कान फिल्म समारोह में इस बार एक भी भारतीय फीचर फिल्म शामिल नहीं है. न मुख्य कॉम्पिटिशन सेक्शन में और न ही अन सर्टेन रिगार्ड, डायरेक्टर्स फोर्टनाइट और क्रिटिक्स वीक जैसे महत्वपूर्ण सेग्मेंट्स में.

सिनेमा के इस महाआयोजन में इस बार दुनियाभर से 1,845 फिल्में आधिकारिक चयन के लिए दौड़ में शामिल थीं. इनमें से चार भारतीय फिल्मों पर भी खासा गौर किया गया था जिसमें से एक ‘चौथी कूट’ के प्रतिष्ठित निर्देशक गुरविंदर सिंह की नयी फिल्म थी. लेकिन आखिरकार एक भी भारतीय फिल्म इस फेस्टिवल में भागीदारी का सम्मान हासिल नहीं कर सकी.

पिछले एक दशक से हमारी कई फिल्मों ने कान महोत्सव के जरिए भारतीय फिल्मों और खासतौर पर हिंदी फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय ख्याति देने में सफलता हासिल की है. अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ (2012) और ‘अग्ली’ (2013) विलक्षण फिल्मकारों के लिए समर्पित डायरेक्टर्स फोर्टनाइट में प्रदर्शित हो चुकी हैं. अशीम अहलूवालिया की ‘मिस लवली’ (2012), कनु बहल की ‘तितली’ (2014), गुरविंदर सिंह की ‘चौथी कूट’ (2015) और नीरज घेवान की ‘मसान’ (2015) नयी सिनेमाई आवाजों को बढ़ावा देने वाली अन सर्टेन रिगार्ड नाम की प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में प्रदर्शित होकर भूरि-भूरि प्रशंसा हासिल कर चुकी हैं. विक्रमादित्य मोटवानी की ‘उड़ान’ (2010) को क्रिटिक्स वीक में सराहा जा चुका है और ‘द लंच बॉक्स’ (2013) को व्यूअर च्वॉइस अवॉर्ड मिल चुका है. इन सेगमेंट्स में फिल्मों का प्रदर्शित होना ही अपने आप में पुरस्कार मिलने के बराबर होता है. फिर, पिछले साल नंदिता दास निर्देशित ‘मंटो’ (2018) भी अन सर्टेन रिगार्ड में प्रदर्शित होकर वाहवाही लूट चुकी है.

लेकिन, बदकिस्मती से इस बार के 72वें कान फिल्म फेस्टिवल में हिंदुस्तान की बात वापस से सिर्फ इसलिए हो रही है कि हमारी अभिनेत्रियों ने वहां क्या पहना, और पहनकर वे कैसी लगीं. 14 मई से लेकर 25 मई तक चलने वाले कान महोत्सव में दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा, सोनम कपूर, ऐश्वर्या राय और कंगना रनोट जैसी जगप्रसिद्ध अभिनेत्रियों के कपड़े-लत्तों पर ज्यादा चर्चा होना बताता है कि कुछ गंभीर फिल्मकारों को छोड़कर ज्यादातर बॉलीवुड हस्तियां आज भी कान को फैशन और हाई ग्लैमर से जुड़ा एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मंच भर मानती हैं. सिनेमा का कोई पावन तीर्थ नहीं.

ऐसे में एक तीन मिनट की देसी शॉर्ट फिल्म का कान में पुरस्कार जीतना बहुत मायने रखता है. अच्युतानंद द्विवेदी की डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट फिल्म ‘सीड मदर’ ने प्रतिष्ठित कान क्रिटिक्स वीक द्वारा समर्थित नेस्प्रेसो टेलेंट्स (Nespresso) नामक प्रतियोगिता में इस साल तीसरा स्थान हासिल किया है. कान में पिछले चार सालों से लगातार हो रही इस प्रतियोगिता की खासियत है कि इसमें शामिल शॉर्ट फिल्मों को केवल आईफोन पर शूट करना होता है और वह भी – और ये सबसे बड़ी खास बात है! – केवल वर्टिकल फॉर्मेट में!

वर्टिकल (क्षैतिज) फॉर्मेट का मतलब है कि जिस तरह हम मोबाइल हाथ में सीधा पकड़कर वीडियो बनाते हैं वैसे ही आपको फिल्म बनानी है. सुनने में भले ही ये आसान लगे लेकिन होता थोड़ा मुश्किल काम है! सिनेमा मुख्यत: हॉरिजॉन्टल (लम्बवत) फॉर्मेट में बनता है – यानी कि मोबाइल के लैंडस्केप मोड में – और हमारी आंखें भी उसी तरह स्क्रीन को देखने की अभ्यस्त होती हैं. थियेटर के बड़े परदे पर और टेलीविजन के तुलनात्मक रूप से छोटे परदे पर भी हम हॉरिजॉन्टल फॉर्मेट में शूट हुए विजुअल्स ही हमेशा देखते हैं और इन्हें देखते वक्त हमारी आंखें अपने आप ही दाएं से बाएं और बाएं से दाएं का मूवमेंट करती हैं.

दुर्लभ वर्टिकल फॉर्मेट में होता ये है कि इसके विजुअल्स देखते वक्त अक्सर आंखों को ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर का मूवमेंट करना होता है. चूंकि ऐसा करने के लिए हमारी आंखें अभ्यस्त नहीं होतीं तो फिल्मकारों के सामने चुनौती होती है कि वे ऐसे विजुअल्स अपनी फिल्म में शामिल करें जिससे कि इंसानी आंखें चकरा न जाएं! साथ ही इस तरह के दृश्यों को शूट करने के अलावा उनका आपस में संयोजन करना भी बड़ा मायने रखता है ताकि हॉरिजॉन्टल फॉर्मेट की तरह ही छवियां निर्विघ्न आगे बढ़ती रहें.

वैसे तो वर्टिकल फॉर्मेट की फिल्में मोबाइल पर देखना ज्यादा उपयुक्त होता है, लेकिन बड़े परदे या टीवी-लैपटॉप पर इन्हें देखना भी एक अलग अनुभव देता है क्योंकि ‘फुल स्क्रीन’ की जगह केवल एक छोटा-सा वर्टिकल हिस्सा ही छवियों के लिए उपयोग किया जाता है. कान में पुरस्कृत ‘सीड मदर’ देखने के बाद आपको इस फॉर्मेट की चुनौतियों का बेहतर अंदाजा लगेगा.

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अच्युतानंद द्विवेदी ने ‘सीड मदर’ को आईफोन के आगे मिरर लैंस लगाकर शूट किया था और नेस्प्रेसो टेलेंट्स की पात्रता अनुसार वर्टिकल 9/16 वीडियो फॉर्मेट का उपयोग किया था. इस साल प्रतियोगिता की थीम ‘वी आर वॉट वी ईट’ थी और इसके अंतर्गत 40 से ज्यादा देशों से 380 शॉर्ट फिल्में प्रतियोगिता में शामिल हुई थीं.

प्रतियोगिता में तीसरा पुरस्कार जीतने वाले अच्युतानंद द्विवेदी ने जिन अनपढ़ राहीबाई सोमा पोपेरे और उनके बीजों की कथा कही है, वे महाराष्ट्र में सीड मदर के नाम से चर्चित हैं और भिन्न-विभिन्न प्रकार के देसी बीजों को संरक्षित करने और खेती के पारंपरिक तरीकों पर जोर देने के लिए जानी जाती हैं. राहीबाई को 2018 के प्रतिष्ठित नारी शक्ति पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है और शुद्ध सब्जियों की चाह में भटकने वाले कई शहरी युवा उनसे उनके बीज ले जाकर अपनी लाइफस्टाइल को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं.

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कान में इस साल हासिल हुई इस एकमात्र भारतीय उपलब्धि के अलावा नेस्प्रेसो टेलेंट्स प्रतियोगिता में पहला और द्वितीय स्थान जीतने वाली डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट फिल्में भी देखी जानी चाहिए. इनसे वर्टिकल फॉर्मेट वाली फिल्म मेकिंग का भी बेहतर अंदाजा लगेगा और दुनिया की कुछ अनदेखी संस्कृतियों से भी रूबरू होने का मौका मिलेगा.

दूसरा स्थान जीतने वाली शॉर्ट फिल्म ‘रूफो’ मैक्सिको से है और वहां के एक व्यंजन में प्यार को शामिल करने की बात कहती है. पहला स्थान जीतने वाली ‘सुबक’ को न्यूजीलैंड के निर्देशक ने बनाया है और विषय के तौर पर बाली में होने वाली चावल की खेती को चुना है. बड़े ही खूबसूरत विजुअल्स हैं इसके!

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