लोकसभा चुनाव के लिए एग्जिट पोलों के आने के बाद से ही विपक्ष इन्हें नकार रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इन्हें फर्जी बताया है तो तृणमूल कांग्रेस मुखिया ममता बनर्जी ने कहा है कि इनकी आड़ में ईवीएम में गड़बड़ी की जा सकती है. एग्जिट पोलों पर सवाल उठाने के और भी कारण गिनाए जा रहे हैं. बीते दो दिनों के राजनीतिक घटनाक्रम के हवाले से कहा जा रहा है कि इसकी पूरी संभावना है कि एग्जिट पोल में ‘झोल हो सकता है’.

जानकारों के मुताबिक़ इस संभावित झोल का पहला कारण तो यही है कि एग्जिट पोल में बंपर जीत दिखाए जाने के बाद भी भाजपा ख़ेमे में कोई बड़ी हलचल देखने को नहीं मिल रही. हालांकि मंगलवार को भाजपा के नेतृत्व में एनडीए ने बैठक बुलाई थी, लेकिन इसे लेकर ख़ास गर्मजोशी देखने को नहीं मिली. उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी पोल पर चुप हैं. सवाल किया जा रहा है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व एग्जिट पोलों के नतीजों पर ख़ुशी क्यों नहीं जता रहा है. कई लोगों के मुताबिक़ नरेंद्र मोदी और अमित शाह से ऐसी ख़ामोशी की उम्मीद नहीं रहती है, ख़ास तौर पर तब,जब परिस्थितियां उनके पक्ष में हों.

बहरहाल, एग्जिट पोल पर सवाल उठाने के और भी कारण गिनाए जा रहे हैं जो मंगलवार को सामने आई तीन बड़ी ख़बरों से जुड़े हैं. इस दिन सीबीआई ने आय से अधिक संपत्ति मामले में समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव को क्लीन चिट दे दी. मुलायम सिंह चुनाव से पहले संसद में कह चुके हैं कि वे चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी फिर प्रधानमंत्री बनें. ऐसे में सीबीआई से उन्हें क्लीन चिट मिलने को उत्तर प्रदेश में भाजपा के अनुमानित चुनावी नुक़सान से जोड़ कर देखा जा रहा है. सवाल उठाया जा रहा है कि क्या सपा-बसपा गठबंधन की वजह से होने वाले इस नुक़सान की भरपाई के लिए भाजपानीत केंद्र सरकार ने संकेत के रूप में मुलायम को सीबीआई से क्लीन चिट दिलवाई है.

उधर, मंगलवार को ही खबर आई कि रफ़ाल विवाद को लेकर कांग्रेस पर 5,000 करोड़ रुपये का मानहानि का मुक़दमा दायर करने वाले रिलायंस एडीएजी समूह ने भी अपने क़दम पीछे हटा लिए. ख़बरों के मुताबिक़ इस मामले में नेशनल हेराल्ड के वकीलों ने बताया कि समूह ने कांग्रेस के सभी नेताओं और अख़बार के ख़िलाफ़ दायर किए सभी केस वापस लेने के निर्देश दिए हैं. इस पर सोशल मीडिया पर आईं प्रतिक्रियाओं में कहा गया कि शायद अनिल अंबानी के स्वामित्व वाले रिलायंस एडीएजी को भी एग्जिट पोलों पर पूरी तरह यक़ीन नहीं है.

इसके अलावा मंगलवार को एनडीए की बैठक से पहले उसके प्रमुख सहयोगी नीतीश कुमार एक बार फिर ‘बदले-बदले’ से नज़र आए. उन्होंने कहा कि वे धारा 370 और 35ए हटाने तथा यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने के ख़िलाफ़ हैं. राम मंदिर मसले को उन्होंने आपसी बातचीत से सुलझाने का सुझाव दिया और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने का अपना वादा फिर दोहराया. नीतीश कुमार ने कहा कि भाजपा के साथ हाथ मिलाने के समय से उनकी पार्टी इन बातों पर क़ायम है. उनके इस रुख के बारे में भी कुछ लोग कह रहे हैं कि नीतीश कुमार को भी नतीजों के एग्जिट पोल से अलग जाने का अंदेशा है.

इतना ही नहीं, महाराष्ट्र में भाजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने वाली शिवसेना भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी की तारीफ़ करती दिखी. हालांकि पार्टी एनडीए की जीत का दावा कर रही है लेकिन अपने मुखपत्र ‘सामना’ में उसने राहुल और प्रियंका को ‘कड़ी मेहनत करने वाला नेता’ बताया. वहीं, मंगलवार की बैठक में शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे शामिल ज़रूर हुए, लेकिन उससे पहले ख़बर आई थी कि वे इसमें हिस्सा नहीं लेंगे. ऐसा क्यों, इस बारे में कोई पुख़्ता जानकारी अभी तक सामने नहीं आई है. लेकिन यह चुनाव के दौरान शिवसेना के उस रुख़ की ओर इशारा करता है, जिसके मुताबिक़ पार्टी का कहना था कि भाजपा का बहुमत के साथ सरकार बनाना मुश्किल है.

इससे पहले चुनाव प्रचार के दौरान ख़ुद भाजपा ने एनडीए का दायरा बढ़ाने का संकेत दिया था. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि उनकी पार्टी ज़रूर अपने गठबंधन में अन्य दलों को शामिल करना चाहेगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजेडी प्रमुख नवीन पटनायक की प्रशंसा किए जाने को पार्टी के इसी विचार से जोड़ा गया था. वहीं, पूरे चुनाव में गठबंधन को महामिलावट बताने में लगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल में इसे ‘कला’ और पूर्व प्रधानमंत्री ‘अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत’ बताया. कई जानकारों का मानना है कि चुनाव के दौरान और हाल के इन तमाम घटनाक्रमों से साबित होता है कि भाजपा समेत उसके सहयोगी दलों को भी एग्जिट पोलों पर पक्का भरोसा नहीं है.