अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर बढ़ गया है. बीते साल अमेरिका ने 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते से खुद को अलग कर लिया था. इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए. मकसद था उस पर दबाव बनाना. लेकिन, ईरान के न झुकने के बाद बीते अप्रैल में अमेरिका ने उसके खिलाफ एक के बाद एक कई और बड़े फैसले लिए. इनके बाद से इन दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है.

बीते महीने सबसे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ बड़ा कदम उठाते हुए ईरान की सेना - ‘रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर’ को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया. इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप ईरान ने भी अपनी संसद में अमेरिकी सेना को आतंकी संगठन बताने वाला बिल पास कर दिया. कुछ ही रोज बीते थे कि अमेरिका ने ईरान को झटका देते हुए उन आठ देशों के भी उससे तेल खरीदने पर रोक लगा दी जिन्हें बीते साल छूट दी गई थी. इस दौरान अमेरिका ने ईरान के धातु निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा दिया. इसके बाद बीते पांच मई को उसने ईरान को सीधी चेतावनी देते हुए उसके आसपास के क्षेत्रों में बमवर्षक विमानों की तैनाती कर दी.

जंगी विमानों की तैनाती की घोषणा करते हुए अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन का कहना था, ‘मध्य पूर्व से लगातार चेतावनी भरे संकेत मिल रहे हैं जिनसे युद्ध छिड़ने का अनुमान लगाया जा सकता है. ख़ास तौर पर ईरान के साथ. इसीलिए यह तैनाती की जा रही है ताकि ईरान को स्पष्ट संकेत दिया जा सके कि वह अमेरिका या उसके सहयोगी देशों के प्रतिष्ठानों पर हमले की ग़लती न करे. हम ईरान के साथ हर तरह की लड़ाई को तैयार हैं.’

अमेरिका के इस रुख के बाद ईरान ने भी एक बड़ा फैसला ले लिया. उसने घोषणा की कि वह अमेरिका की इन हरकतों के बाद अब 2015 के परमाणु समझौते की शर्तों का पालन नहीं करेगा. ईरान ने कहा कि उसने यूरेनियम और भारी जल के उत्पादन को बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है. इस सबसे ऐसा माहौल बन गया है कि अमेरिका ने इराक के बग़दाद में स्थित अपने वाणिज्यिक दूतावास के कर्मचारियों को अमेरिका वापस लौटने का आदेश दे दिया है. अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक ईरान के साथ बढ़ते तनाव के मद्देनज़र यह कदम उठाया गया है.

अमेरिका और ईरान के बीच बीते एक महीने में जो कुछ भी हुआ है उसके बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका और ईरान युद्ध की देहरी पर आ पहुंचे हैं और क्या इनके बीच जल्द ही जंग छिड़ने वाली है?

अमेरिकियों का रुख सबसे अहम

इस सवाल का जवाब जानने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि कि डोनाल्ड ट्रंप ईरान के पीछे क्यों पड़े हुए हैं. पिछले राष्ट्रपति चुनाव में ईरान और उसके साथ हुआ छह विश्व शक्तियों का परमाणु समझौता एक बड़ा मुद्दा था. डोनाल्ड ट्रंप ने जनता से वादा किया था कि वे ओबामा प्रशासन में हुए इस समझौते को तोड़कर ईरान को नए समझौते के लिए मजबूर कर देंगे. उनका कहना था कि वर्तमान समझौते में ईरान को बहुत ज्यादा सहूलियत दी गयी है जो सही नहीं है.

जानकारों के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप अपने कार्यकाल के पहले दिन से ही अपने वादे पूरे करने पर लगे हैं. यह भी देखा गया है कि वे किसी भी कीमत पर अपने चुनावी वादे पूरा करना चाहते हैं. ईरान के मामले में भी वे हर तरह से दबाव बनाकर उसे नए समझौते के लिए मजबूर करना चाहते हैं. हालांकि, कई यह भी कहते हैं कि भले ही लोगों ने ईरान को लेकर किये गए उनके वादे पर उन्हें वोट दे दिया हो और वे चाहते हों कि ईरान दोबारा नई शर्तों पर अमेरिका से समझौता करे, लेकिन अमेरिकी यह बिलकुल भी नहीं चाहते कि डोनाल्ड ट्रंप ईरान को झुकाने के लिए उस पर हमला कर दें.

बीते कुछ समय से अमेरिका में जो भी सर्वेक्षण हुए हैं उनमें अधिकांश लोगों ने यही कहा है कि अब अमेरिका को खुद को किसी युद्ध में नहीं फंसाना चाहिए. लोगों का कहना है कि अगर ईराक युद्ध में खर्च किया गया छह खरब डॉलर अमेरिका में लगाया जाता तो देश की तस्वीर ही बदल जाती. अमेरिका का कुल वार्षिक बजट करीब एक खरब रुपए के करीब ही रहता है.

जानकार कहते हैं कि अमेरिकियों के ऐसे रुख के बाद इस बात की संभावना काफी कम है कि डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर हमला करेंगे. इस समय वे अमेरिकियों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेंगे क्योंकि अगले साल ही उन्हें चुनावी मैदान में उतरना है.

अमेरिका के अकेले पड़ने का डर

अमेरिका के ईरान पर हमला न करने की एक वजह उसके ऐसा करने के बाद अकेले पड़ जाने का डर भी है. विदेश मामलों के विशेषज्ञों की मानें तो ईराक और अफगानिस्तान में जब अमेरिका ने हमला किया था तो उसके पास एक बड़ी वजह थी. लेकिन ईरान के मामले में ऐसा नहीं है. जानकारों के मुताबिक ईरान के खिलाफ जो कुछ हो रहा है वह साफ़ तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की जिद का नतीजा है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और 2015 में हुए परमाणु समझौते का हिस्सा रहे सभी देशों का कहना था कि यह परमाणु समझौता सही था और ईरान पूरी तरह से उसका पालन कर रहा है. लेकिन, डोनाल्ड ट्रंप ने इसके बावजूद अमेरिका को इससे अलग कर दिया और ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए.

इसके अलावा अमेरिका के समझौते से बाहर होने के बाद भी ईरान 2015 के परमाणु समझौते का पालन अभी तक करता रहा. ईरान ने मजबूर होकर समझौते का पालन करना तब बंद किया, जब अमेरिका ने बीते छह मई को उसके आसपास के क्षेत्रों में बमवर्षक विमान भेजने की घोषणा कर दी.

जानकारों की मानें तो इन सब तथ्यों पर नजर डालने के बाद ईरान का पक्ष नैतिक रूप से सही नजर आता है. इनके मुताबिक अगर ऐसे में अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो तबाही के लिए उसे ही कोसा जाएगा और इस लड़ाई में वह अकेला पड़ सकता है. गौर करने वाली बात यह भी है कि यूरोप पहले से ही इस मामले में उसके साथ नहीं है.

कौन सी वजहें युद्ध छिड़वा सकती हैं?

बर्मिंघम विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रोफेसर स्कॉट लुकास अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं कि ईरान अमेरिका के साथ कोई टकराव नहीं चाहता. उनके मुताबिक वह अच्छे से जानता है कि यह उसके लिए आत्महत्या करने जैसा होगा क्योंकि युद्ध में वह अमेरिका का सामना नहीं कर पाएगा. बीते रविवार को डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा, ‘अगर ये युद्ध शुरू होता है, तो फिर ईरान का अंत निश्चित है.’

अमेरिकी पत्रिका न्यूयॉर्क मैगजीन के पत्रकार हीदर हर्लबर्ट एक साक्षात्कार में एक और बात भी बताते हैं. वे कहते हैं, ‘अमेरिका और ईरान इस समय युद्ध से बचना चाहेंगे. लेकिन दोनों ही युद्ध की देहरी तक आ गए हैं, ऐसे में इनकी छोटी सी गलती युद्ध शुरू करवा सकती है.’ हीदर हर्लबर्ट के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप अगर ईरान के प्रबल विरोधी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन की बातों में आ गए तो युद्ध हो सकता है.

दूसरा ईरान की तरफ से भी ऐसी गलती होनी की संभावना है. जब से अमेरिका ने ईरान की सेना को आतंकी संगठन घोषित किया है तब से इराक में अमेरिकी और ईरानी सैनिकों के बीच टकराव होने की संभावना बढ़ गई है. हीदर हर्लबर्ट कहते हैं कि अगर ऐसा कुछ हुआ तो फिर अमेरिका ईरान पर हमला जरूर करेगा. अमेरिका ने पिछले दिनों ईरानी सेना से जुड़े इसी खतरे की वजह से बग़दाद में स्थित अपने वाणिज्यिक दूतावास के कर्मचारियों को अमेरिका वापस लौटने का आदेश दिया था.