प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को आचार संहिता के मामले में क्लीन चिट दिए जाने पर असहमति जताने वाले चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने अपनी चुप्पी तोड़ी है. इस मामले में चुनाव आयोग को लेकर हो रही चर्चा के बीच उन्होंने कहा है कि आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़े मामलों में बिना भेदभाव के फैसले दिए जाने चाहिए. हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में अशोक लवासा ने कहा, ‘मेरा मु्द्दा यह है कि आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों को समयबद्ध, पारदर्शी और बिना भेदभाव वाली व्यवस्था के तहत निपटाया जाना चाहिए.’

अशोक लवासा ने यह बात उस रिपोर्ट के सामने आने के बाद कही है, जिसमें बताया गया था कि आचार संहिता से जुड़े चुनाव आयोग के फैसलों में लवासा की असहमति को शामिल नहीं किया जा रहा है. चुनाव आयुक्त ने ऐसा होते देख आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़ी बैठकों में जाना छोड़ दिया था. इस बारे में अब उनका कहना है, ‘मेरे द्वारा रिकॉर्ड किए गए कई अल्पमत वाले फैसले लगातार दबाए जाते रहे जो एक प्रतिष्ठित परंपरा के विरुद्ध है.’

लवासा के मुताबिक इस मुद्दे पर उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को पत्र भी लिखा था. इस पर अरोड़ा ने 18 मई को बयान जारी कर कहा था, ‘चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों (आयुक्त) से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे एक-दूसरे की नकल करें. पहले भी कई बार (मामलों में) अलग-अलग राय देखने को मिली है. ऐसा हो सकता है और होना भी चाहिए.’ वहीं, आयोग के कुछ अधिकारियों ने उसके कानूनी विभाग के हवाले कहा था कि आचार संहिता के मामलों से जुड़े फैसलों के आदेशों में असहमति को रिकॉर्ड में नहीं रखा जाता. उनके मुताबिक ऐसा इसलिए जरूरी नहीं है क्योंकि आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत की सुनवाई अदालती कार्रवाई जैसी नहीं होती.

लेकिन अशोक लवासा इससे अलग बात कहते हैं. उनका कहना है, ‘सभी बहु-सदस्य वाली संस्थाओं में, चाहे वह कोर्ट हो या ट्राइब्यूनल, असहमति आदेश में शामिल की जाती है... मैंने आचार संहिता के प्रावधानों और चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए नियमों के तहत असहमति जताई थी. इससे चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था में लोगों का विश्वास बढ़ेगा.’ वहीं, इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में लवासा ने कहा, ‘अगर चुनाव आयोग के फैसले बहुमत से होते हैं और आप (आदेश में) अल्‍पमत की राय शामिल नहीं करते तो अल्‍पमत की राय का मतलब क्‍या है?’