2013 की बात है. अब्दुल मजीद लोन करीब 20 साल पाकिस्तान में गुजारने के बाद अपने बीवी-बच्चों समेत उत्तर कश्मीर के बांदीपुरा में स्थित अपने घर लौटे थे. उनके स्वागत में गांव में कई दिन तक जश्न रहा था. लोग दूर-दूर से मुबारकबाद देने आ रहे थे. घर आने की खुशी में लोन फूले नहीं समा रहे थे. उस समय शायद ही उन्होंने सोचा होगा कि कुछ महीनों बाद ही वे अपनी बीवी को अपने घर के सामने ही जलता हुआ देखेंगे.

‘मैं घर की तरफ जा रहा था कि कोई चीज़ जलती हुई दिखी. पास जाके देखा तो सायरा जलके राख़ हो रही थी. जब तक मैं कुछ कर पाता वो दम तोड़ चुकी थी,’ हाजिन इलाके में रहने वाले लोन ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा. सायरा बानो ने कुछ ही महीनों में अपनी ज़िंदगी ऐशो आराम से गरीबी की तरफ बिखरती देखते हुए आत्म दाह कर लिया था. वे पीछे छोड़ गईं अपने तीन नाबालिग़ बच्चे.

सायरा उन लगभग 350 पाकिस्तानी लड़कियों में शामिल थीं जिन्होंने पाकिस्तान में उन युवाओं से शादी की थी जो वहां कश्मीर से मिलिटेंट बनने गए थे. 2010 में इनमें से कई जम्मू-कश्मीर सरकार की एक ‘पुनर्वास योजना’ के तहत अपने परिवारों के साथ कश्मीर आ गए थे. ये महिलाएं यहां आ तो गईं लेकिन यहां ज़िंदगी इनके लिए बहुत मुश्किल हो गई है. कठिनाइयों के चलते अभी तक सायरा की तरह दो और पाकिस्तानी महिलाओं ने आत्महत्या कर ली है. कम से कम तीन डिप्रेशन जैसे मानसिक रोगों से चल बसी हैं.

‘हममें से आधी से ज़्यादा औरतें मानसिक रोगों के लिए दवाइयां खा रही हैं. एक तरफ गरीबी और एक तरफ अपने अपनों से न मिल पाने का गम. हमारी ज़िंदगी अज़ाब (यातना) बन गयी है यहां,’ सायरा की ही तरह कश्मीर आई एक और सायरा ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा. ये दूसरी सायरा अपने पति जावेद अहमद डार और चार बच्चों समेत उत्तर कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में रह रही हैं.

इन परिवारों की मुश्किलें कई हैं. सबसे बड़ी तो यही कि इनके पास भारतीय नागरिकता नहीं है. पाकिस्तान ये लौट नहीं सकतीं क्योंकि ज़्यादातर के पास अब पाकिस्तानी पासपोर्ट भी नहीं है. ये परिवार यहां गरीबी में रह रहे हैं, इनके बच्चे ठीक से पढ़ाई नहीं हासिल कर पा रहे और यहां इनके परिजनों का रूखापन अलग से इनकी मुश्किलें बढ़ा रहा है.

लेकिन इन सब चीजों में विस्तार में जाने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि ये लड़कियां यहां आईं कैसे.

पाकिस्तान से कश्मीर का सफर

1990 के दशक में कश्मीर से हजारों की संख्या में कश्मीर के युवा नियंत्रण रेखा पार करके पाकिस्तान के कश्मीर में स्थित मिलिटेंट कैंपों में हथियारों की ट्रेनिंग के लिए गए थे. इनमें से जहां बहुत से वापस आकर मिलिटेंट बने वहीं काफी लोग किन्हीं वजहों से वहीं रह गए. ज़्यादातर ने पाकिस्तानी लड़कियों के साथ शादियां कर लीं और जैसे-तैसे वहां अपनी ज़िंदगी बसर करने लगे.

फिर 2010 में तब की उमर अब्दुल्ला सरकार ने इन कश्मीरी लोगों के लिए वापस भारत में बसने का एक रास्ता खोला. एक ‘पुनर्वास योजना’ के तहत. इस योजना में इन पूर्व मिलिटेंट्स को रोजगार देने का वादा किया गया. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि अगले कुछ सालों में करीब 377 पूर्व मिलिटेंट अपने 864 परिवारजनों सहित कश्मीर लौट आए.

‘इनके आने के लिए सिर्फ चार रास्ते निर्धारित किए गए थे, जिनमें उरी-मुजफ्फराबाद, पुंछ-रावलकोट रास्ता, पंजाब में अटारी बार्डर और दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा शामिल थे,’ कश्मीर में स्थित एक आला पुलिस अधिकारी ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा. उनका आगे कहना था कि ‘पुनर्वास योजना’ इन्हीं रास्तों से आने वाले लोगों के लिए थी. लेकिन मसला यह हो गया कि वापस आने वालों में से अधिकतर लोग नेपाल बार्डर से भारत में दाखिल हुए और घुसपैठिए माने जाने लगे. इस पुलिस अधिकारी ने बताया, ‘इसकी वजह से अभी तक इनको न कोई राहत मिली है और न नागरिकता.’

लेकिन इन लोगों से बात की जाए तो इनमें से सब यही कहते हैं कि नेपाल में इनके गाइड सब कश्मीरी थे और वे यहां की सरकार के इशारे पर काम कर रहे थे. सत्याग्रह से बातचीत में ऐसे ही एक परिवार की महिला का कहना था, ‘उन्होंने हमसे पाकिस्तानी पासपोर्ट ले लिए और यहां धकेल दिया. कश्मीर जिसको जन्नत कहा जाता है, हमारे लिए जहन्नुम बन गया है.’ सत्याग्रह ने पिछले कुछ दिनों के दौरान जिन 20 परिवारों से बात की उन्होंने भी कमोबेश यही कहा.

अब जो तब हो गया था वह हो गया. मसला अब इनकी ज़िंदगियों का है. और फिलहाल नज़र दौड़ाई जाए तो न इनकी ज़िंदगियां सही ढंग से गुज़र रही हैं और न हालात सुधरने की कोई संभावना नज़र आ रही है.

अभी के हालात

अपने पति और तीन बच्चों के साथ 2012 में उत्तर कश्मीर के हंदवाड़ा जिले में रहने आई ज़ेबा परवेज़ ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा कि उन जैसी सारी औरतों का सबसे बड़ा मसला अभी नागरिकता का है. उनका कहना था, ‘हम हवा में लटके हुए हैं. यहां रह तो रहे हैं लेकिन यहां के नहीं हैं.’ कश्मीर आने के एक साल के बाद ही ज़ेबा को उनके पति ने तलाक दे दिया. तब से वे एक प्राइवेट स्कूल में काम करके अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा रही हैं.

पाकिस्तान के इस्लामाबाद की रहने वाली ज़ेबा के मुताबिक वहां उनके परिजन खासे पैसे वाले हैं और अगर उनको अपने परिवार के पास वापस जाने का मौका दिया जाता तो उनकी सारी मुश्किलें खत्म हो जातीं. उनका कहना था, ‘यहां मुश्किलें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं. आम लोग यहां अपने बच्चों को पढ़ाकर गरीबी में से बाहर निकल आते हैं, हम अपने बच्चों को पढ़ा तो रहे हैं लेकिन उनका कोई भविष्य नहीं नज़र आ रहा क्यूंकि उनके पास नागरिकता नहीं है.’

और ज़ेबा की बात सही भी लगती है. कुपवाड़ा के फयाज अहमद और उनकी पाकिस्तानी बीवी मेहताब अपनी बेटी को एमबीबीएस कराना चाह रहे हैं, लेकिन नागरिकता न होने के चलते उनका यह सपना पूरा होता दिखाई नहीं दे रहा है. सत्याग्रह से बातचीत में फयाज ने बताया, ‘यहां उसको पेमेंट सीट मिल रही है जो कि करीब 60 लाख देने पे पक्की होती है. बाहर के कुछ देशों में ये डिग्री यहां से सस्ती है, जैसे कि बांग्लादेश. हम अपनी ज़मीन बेच के उसको वहां भेज देते क्योंकि उसकी बाकी सारी कजिंस भी वहीं हैं. लेकिन उसके पास वहां जाने के लिए पासपोर्ट नहीं है.’ फयाज की चिंता है कि इस बात के चलते उनकी बेटी की मानसिक हालत बिगड़ती दिखाई दे रही है और वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे.

नागरिकता न होने के चलते न इन लोगों को यहां न कोई सुविधा मिल पा रही है और न ये लोग किसी सरकारी नौकरी के लिए योग्य हैं. एक गैरसरकारी संगठन ने इन लोगों की तरफ से कोर्ट में अपील ज़रूर की है, लेकिन जानकारों की मानें तो कुछ होता दिखाई दे नहीं रहा. एक आला सरकारी अधिकारी ने सत्याग्रह को बताया कि इन लोगों को नागरिकता बिलकुल नहीं मिल पाएगी. उनका कहना था, ‘यह योजना जम्मू-कश्मीर सरकार ने बनाई थी. हां, केंद्र सरकार की हामी ज़रूर थी लेकिन वह दबी-ढकी थी. खुले तौर पे केंद्र सरकार का कोई रोल नहीं था इस सब में.’

इस अधिकारी की मानें तो सरकार चाहती थी कि हज़ार से ऊपर परिवार आ जाएं तो इस बात को थोड़ा प्रचारित करके इन लोगों के लिए कुछ किया जाए. वे कहते हैं, ‘लेकिन बहुत कम लोग आए और अब मेरी नज़र में यहां की और केंद्र सरकार, दोनों इन लोगों को अपनाने में हिचकिचा रही हैं.’ हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने नेपाल सीमा वाले रास्ते को निर्धारित रास्तों की सूची में डालने के लिए केंद्र पर जोर डाला था. लेकिन उनके इस प्रस्ताव को कोई मंजूरी नहीं मिली.

अपने घर वापस न जाने का दुख भी अब इन लोगों को खाये जा रहा है. कुपवाड़ा में रह रहीं सायरा जावेद का कहना था, ‘मैं 2010 में आई थी और तबसे लेकर अभी तक मेरे कई परिजन दुनिया छोड़कर चले गए हैं. मैं उनका मुंह भी नहीं देख पायी. मैं बाक़ी लोगों का भी कभी मुंह नहीं देख पाऊंगी, ये अंदेशा मुझे पागल कर देता है.’

अपनों से बिछड़ने का दुख, यहां के रिश्तेदारों की बेरुखी.

पाकिस्तानी कश्मीर के मुजफ्फराबाद की रहने वाली कुबरा गिलानी सिर्फ 17 साल की थीं जब दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के रहने वाले मुहम्मद अल्ताफ़ राथर के साथ उनकी शादी हो गयी. शादी मुजफ्फरबाद में हुई थी. वहां हथियारों की ट्रेनिंग लेने गए अलताफ़ ने फिर वहीं बसेरा कर लिया था.

2014 में जब अल्ताफ़ ने वापिस कश्मीर आने की बात की थी तो कुबरा बड़ी खुश थीं. सत्याग्रह से बातचीत में उन्होंने बताया, ‘मैंने सोचा था यहां उनके अपने लोग हैं और हम हंसी-खुशी रहेंगे.’ लेकिन उनको बिलकुल अंदाज़ा नहीं था कि उनकी ज़िंदगी क्या मोड़ लेने वाली है.

कुबरा के लिए पहला झटका था उनके पति का गांव जो अनंतनाग शहर से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर है. गांव में गरीबी देखकर उन्हें चिंता हुई थी. कुबरा ने बताया, ‘लेकिन मैं खुश थी अपने पति के साथ और मैंने वहां रहने का फैसला ले लिया था.’

लेकिन अगले कुछ साल गरीबी की मार से कुबरा के हौसले डगमगा गए. पैसे की किल्लत के चलते वे लोगों के घरों में जाकर काम करने लगी थीं. अपने आंसू छिपाते हुए कुबरा ने बताया, ‘मैं गरीबी भी बर्दाश्त कर लेती और कर रही थी. लेकिन फिर 2018 में अल्ताफ़ ने मुझे तलाक देने का फैसला कर लिया और मुझे छोड़ दिया.’

तलाक की वजह थी कुबरा का बच्चा न पैदा कर पाना. यह खबर सुनकर मुजफ्फराबाद में उनके पिता चल बसे. तब से लेकर अब तक कुबरा एक के बाद एक दरवाजा खटखटा रही हैं- उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती, अलगाववादी नेता. सब वादे तो करते हैं लेकिन कोई मदद नहीं करता.

हालांकि कुबरा के पास पाकिस्तानी पासपोर्ट है. वे उसको दिल्ली में स्थित पाकिस्तानी दूतावास से ‘रीन्यू’ भी करा चुकी हैं, लेकिन उनको पाकिस्तान वापस नहीं जाने दिया जा रहा है. उन्होंने बताया, ‘मैं वाघा बार्डर पर से वापस लौटा दी गई, ये कहकर कि मुझे पाकिस्तान जाने की इजाज़त नहीं है.’

अब फिलहाल कुबरा एक दोस्त के घर रह रही हैं. न सर पर छत है और न ही जेब में पैसे. दूसरी ओर उनके ससुराल वालों का ज़ुल्म है जिन्होंने उन्हें न मेहर के पैसे दिये और न गुजर-बसर के लिए कोई और मदद. ‘कश्मीर आने का शौक महंगा पड़ गया मुझे,’ कुबरा अपने आंसू छुपाते हुए मुस्कुरा पड़ीं.

कुबरा ही तरह ज़ेबा को भी उनके ससुराल वालों ने अब घर से निकाल दिया है. वे अपने बच्चों के साथ दर-दर की ठोकरें खा रही हैं. जेबा ने सत्याग्रह को बताया, ‘मैं पिछले एक हफ्ते से श्रीनगर में अलग-अलग जगहों पर भटक रही हूं. आगे सिर्फ अंधेरा नज़र आ रहा है मुझे.’ ज़ेबा को कश्मीरी समाज से भी शिकायत है. वे कहती हैं, ‘कश्मीरी पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे तो लगाते हैं, लेकिन पाकिस्तानी बेटियों को उनका हक़ नहीं दिला पा रहे.’

कुबरा और ज़ेबा के उलट बाकी महिलाएं भले ही अपने पतियों के साथ ही रह रही हैं लेकिन, उनके रिश्तेदारों की बेरुखी और गरीबी ने उनकी भी ज़िंदगियां जहन्नुम बना रखी हैं. सायरा जावेद जब अपने पति के साथ यहां आई थीं तो उनको लगा था कि उनका खुले दिल से स्वागत होगा, लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा. उन्होंने बताया, ‘हमें तो जावेद के भाइयों ने रहने के लिए भी जगह नहीं दी. हम इतने सालों से किराए के मकान में रह रहे हैं.’ अब जावेद बस चलाकर और सायरा बुटीक चला कर अपने बच्चों को पाल-पोस रहे हैं. सायरा का कहना था, ‘वरना इनके परिवार ने तो ऐसे ही छोड़ दिया था हमें.’

आगे क्या?

जानकार मानते हैं कि जब तक पाकिस्तान और भारत की सरकारें बैठकर कोई फैसला नहीं लेतीं तब तक ये लोग ऐसे ही ठोकरें खाते रहेंगे. कश्मीर के केंद्रीय यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर राशिद मक़बूल का कहना है, ‘उस समय न भारत की सरकार को विश्वास में लिया गया था न पाकिस्तान की सरकार को, भले ही दोनों सरकारों की सहमति रही हो. अब जब तक दोनों सरकारें कोई फैसला न लें तब तक इनके लिए हालात ऐसे ही रहेंगे.’

इन लोगों ने अब अपने संगठन बना लिए हैं. समय-समय पर ये सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करते हैं. हाल में ऐसे ही एक प्रदर्शन में एक बैनर पर लिखा हुआ था कि ‘हम पाकिस्तानी हैं, हमें वापस भेज दिया जाये.’ यह संदेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, के लिए लिखा गया था.

अब इनके इन प्रदर्शनों से कोई फर्क पड़ता है या नहीं, इनको नागरिकता या वापस जाने का रास्ता मिलता है या नहीं वह तो वक़्त ही बताएगा. फिलहाल यह उम्मीद की जा सकती है कि इनमें से कोई और सायरा की तरह हालात से तंग आकर अपनी जान न ले ले.