इस लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग पर लगातार सवाल उठे हैं. सात चरणों में चुनाव करवाना से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को आचार संहिता उल्लंघन के मामलों में क्लीन चिट देने जैसे कई फैसलों को लेकर उस पर सत्ताधारी दल का समर्थन करने के आरोप लगे हैं. ऐसी ही एक और घटना के कारण सोशल मीडिया में आज वह फिर लोगों के निशाने पर है.

दरअसल बीते कुछ समय से विपक्षी दल इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में छेड़छाड़ की आशंका जताते रहे हैं. बुधवार को चुनाव आयोग के ट्विटर हैंडल से ‘ऑपइंडिया’ नाम की एक वेबसाइट का आलेख साझा किया गया था (जो बाद में ‘डिलीट’ भी कर दिया गया). इस आलेख में एक आईएएस अधिकारी के हवाले से यह बताया गया है कि ईवीएम को हैक नहीं किया जा सकता. यह आलेख सवाल-जवाबों की वेबसाइट ‘कोरा’ पर मौजूद एक जवाब को लेकर तैयार किया है. कोरा को वैसे भी विश्वसनीय नहीं माना जाता और वहीं ‘ऑपइंडिया’ को भाजपा समर्थक वेबसाइट माना जाता है जिस पर कई बार फर्जी खबरें देने के आरोप भी लग चुके हैं. और इसीलिए चुनाव आयोग को फेसबुक और ट्विटर पर जमकर घेरा जा रहा है. इस सिलसिले में आई कुछ प्रतिक्रियाएं :

रघु कर्नाड | @rkarnad

मैं ईवीएम की सुरक्षा को लेकर पहले चिंतित नहीं था, लेकिन अब हूं. चुनाव आयोग ने फर्जी खबरों के मुख्यालय (ऑइंडिया) का हवाला देते हुए जनता को ईवीएम के प्रति आश्वस्त किया है.

केबी | @Kambhakt_

तथ्यों को सही तरीके से देने में ऑपइंडिया की इतनी साख है कि आखिर चुनाव आयोग को वह ट्वीट डिलीट करना पड़ा.

अभिनंदन सेखरी | @AbhinandanSekhr

अपनी विश्वसनीयता को साबित करने के लिए ऑपइंडिया का आलेख साझा करके चुनाव आयोग ने अपनी काबिलियत दिखा दी है.

सायंतन घोष | @sayantansunnyg

एक मुफ्त की सलाह (चुनाव आयोग को) : ऑपइंडिया के आलेख को शेयर करने और सारे संदेहों को सही साबित करने से बेहतर था चुप रहना और राजनीतिक रूप से पक्षपाती संस्थान समझा जाना.

बैट्टी |‏ @MrBatty_

चुनाव आयोग ने यह साबित करने के लिए कि ईवीएम फुलप्रूफ हैं ‘ऑपइंडिया’ का आलेख साझा किया है. मुझे हैरानी नहीं होगी अगर अब आयोग भारतीय चुनावों की अर्थव्यवस्था की व्याख्या करने के लिए अरुण जेटली के ब्लॉग को साझा कर दे.

क्लॉउडी जेटली (वसूली भाई) | @Vishj05

ईवीएम को फुलप्रूफ साबित करने के लिए चुनाव आयोग ने ऑपइंडिया का एक आलेख शेयर किया है. अब यह सबसे बड़ी वजह है जिसके आधार पर माना जा सकता है कि आयोग खुद फुलप्रूफ नहीं है.