पिछले साल दिसंबर में मध्य प्रदेश में जैसे-तैसे कांग्रेस की सरकार बनी थी. तब से ही लगातार भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों के बीच यह बात चल रही थी कि अगर लोकसभा चुनावों में पार्टी एक बार फिर जीतती है तो मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार के लिए आगे चल पाना बेहद मुश्किल होगा. यही बात कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस की सरकार के बारे में भी कही जा रही थी.

अब जब लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा और उसके सहयोगियों को 2014 से भी बड़ा जनादेश मिला है तो इस चर्चा ने फिर जोर पकड़ लिया है. इन नतीजों ने न सिर्फ यह तय किया है कि दिल्ली से कौन पूरे देश पर अगले पांच साल तक शासन करेगा बल्कि यह भी कि कर्नाटक और मध्य प्रदेश की राज्य सरकारों की आगे की राह आसान नहीं है. एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद से ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ यह बयान दे रहे हैं कि भाजपा उनके विधायकों को खरीदने की कोशिश कर रही है. कर्नाटक में कांग्रेस के नेताओं ने भी भाजपा पर इसी तरह के आरोप लगाने शुरू कर दिए हैं.

ऐसे में यह समझना जरूरी है कि लोकसभा में प्रचंड बहुमत के बाद आखिर वे कौन सी राजनीतिक परिस्थितियां हैं जो इन दोनों राज्यों में भाजपा सरकार के लिए राह तैयार कर सकती हैं? अगर कर्नाटक की बात करें तो 2018 के विधानसभा चुनावों में भाजपा यहां की विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. 225 सदस्यों वाली कर्नाटक विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 113 का है. कुमारस्वामी सरकार को कुल 116 विधायकों का समर्थन हासिल है. इसमें उनकी पार्टी के 37 विधायकों के अलावा कांग्रेस के 78 और बहुजन समाज पार्टी का एक विधायक शामिल हैं.

वहीं दूसरी तरफ भाजपा के कर्नाटक में 104 विधायक हैं और उसे दो और विधायकों का समर्थन हासिल है. इस तरह से भाजपा के पास कुल 106 विधायक हैं. विधानसभा में अभी दो सीटें खाली हैं. इसका मतलब यह हुआ कि राज्य में इस समय बहुमत का आंकड़ा 112 का है. ऐसे में अगर इसी विधानसभा को बरकरार रखते हुए भाजपा को सरकार बनानी है तो उसके सामने दो विकल्प हैं.

पहला विकल्प तो यह है कि जेडीएस को कांग्रेस से अलग किया जाए. लेकिन इसमें अड़चन यह है कि शायद 104 विधायकों वाली भाजपा एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री का पद देने के लिए तैयार न हो. भाजपा के अंदर एक बात यह चल रही है कि कुमारस्वामी को केंद्र में कोई अच्छा मंत्रालय देने का प्रस्ताव दिया जा सकता है. लेकिन कर्नाटक जैसे राज्य का मुख्यमंत्री पद छोड़कर वे इतनी आसानी से केंद्र में जाने के लिए तैयार नहीं होंगे. हालांकि अपनी सरकार गिरने की स्थिति में उनके पास ज्यादा विकल्प बचते नहीं हैं. क्योंकि तब उनकी पार्टी के कुछ विधायक भी उनका साथ छोड़ सकते हैं.

कर्नाटक विधानसभा चुनावों में भाजपा का काम देखने वाले भाजपा के एक राष्ट्रीय नेता इस बारे में कहते हैं, ‘संभव है कि लोकसभा नतीजों के बाद कांग्रेस और जेडीएस में आपसी टकराव बढ़े और कुमारस्वामी सरकार अपने आप ही गिर जाए. अगर ऐसा होता है तो हमें जेडीएस के समर्थन से सरकार बनाने से कोई परहेज नहीं है. लेकिन एक विकल्प यह भी हो सकता है कि इस साल के अंत में महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के विधानसभा चुनावों के साथ ही कर्नाटक में फिर से चुनाव करा लिए जाएं.’

इसी तरह की स्थिति मध्य प्रदेश में भी बन सकती है. 231 विधायकों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 116 विधायकों का है. प्रदेश की कमलनाथ सरकार को 120 विधायकों का समर्थन हासिल है. इनमें 113 विधायक कांग्रेस के हैं. इसके अलावा उन्हें बहुजन समाज पार्टी के दो, समाजवादी पार्टी के एक और चार निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन हासिल है.

इसके उलट भाजपा के पास 109 विधायक हैं. और अगर दूसरे दलों के सभी विधायकों को वह अपने पाले में कर लेती है तो उसे बहुमत का आंकड़ा हासिल हो जाएगा. प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ खुल तौर पर आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा उनके विधायकों को 25 करोड़ रुपये का प्रस्ताव देकर अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है.

हालांकि, मध्य प्रदेश में भाजपा के सबसे बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी सूत्रों का दावा है कि खुद वे ऐसा नहीं चाहते हैं. वे पहले विकल्प के तौर पर दूसरी पार्टियों के विधायकों को तोड़ने के बजाय मध्य प्रदेश में नए सिरे से चुनाव कराना चाहते हैं. जब मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजे आए थे तो उस वक्त सीटों की संख्या के मामले में थोड़ा ही पीछे रहने के बावजूद उन्होंने पहले ही यह कह दिया था कि वे जोड़-तोड़ करके अपनी सरकार नहीं बनाएंगे.

लेकिन भाजपा के केंद्रीय स्तर के कुछ नेताओं से बात करने पर पता चलता है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों यह चाहते हैं कि शिवराज सिंह चौहान अब मंत्री बनकर दिल्ली आएं और प्रदेश का काम दूसरे नेता संभालें. अगर ऐसा हो जाता है तो भाजपा मौजूदा विधानसभा में ही जोड़-तोड़ करके सरकार बनाने की कोशिश कर सकती है.

इस काम के लिए कुछ केंद्रीय नेता कैलाश विजयवर्गीय का नाम ले रहे हैं. इन लोगों का कहना है कि पश्चिम बंगाल के प्रभारी के तौर पर वे सफल साबित हुए हैं. पश्चिम बंगाल के लोकसभा चुनावों में अगर भाजपा अच्छा प्रदर्शन करने में कामयाब हुई है तो इसमें संगठन के स्तर वर विजयवर्गीय की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. कैलाश विजयवर्गीय की पहचान पार्टी के अंदर अमित शाह के करीबी की है. ऐसे में शिवराज सिंह चौहान को दिल्ली बुलाकर प्रदेश में कैलाश विजयवर्गीय को सक्रिय करने का निर्णय लिया जा सकता है.

कुल मिलाकर लोकसभा चुनावों के बाद यह तो तय हो गया है कि मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार और कर्नाटक की कुमारस्वामी सरकार के लिए आगे की राह आसान नहीं है. इन्हें सत्ता से बेदखल करने के लिए भाजपा क्या रास्ता अपनाएगी, अब बस यही देखा जाना बाकी है.