के सिंधिया राजघराने के सदस्यों की सीट कही जा सकती है. यहां 1957 से बमुश्किल एक-दो मौके ही ऐसे आए हैं जब सिंधिया राजघराने का सदस्य चुनाव न लड़ा हो. जबकि ऐसा मौका तो एक भी नहीं आया जब वे चुनाव लड़े और हार गए हों. यानी राजघराने का कोई सदस्य अगर चुनाव मैदान में है तो यहां उसकी जीत सुनिश्चित मानी जाती है. पहले विजयाराजे सिंधिया. फिर उनके पुत्र माधवराव सिंधिया. इसके बाद अब 2002 के उपचुनाव से लगातार ज्योतिरादित्य सिंधिया. हालांकि इस बार भाजपा ने यहां से ज्योतिरादित्य के विश्वस्त और सांसद प्रतिनिधि रहे केपी सिंह को टिकट देकर मुकाबला रोचक बनाने की कोशिश की है लेकिन वे सिंधिया को हरा सकेंगे इस पर संशय की गुंज़ाइश फिर भी मौज़ूद है.

6. मुरैना : केंद्रीय मंत्री और पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर अपनी ग्वालियर सीट बदलकर यहां पहुंचे हैं. उनके सामने कांग्रेस ने पांच बार के विधायक रामनिवास रावत को उतारा है. उत्तर प्रदेश का नज़दीकी इलाका होने के कारण यहां जातिगत राजनीति का भी जोर रहता है. इसीलिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का भी अच्छा जनाधार है. दोनों पार्टियों ने मिलकर यहां से करतार सिंह भड़ाना को उतारा है. तिस पर 2014 में मुरैना सीट से जीते और इस बार टिकट से चूके भाजपा के अनूप मिश्रा की नाराज़गी भी एक मसला है. हालांकि 2009 में जब नरेंद्र सिंह तोमर और रामनिवास रावत का यहां मुकाबला हुआ तो बाजी भाजपा के हाथ लगी थी.

7. भिंड : भाजपा ने यहां से अपने सांसद भागीरथ प्रसाद का टिकट काटकर मुरैना की संध्या राय काे उम्मीदवार बनाया. वहीं कांग्रेस ने 28 साल के युवा कार्यकर्ता देवाशीष जरारिया को प्रत्याशी बनाया. लेकिन इन दाेनों ही उम्मीदवारों को अपनी ही पार्टियों में विरोध का सामना करना पड़ा. इससे यहां मुकाबला रोचक हो गया. अलबत्ता सीट 1991 से परंपरागत रूप से भाजपा जीतती रही है.

8. टीकमगढ़ : यहां से केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र कुमार खटीक भाजपा के उम्मीदवार हैं. वे नज़दीकी सागर जिले के रहने वाले हैं. और 2009 और 2014 में दो बार यह सीट जीत चुके हैं. इससे पहले सागर से सांसद रहे हैं. वे कुल छह बार लोक सभा का चुनाव जीते हैं. लेकिन इस बार उनके सामने मुसीबत उन्हीं की पार्टी के बागी पूर्व विधायक आरडी प्रजापति बने. उन्होंने विरोध में समाजवादी पार्टी से पर्चा भर दिया. वहीं कांग्रेस ने ‘स्थानीय बहू’ किरण अहिरवार को उम्मीदवार बना दिया. इसी से मुकाबला कुछ रोचक हुआ है.

9. खजुराहाे : भाजपा ने प्रदेश की जिन सीटों पर सबसे आख़िर में उम्मीदवार घोषित किए उनमें एक खजुराहो भी थी. यहां से उसे जब प्रत्याशी मिला भी तो बाहरी- विष्णुदत्त शर्मा, जो कि मूल रूप से ग्वालियर-चंबल के मुरैना जिले ताल्लुक रखते हैं. इसी से शर्मा का नाम घोषित होते ही स्थानीय स्तर पर भाजपा को ज़बर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ा. जबकि कांग्रेस ने छतरपुर राजघराने की बहू कविता सिंह को टिकट दिया. कविता के पति विक्रम सिंह कांग्रेस के विधायक भी हैं. ऐसे में कांग्रेस को इस सीट से उम्मीद हो सकती है. यहां 1991 से लगातार तीन चुनाव भाजपा जीती तो 1999 में चौथा कांग्रेस. इसके बाद 2004 से फिर अगले तीन चुनाव भाजपा ने जीते हैं.

10. सीधी : यहां भाजपा ने अपनी पिछली सांसद रीति पाठक को फिर टिकट दिया है. जबकि कांग्रेस ने विधानसभा में पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को उम्मीदवार बनाया है. हालांकि विरोध दोनों उम्मीदवारों का भरपूर है. लेकिन इस पर भी ख़ास बात ये कि पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पुत्र अजय 2018 में अपने गृहनगर चुरहट सीट से ही विधानसभा चुनाव हार गए थे. वह भी ज़िंदगी में पहली बार. चुरहट सीधी जिले में ही पड़ता है. तिस पर जात-बिरादरी की राजनीति से प्रभावित इस सीट पर भाजपा भी 1998 के बाद से सिर्फ़ एक बार ही हारी है.

11. शहडोल : यहां दो दलबदलू प्रत्याशियों में मुकाबला है. हिमाद्री सिंह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आई हैं. वहीं प्रमिला सिंह भाजपा छोड़कर कांग्रेस में गई हैं. हिमाद्री को उम्मीदवार बनाए जाने का पूर्व भाजपा सांसद ज्ञानसिंह गौतम सहित अन्य कई स्थानीय नेताओं ने विरोध किया. इस्तीफ़े दिए. हालांकि बताते हैं कि बाद में सुलह-सफाई हो गई. यहां से भाजपा 1996 के बाद से एक ही चुनाव हारी है.

12. बालाघाट : यहां भाजपा ने प्रदेश के पूर्व मंत्री ढाल सिंह बिसेन को प्रत्याशी बनाया तो पार्टी के पूर्व सांसद बोध सिंह भगत ने निर्दलीय पर्चा भर दिया. सपा-बसपा ने भी कसर नहीं छोड़ी. इन दोनों दलों ने मिलकर पूर्व सांसद कंकर मुंजारे को प्रत्याशी बना दिया. जबकि कांग्रेस ने मधु भगत को टिकट दिया है. ऊपर से यह सीट छिंदवाड़ा से भी लगती है, जो कि प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ का गढ़ है. लिहाज़ा यहां भाजपा के लिए संघर्ष कांटे का रहा है. अलबत्ता रिकॉर्ड की बात करें तो भाजपा यह सीट 1998 से लगातार जीत रही है.