केंद्र में एक बार फिर नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार की राह प्रशस्त हो गई है. पिछली बार की तरह इस बार भी यह सरकार बनाने में हिंदी पट्टी के बड़े राज्यों- उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश की अहम भूमिका दिख रही है. हालांकि, इस लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां नुकसान होने की आशंका थी. इसकी वजह पिछले साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार और उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद के गठबंधन को माना गया. इस नुकसान की भरपाई के लिए भाजपा उन राज्यों की तरफ देख रही थी जहां उसका आधार परंपरागत रूप से कमजोर रहा है. इनमें पश्चिम बंगाल शामिल भी है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य की 42 में से 23 सीटें हासिल करने का लक्ष्य रखा था.

राजनीतिक पंडित कह रहे थे कि यदि पश्चिम बंगाल में भाजपा दहाई का भी आंकड़ा छू लेती है तो इसे बड़ी उपलब्धि माना जाएगा. ताजा रूझान बताते हैं कि पार्टी राज्य की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को कड़ी टक्कर दे रही है और अंतिम परिणामों में भाजपा का आंकड़ा 20 के करीब पहुंच सकता है. टीएमसी के लिए यह आंकड़ा 22 है. वहीं, अगर वोट शेयर की भी बात करें तो भाजपा को करीब 40 फीसदी मत मिलता हुआ दिख रहा है.

इस तरह देखें तो देश की सबसे बड़ी पार्टी को अन्य राज्यों जो छिट-पुट नुकसान होता दिखता है, उसकी पूरी भरपाई वह करीब-करीब अकेले पश्चिम बंगाल में करती दिख रही है. साल 2014 के चुनाव में पार्टी ने राज्य की 42 में से केवल दो सीटों- दार्जिलिंग और आसनसोल में जीत दर्ज की थी. इस लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा उपचुनाव में भाजपा आठ में से चार सीटों पर आगे चल रही है. टीएमसी तीन सीटों पर आगे है.

इन चुनावी रूझानों के आधार पर माना जा सकता है कि एक लंबे समय तक वाममुखी यानी वाम मोर्चे की तरफ झुका रहा पश्चिम बंगाल अब दायीं यानी दक्षिणपंथी विचारधारा की ओर मुड़ता हुआ दिख रहा है. इससे पहले साल 2011 में राज्य से वाम दलों की सरकार की विदाई ममता बनर्जी ने की थी. लेकिन, अब तृणमूल सुप्रीमो अपने गढ़ में एक लगातार मजबूत होती प्रतिद्वंदी पार्टी से जूझ रही है.

अब सवाल पैदा होता है कि आजादी के बाद पहले जो जनसंघ और फिर 1980 से 2014 तक जो भाजपा अपने मार्गदर्शक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमि पर कमजोर थी, वह अचानक इतनी मजबूत कैसे हो गई. पश्चिम बंगाल इसकी ओर इतनी तेजी से कैसे मुड़ता गया? माना जा रहा है कि इसके लिए भाजपा के आक्रामक चुनावी अभियान के साथ राज्य में बदलती राजनीतिक और अन्य परिस्थितियां भी जिम्मेदार हैं. इन्हें एक-एक करके देखते हैं.

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति

बीते तीन-चार वर्षों के दौरान पश्चिम बंगाल में भाजपा का विस्तार और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण साथ-साथ बढ़ते दिखे हैं. चुनाव प्रचार अभियान के दौरान देखा गया कि भाजपा ने ममता बनर्जी सरकार पर लगातार हिंदुओं के उत्पीड़न और मुसलमानों के तुष्टिकरण के आरोप लग. साथ ही, उसने ‘जय श्री राम’ जैसे धार्मिक नारों के साथ भी ममता सरकार की घेरेबंदी करने की कोशिश की.

सत्याग्रह ने चुनावी तारीखों के एलान से पहले फरवरी में राज्य के मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तरी दिनाजपुर, दक्षिणी दिनाजपुर और सिलीगुड़ी जैसे इलाकों का दौरा किया था. इस दौरान साफ देखा जा सकता था कि पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ताप बढ़ रहा है. सिलीगुड़ी में ऑटो रिक्शा चलाने वाले चितरंजन गोस्वामी का कहना था, ‘जहां-जहां मुसलमानों की आबादी अधिक है, वहीं हिंदू-मुसलमान फसाद होता रहता है. यदि ये चलन बढ़ता है और सारे हिंदू एक साथ आते हैं तो भाजपा को फायदा होगा.’ वहीं, मालदा में ई-रिक्शा चलाने वाले दिलीप मंडल सहित कई लोग ऐसे भी थे एक विशेष समुदाय के लोगों को खुश करने की नीतियों को लेकर ममता बनर्जी को कठघरे में खड़ा कर दिया था.

इन बातों को मालदा के उदाहरण से समझा जा सकता है. सांप्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील इस जिले की दोनों सीटों-मालदा उत्तर और मालदा दक्षिण की सीटों पर भाजपा आगे चल रही है. इससे पहले इन दोनों सीटों पर कांग्रेस की मजबूत पकड़ थी. साल 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने तीन सीटों पर कब्जा किया था. इनमें एक सीट मालदा स्थित वैष्णबनगर भी थी. इसी सीट के तहत कालियाचक प्रखंड भी आता है. कालियाचक में विधानसभा चुनाव से तीन महीने पहले तीन जनवरी, 2016 को दो समुदायों के बीच हुई हिंसक झड़प ने बाद में सांप्रदायिक रूप ले लिया था. इस घटना के बाद पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाएं वक्त-वक्त पर सामने आती रही हैं.

साल 2014 के बाद से पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी की पुष्टि गृह मंत्रालय के आंकड़े भी करते हैं. कुछ समय पहले लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में मंत्रालय ने बताया कि साल 2017 में राज्य में सांप्रदायिक हिंसा के कुल 58 मामले सामने आए थे. साल 2014 में यह आंकड़ा 16 था. इसके बाद 2015 में यह बढ़कर 27 हुआ और फिर 2016 में 32. यानी 2014 से 2017 के बीच इस तरह की घटनाओं में 360 फीसदी बढ़ोतरी देखी गई.

पश्चिम बंगाल : लोकसभा चुनाव 2019 में राजनीतिक दलों के वोट शेयर | साभार : चुनाव आयोग
पश्चिम बंगाल : लोकसभा चुनाव 2019 में राजनीतिक दलों के वोट शेयर | साभार : चुनाव आयोग

कांग्रेस का हाशिए पर जाना और वाम दलों का सूपड़ा साफ होना

राज्य की राजनीति में एक ओर भाजपा जितनी तेजी से ऊपर उठी है, कांग्रेस और वाम दलों का पतन भी उतनी ही तेजी से हुआ है. इस चुनाव में कांग्रेस एक-दो सीटों पर सिमटती दिख रही है. वहीं, वाम दलों का खाता खुलना भी मुश्किल दिख रहा है. चुनाव से पहले इन पार्टियों के कई बड़े नेता और कार्यकर्ता तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में शामिल हो चुके थे. फरवरी में सीपीएम के विधायक खगेन मुर्मू ने भाजपा की सदस्यता ली और पार्टी ने उन्हें मालदा उत्तर सीट से टिकट दिया. चुनावी रूझानों के मुताबिक वे तृणमूल कांग्रेस की मौसम नूर के मुकाबले करीब 9,000 मतों से आगे चल रहे हैं. इससे पहले बतौर कांग्रेस उम्मीदवार मौसम ने पिछले आम चुनाव में जीत हासिल की थी. यानी इस संसदीय सीट पर जिन उम्मीदवारों के बीच मुकाबला चल रहा है, उनका पहले संबंध कांग्रेस और सीपीएम से रहा है.

करीब तीन महीने पहले न्यू फरक्का के रहने वाले इंसान खान ने सत्याग्रह को बताया था, ‘मुर्शिदाबाद और मालदा का इलाका कांग्रेस का रहा है. लेकिन अब पार्टी धीरे-धीरे कमजोर रही है. पार्टी के कार्यकर्ता पार्टी छोड़ रहे हैं.’ सूबे में यह हाल कांग्रेस का ही नहीं, वाम दलों खासकर सीपीएम का भी है. उनका कहना था, ‘सीपीएम में अब तो केवल बूढ़े लोग बचे हुए हैं, जो लाल रंग का झंडा उठाए हुए हैं. पार्टी के पास अब शक्ति नहीं है, इसलिए इसका लोग पार्टी छोड़कर जा रहा है.’ माना जा रहा है कि बीते कुछ महीनों में इन दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के भाजपा में शामिल होने की प्रक्रिया में और तेजी आई.

वहीं, पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा रही है कि वाम दलों के समर्थकों को भी यह लग रहा है कि फिलहाल तृणमूल को टक्कर देने की शक्ति भाजपा के पास ही है. इस बात को ध्यान में रखते हुए ही ये ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर करने के लिए अपनी विचारधार के उलट वाली पार्टी के साथ भी जाने को तैयार दिख रहे हैं. माना जा रहा है कि यह प्रक्रिया लोकसभा चुनाव तक ही सीमित नहीं रहने वाली. राज्य में जो परिस्थितियां बनती हुई दिख रही हैं, उससे यह लगता है कि दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव तक यह प्रक्रिया और तेज हो सकती है.