मध्य प्रदेश की भोपाल संसदीय सीट से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीदवार प्रज्ञा सिंह ठाकुर राजनीति में अभी ठीक चुनाव से पहले ही आई हैं. वे साधुओं की तरह भगवा बाना पहनती हैं. दावा करती हैं कि काफ़ी समय पहले ही दीन-दुनिया से संन्यास ले चुकी हैं. साथ में यह भी कि राजनीति में वे सिर्फ़ देश सेवा के लिए, धर्म की प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए आई हैं. हालांकि अब तक उन्होंने सुर्ख़ियां न तो ‘साधु-संन्यासोचित आचरण’ की वज़ह से बटोरी हैं और न ही देश या धर्म की सेवा के कारण.

प्रज्ञा सिंह का नाम पहली बार उस वक़्त देशभर में सुर्ख़िर्याें में आया जब उन्हें मालेगांव (महाराष्ट्र) बम धमाके के आरोपित के तौर पर सितंबर 2008 में ग़िरफ़्तार किया गया. और यह ग़िरफ़्तारी भी उस वक़्त हुई जब प्रदेश में भाजपा की सरकार थी. यानी उसी पार्टी की जिसकी वे आज सदस्य हैं. बहरहाल, इसके बाद वे जेल में रहीं और पुलिस के कथित उत्पीड़न की वज़ह से भी ख़बरों में बनी रहीं. फिर जब वे भाेपाल से भाजपा प्रत्याशी बनाई गईं तो पूरे देश की नजर में आ गईं.

हालांकि उम्मीदवारी की घोषणा होते ही प्रज्ञा सिंह ठाकुर अपनी नई-नवेली पार्टी के लिए भी परेशानी खड़ी करती दिखीं. भोपाल आते ही उन्होंने ‘ख़ुलासा’ किया, ‘जेल में मुझ पर अत्याचार करने वाले हेमंत करकरे (महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक इकाई के तत्कालीन प्रमुख) को मैंने श्राप दिया था कि तेरा अंत होगा. और मेरे श्राप देने के सवा महीने के भीतर उसका अंत हो गया.’ हेमंत करकरे 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले के दौरान आतंकियों से मुकाबला करते हुए शहीद हुए थे.

अपने चुनाव प्रचार में बार-बार सेना और उसके शहीदों का हवाला देने वाली भाजपा को ऐसे बयान की उम्मीद नहीं थी. लिहाज़ा तुरंत साफ-सफाई दी गई. प्रज्ञा ठाकुर से माफ़ी मंगवा ली गई. लेकिन कुछ दिनों में ही उन्होंने नया ‘ख़ुलासा’ किया, ‘मैं उन चंद लोगों में शामिल थी जिन्होंने छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी ढांचा गिराया. मुझे इस पर फ़ख़्र है. हमने देश के दामन पर लगा धब्बा हटा दिया.’ इस पर भाजपा से कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं आई. लेकिन चुनाव आयोग ने ज़रूर प्रज्ञा पर 72 घंटे का प्रचार-प्रतिबंध लगा दिया.’

मगर प्रज्ञा ठाकुर इतने पर ही नहीं रुकीं. चुनाव प्रचार के आख़िरी चरण से कुछ पहले जब फिल्म अभिनेता से नेता बने कमल हासन ने महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे को ‘आज़ाद भारत का पहला हिंदू आतंकी’ कहा तो प्रज्ञा का धैर्य फिर ज़वाब दे गया. उन्होंने कमल हासन के बयान की प्रतिक्रिया में कहा, ‘नाथूराम गोडसे देशभक्त थे, हैं और रहेंगे.’ इस बयान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी कहना पड़ा, ‘महात्मा गांधी के बारे में जिसने भी ये बयान दिया है, उसे मैं दिल से कभी माफ़ नहीं कर पाऊंगा.’

इसके बाद से प्रज्ञा ठाकुर ने मौन व्रत ले लिया है. लेकिन देश उनके बारे में बातें कर रहा है. बड़े-बड़े विश्लेषक उनके बारे में टिप्पणियां कर रहे हैं. बता रहे हैं कि उनकी जीत-हार प्रदेश के साथ-साथ देश की सियासत में क्या-कुछ साबित कर सकती है.

देश की सियासत के लिहाज़ से

ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल ‘द प्रिंट’ के प्रधान संपादक और देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने बुधवार, 22 मई काे ही दैनिक भास्कर में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है, ‘दिग्विजय सिंह (भोपाल से कांग्रेसी उम्मीदवार) हिंदू आतंकवाद पर कांग्रेस के सबसे मुखर प्रवक्ता रहे हैं. भाजपा को उनसे इसका हिसाब चुकता करना था. उसका मानना था कि दिग्विजय के सामने हिंदू आतंकवाद के आरोप में ग़िरफ़्तार लोगों में से सबसे कट्‌टर प्रतिद्वंद्वी को उतारना उचित हाेगा... और उसने आतंकवाद की आरोपित भगवाधारी हिंदू आइकन (प्रज्ञा ठाकुर) को उतार दिया. इस दलील के साथ कि ‘दोष सिद्ध होने तक हर व्यक्ति निर्दोष है... लेकिन हिंदुत्व के इसी आइकन ने चुनाव के अंत तक नरेंद्र मोदी और अमित शाह को बचाव की मुद्रा में ला दिया. उनकी (प्रज्ञा की) इस उपलब्धि को तो मानना ही होगा.’

अंत में शेखर गुप्ता लिखते हैं, ‘अगर मोदी ने ईमानदारी से कहा है कि वे प्रज्ञा को कभी माफ़ नहीं कर पाएंगे ताे उन्हें यह (ईश्वर से) प्रार्थना करनी चाहिए कि चुनाव नतीज़ों में उनकी (प्रज्ञा की) जीत न हो. अगर वे जीतीं तो (बीते) पांच साल तक (महात्मा) गांधी के नाम पर शासन चलाने वाले दल (भाजपा) को संसद में एक ऐसे सदस्य की मौज़ूदगी की शर्मिंदगी उठानी होगी, जो गांधी के हत्यारे काे देशभक्त बताती है.’

ऐसे ही भोपाल में 12 मई को मतदान से ठीक पहले प्रकाशित अपने लेख में प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार उमेश त्रिवेदी लिखते हैं, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भोपाल से प्रज्ञा ठाकुर की उम्मीदवारी से भाजपा में हिंदुत्व के नाम पर अतिवादी राजनीति के अध्याय की शुरुआत हुई है. ऐसा अध्याय जो संविधान की रगों में प्रवाहित लोकतंत्र को लहूलुहान करेगा. प्रज्ञा ठाकुर की उम्मीदवारी मध्य प्रदेश भाजपा की तासीर को भी आहत करती है और राज्य के विकास की अवधारणाओं के पंखों को भी कुतरती है.’

वहीं वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह भी द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने लेख में लिखते हैं, ‘भाजपा ने प्रज्ञा ठाकुर में हिंदुत्व का नया चेहरा ढूंढ़ लिया है. प्रज्ञा की उम्मीदवारी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन लोगों को प्रतीकात्मक उत्तर बताते हैं जिन्होंने ग़लत तरीके से हिंदुओं पर आतंकी होने का ठप्पा लगाया... वहीं आरएसएस इसे (प्रज्ञा की उम्मीदवारी) राष्ट्र निर्माण से जोड़कर गर्वित है.’ फिर इसी लेख के अंत में भाजपा के किसी वरिष्ठ नेता की प्रतिक्रिया के तौर पर सिंह लिखते हैं, ‘हमने (भाजपा ने) एक बड़ा ज़ोख़िम लिया है. अगर हम हारते हैं तो इसका मतलब ये लगाया जाएगा कि मतदाताओं ने हिंदुत्व को ख़ारिज़ कर दिया है.’

प्रदेश की राजनीति के हिसाब से

भोपाल के युवा पत्रकार आलोक और प्रशांत प्रज्ञा ठाकुर की जीत-हार को प्रदेश की राजनीति के हिसाब से परिभाषित करते हैं. आलोक कहते हैं, ‘इस चुनाव से पहले मुख्यमंत्री कमलनाथ ने काफ़ी सोच-समझकर दिग्विजय सिंह को भोपाल जैसी किसी मुश्किल सीट से लड़ने की चुनौती दी थी. इस तरह वे एक तीर से दो निशाने साध रहे हैं. पहला- दिग्विजय जीते तो एक अहम सीट कांग्रेस के ख़ाते में लाने का श्रेय उन्हें भी जाएगा ही. दूसरा- अगर दिग्विजय हारे तो वे सियासत में कमज़ोर होंगे और कमलनाथ की ताक़त बढ़ेगी, जिन पर प्रदेश कांग्रेस और राज्य सरकार की कमान संभालने की शुरुआत से ही दिग्गी राजा पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भरता के आरोप लग रहे हैं.’

वहीं प्रशांत की मानें तो ‘प्रदेश की राजनीति में दिग्विजय सिंह अब तक ‘सड़क-बिजली-पानी के कुशासन’ के प्रतीक बने हुए हैं. हरेक चुनाव में भाजपा आज भी उनके ‘बंटाढार शासन’ के बारे में लोगों को याद दिलाती है. या कहिए कि डराती है. इस बार भी यही सब किया गया. लेकिन अगर भोपाल का नतीज़ा दिग्विजय के पक्ष में रहता है ताे यह धारणा मज़बूत होगी कि लोगों की स्मृति इतनी मज़बूत नहीं कि वे 15 साल पुराने किन्हीं मुद्दों पर आज के चुनाव में मतदान करें. उनका सरोकार वर्तमान से कहीं ज़्यादा है.’

यानी इस बार के चुनाव में भोपाल शायद देश का इक़लाैता संसदीय क्षेत्र रहा, जहां चुनाव के दौरान प्रतीकों की राजनीति हुई. वह भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों का पूरा प्रचार अभियान बस प्रतीकों के इर्द-ग़िर्द घूमता रहा. लिहाज़ा अब 23 मई का नतीज़ा यहां से प्रतीकों में ही बताएगा कि देश की सियासत ‘कट्‌टर राष्ट्रवाद के लिहाफ़ में ढंके हिंदुत्व’ की तरफ़ बढ़ रही है या नहीं. लोगों ने मुद्दों-प्रत्याशियों को तरज़ीह दी या पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर सबक सिखाने का हौसला दिखाने वाले ‘राष्ट्रवादी नरेंद्र मोदी’ को. और प्रदेश में? दिग्विजय सिंह ‘अतीत के दाग’ धोकर आगे बढ़ेंगे या कमलनाथ सत्ता-सियासत की नई इबारत लिखेंगे. इंतज़ार कीजिए, नतीज़ा आने को ही है.