प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा नरेंद्र मोदी की अगुवाई में फिर केंद्र में सरकार बनाने जा रही है. अपने दम पर करीब 300 सीटों के आंकड़े के साथ उसने 2014 की जीत को भी पीछे छोड़ दिया है. इनमें से 200 सीटें ऐसी हैं जहां भाजपा को 50 फीसदी से भी ज्यादा वोट मिले हैं.

उधर, कांग्रेस का हाल उलट है. 2014 में रसातल में पहुंचने के बाद 2019 में भी उसकी हालत में कोई खास फर्क नहीं आया है. उसके 52 सीटों के आंकड़े को देखें तो कहा जा सकता है कि वह मजबूत विपक्ष भी नहीं बन पाई है.

कांग्रेस एक व्यापक जनाधार वाली पार्टी रही है जिसका इतिहास उतना ही पुराना है जितना भारत की स्वतंत्रता का इतिहास. इसी इतिहास के दम पर कांग्रेस ने मुश्किल समय में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी. लेकिन अब इसका वर्तमान इसके भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

सवाल उठता है कि आखिर देश की सबसे पुराने पार्टी का यह हाल कैसे हो गया. गहराई से देखने पर इसके चार मोटे कारण समझ में आते हैं.

मृतप्राय संगठन

कई मानते हैं कि ज़मीनी स्तर पर संगठन की लचर हालत कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल है. अपने एक लेख में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के अध्यक्ष संजय कुमार और चुनावी विश्लेषक प्रवीण राय लिखते हैं कि कांग्रेस में सांगठनिक कमजोरी के बीज आज़ादी के बाद के शुरुआती सालों में ही पड़ने लगे थे. उनके मुताबिक जवाहरलाल नेहरू जैसी कद्दावर शख्सियत ने पार्टी को मजबूत तो किया, लेकिन यह मजबूती व्यक्ति केंद्रित थी. प्रवीण राय मानते हैं कि सारी ताकत नेहरू के हाथ में आ गई थी जिसने एक लिहाज से पार्टी का सांगठनिक ढांचा कमजोर किया. उनके मुताबिक इसके बाद इंदिरा गांधी के समय में अपने वफ़ादारों को पार्टी में ख़ास जगह देने की शुरुआत हुई. राय का मानना है कि इसके चलते संगठन कमज़ोर होता चला गया.

अब इसकी तुलना में भाजपा को देखें तो कहानी उल्टी दिखती है. हाल में सातों चरणों के मतदान पूरे होने के बाद अमित शाह ने अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में संगठन की बात की. उन्होंने बताया कि किस मुख्यमंत्री ने कितनी जनसभाएं कीं. अमित शाह के मुताबिक 3800 विधानसभा क्षेत्र ऐसे थे जहां चार से ज़्यादा कार्यक्रम किए गए. चुनावों की तैयारी के लिए 18 राष्ट्रीय और 29 राज्य स्तर की समितियां बनाई गईं जिनकी निगरानी में 482 लोकसभा चुनाव संचालन समितियों ने काम किया. इन समितियों में 7230 कार्यकर्ताओं को ज़िम्मेदारियां दी गईं. अमित शाह ने यह भी बताया कि उन 120 लोकसभा सीटों पर भी तीन साल तक काम किया गया जिन पर भाजपा पिछली बार नहीं जीत सकी थी और इनमें से 80 सीटों पर उम्मीदवार उतारे गए. कुल मिलाकर कहें तो इससे अंदाजा लगता है कि संगठन कितने व्यापक दायरे में और कितनी बारीकी से काम कर रहा था.

कांग्रेस नेतृत्व ऐसे कोई आंकड़े देता नज़र नहीं आता. ऐसा लगता है कि वह बस यह माने बैठा था कि मोदी सरकार से परेशान वर्ग मजबूरी में अपने आप उस तक चला आएगा. नतीजों से साफ है कि ऐसा नहीं हुआ. एक आलेख में वरिष्ठ स्तंभकार प्रताप भानु मेहता कहते हैं, ‘पिछले पांच साल में अगर आप कांग्रेस का विश्लेषण करें तो प्रियंका गांधी को राजनीति में लाने के सिवाय किसी भी राज्य में किसी भी स्तर पर कांग्रेस के संगठन में कोई परिवर्तन आया क्या?’

कांग्रेस कार्यकर्ता राजविंद तिवारी भाजपा की जीत में नरेंद्र मोदी के जादू के अलावा प्रबंधन का कमाल भी देखते हैं. वे कहते हैं, ‘मोदी-शाह से पहले भाजपा बूथ प्रबंधन के लिए संघ के छोटे संगठनों पर निर्भर थी. लेकिन इन दोनों के मुख्य भूमिका में आने के बाद बूथ स्तर के कार्यकर्ता को ज़िम्मेदारी और पहचान दोनों मिली. इन्हें सोशल मीडिया और तकनीक के ज़रिए सीधे पार्टी की मुख्य कमांड से जोड़ दिया गया. चुनावी जनसभाओं में इन्हें बड़े नेताओं के बग़ल में जगह मिलने लगी’.

तिवारी आगे जोड़ते हैं, ‘ये सिर्फ ज़मीन पर लोगों को पार्टी से जोड़ने का काम नहीं कर रहे थे बल्कि पार्टी से आने वाले संदेशों को भी ओपीनियन की शक्ल में लोगों तक फैला रहे थे. उन्हें बता रहे थे कि मोदी ने डोकलाम और बालाकोट में क्या किया. उधर, कांग्रेस अब भी पुराने कांग्रेसी परिवारों को बस्ते (पोलिंग बूथ की ज़िम्मेदारी) दे रही थी. ये लोग पार्टी से ज़्यादा स्थानीय नेताओं के लिए काम करते हैं. अगर इनके नेता को टिकट नहीं मिला तो ये काम भी नहीं करेंगे.’

भाई-भतीजावाद और वंशवाद

जानकारों के मुताबिक ज़मीनी संगठन न के बराबर होने का असर यह हुआ कि कैडर आधारित पार्टियों के मुक़ाबले कांग्रेस में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर सत्ता कुछ परिवारों तक केंद्रित होकर रह गई. गांधी परिवार पर तो हमेशा से ही वंशवाद का आरोप लगता ही रहा है लेकिन इसके अलावा भी तमाम परिवार हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी सत्ता हस्तांतरित करते रहे हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया, आरपीएन सिंह, मिलिंद देवड़ा, जितेंद्र प्रसाद, सचिन पायलट और जितेंद्र सिंह भंवर जैसे दूसरी-तीसरी पीढ़ियों के इन नेताओं के खिलाफ पार्टी से ज़्यादा अपने हित देखने की शिकायत सुनाई देती रही है. मिसाल के लिए कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया को इन चुनावों के लिए उत्तर प्रदेश-पश्चिम का प्रभारी बनाया गया, लेकिन वे इस क्षेत्र में जमीन पर न के बराबर ही दिखाई दिए.

यही नहीं, आरोप यह भी लगते हैं कि टिकट देने के मामले में भी कांग्रेस में परिवारवाद काम करता है. 2017 के दिल्ली एमसीडी चुनावों के वक्त कांग्रेस छोड़ कर भाजपा का दामन थामने वाले युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अमित मलिक ने आरोप लगाया था कि युवा कांग्रेस के सदस्यों को 20 टिकट देने की मांग के बावजूद उन्हें खाली हाथ रहना पड़ा जबकि नेताओं के परिवार वालों और क़रीबियों को कई सीटें दे दी गईं. भाई-भतीजावाद के मामले में भाजपा कांग्रेस से पीछे नहीं है, इसके बावजूद वह इस मसले को कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल करने में सफल रही है.

हालांकि कांग्रेस ने इस दिशा में थोड़ी-बहुत कोशिश की. 2008 में जब राहुल गांधी कांग्रेस महासचिव थे तो उनकी पहल पर कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआइ और युवा कांग्रेस में विभिन्न पदों के लिए भीतरी चुनावों की शुरुआत की गई ताकि पार्टी के भीतर अपना लोकतंत्र विकसित किया जा सके और संगठन मजबूत हो सके. पर मजबूत निगरानी और राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना यह पहल उस तरह क्रांतिकारी साबित नहीं हुई जितनी इससे उम्मीद की जा रही थी.

मध्यम वर्ग और युवाओं के लिए किसी संदेश का अभाव

2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के पास एक अच्छा घोषणा पत्र था. लेकिन चुनावी अभियान न्यूनतम आय की योजना ‘न्याय’ पर लड़ा गया. अर्थव्यवस्था की अंतिम पंक्ति में खड़े ग़रीब और मज़दूर के लिए यह योजना महत्वपूर्ण हो सकती थी लेकिन कई मानते हैं कि जब देश की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा पुलवामा, बालाकोट और सबक सिखाने वाले मजबूत नेता की चर्चा कर रहा था तो ऐसे में सिर्फ ग़रीबी के खिलाफ लड़ाई की बात करना व्यावहारिक नहीं था. उस स्थिति में तो बिल्कुल ही नहीं जब भाजपा पिछले पांच साल से सवाल कर रही थी कि पिछले 70 सालों में क्या किया गया.

जानकारों के मुताबिक भाजपा का संदेश साफ था - एक मजबूत हिंदू राष्ट्र का सपना. लेकिन कांग्रेस ऐसा कोई सपना मतदाता के सामने नहीं रख सकी जो उसे वोट दिला सके. चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव कांग्रेस के अस्तित्व पर बहस शुरू करते हुए सवाल करते हैं, ‘मोदी सरकार का आर्थिक प्रदर्शन औसत से ख़राब था. पर क्या कांग्रेस किसानों के संकट पर उन्हें संगठित करते हुए कोई देशव्यापी आंदोलन खड़ा कर पाई? क्या उसने बेरोज़गारी, नोटबंदी की मुसीबत और जीएसटी की वजह से छोटे व्यापारियों को हुए नुक़सान के चलते उनके ग़ुस्से को कोई मज़बूत आवाज़ दी? पिछले पांच सालों में हुई मुसलमानों और दलितों के खिलाफ हुई हिंसा को भी कांग्रेस इस तरह सामने नहीं रख सकी कि ग़ैर-मुसलमान या ग़ैर-दलित इसे गंभीरता से ले पाते.’

इसके अलावा कई विश्लेषकों का मानना है कि मध्यम वर्ग और युवाओं के लिए कांग्रेस के प्रचार अभियान में ऐसी कोई कहानी नहीं थी, जिसे वे सुनना चाहते. कांग्रेस ने युवाओं को नौकरी देने की बात की पर यह शायद इतने प्रभावी तरीक़े से नहीं कही गई कि वह भाजपा के संगठित प्रचार के तूफ़ान का सामना कर पाती. जवाहरलाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक पर लगे भाजपा के आरोपों के बदले कांग्रेस मतदाताओं को आईटी या आईआईटी की कहानियां नहीं सुना सकी.

एक वर्ग का मानना है कि कांग्रेस के साथ एक बड़ी समस्या उसकी पहचान की भी हो गई है. मसलन भाजपा की बात आते ही लोगों के मन में अखंड भारत, हिंदू राष्ट्र, भारत माता और भगवा झंडे की तस्वीर बनती है. पर आज की तारीख़ में ज्यादातर को नहीं पता कि कांग्रेसी होने का क्या मतलब है. इंडिया शाइनिंग, मेड इन इंडिया, मेक इन इंडिया और स्वच्छ भारत जैसे नारों की शक्ल में भाजपा के पास भारत की एक छवि है जिसका स्वरूप उसने अपने समर्थकों के दिमाग में ठीक तरह से बैठा दिया है. लेकिन कांग्रेस के पास ऐसा कोई भारत या ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ नहीं दिखता. शायद इसलिए भी कि देश की यह सबसे पुरानी पार्टी अभी ‘आइडिया ऑफ कांग्रेस’ के संकट से जूझ रही है.

संवाद की कमी

संदेश के साथ-साथ कांग्रेस संवाद की कमी से भी जूझ रही है. जैसा की अपने लेख में प्रताप भानु मेहता लिखते हैं, ‘भारत की नई पीढ़ी ने राष्ट्र निर्माण में कांग्रेस का क्या बलिदान था, ये नहीं देखा है. उत्तर भारत में राजीव गांधी के बाद कांग्रेस का जबर्दस्त क्षरण शुरू हुआ. इनके पास उत्तर भारत में अच्छी हिन्दी बोलने वाला ढंग का एक प्रवक्ता तक नहीं है.’ कई दूसरे जानकार भी मानते हैं कि जनता से ‘कनेक्ट’ कर पाने के मामले में भाजपा से कहीं पीछे है और बीते काफी समय से वह इस कमी को दूर नहीं कर पाई है.