केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने लोकसभा चुनाव 2019 जीत लिया है. एनडीए के साथ पार्टी प्रचंड बहुमत लेकर वह सत्ता में वापसी करने जा रही है. इस जीत के लिए उसने अपनी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का बखूबी इस्तेमाल किया है. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक मोदी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लिए नीति आयोग द्वारा चुने गए देश के 115 जिलों में से भाजपा-एनडीए ने 71 लोकसभा सीटें जीती हैं. अखबार ने बताया कि यह इस पूरे क्षेत्र में आने वाली कुल लोकसभा सीटों का 60 प्रतिशत है.

खबर के मुताबिक ऐसे ज्यादातर जिले बिहार (13) और झारखंड (19) में पड़ते हैं. वहीं, पश्चिम बंगाल में ऐसे पांच जिले हैं. इनमें मुर्शिदाबाद, मालदाह, बीरभूम, नादिया और दक्षिण दिनाजपुर शामिल हैं. भाजपा ने इनमें से तीन जिले बंगाल में सत्तारूढ़ टीएमसी से छीन लिए हैं. इसकी मुख्य वजह है देश के सबसे गरीब और पिछड़े ग्रामीण इलाकों के लिए मोदी सरकार द्वारा चलाई गई योजनाएं. रिपोर्ट की मानें तो सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) के आंकड़ों की मदद से मोदी सरकार को इन इलाकों तक पहुंचने में मदद मिली.

उदाहरण के लिए, एसईसीसी की मदद से भाजपा प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण योजना के लाभार्थियों को साधने में कामयाब रही. उसने पिछले पांच सालों में डेढ़ करोड़ घर बनाने की बात कही. हालांकि इनमें से 70 लाख घरों को इंदिरा आवास योजना के तहत मंजूरी दी गई थी जो यूपीए के समय की योजना थी. इसी तरह ‘स्वच्छ भारत-ग्रामीण’ योजना के तहत अनुसूचित जाति और जनजाति तथा गरीब रेखा से नीचे के परिवारों को सीधे 12,000 रुपये दिए गए. इसके अलावा महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे परिवारों, दिव्यांगों या सीमांत किसानों को भी यह रकम दी गई.

नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में स्वच्छता को अहम मुद्दा बनाया. उन्होंने हरेक राज्य में सरपंच स्तर तक पर अपना यह एजेंडा लागू किया. अधिकारियों के मुताबिक इससे लोगों में बदलाव देखने को मिला. उन्होंने कहा, ‘यूपीए का निर्मल भारत अभियान शौचालय निर्माण पर जोर देता था. (लेकिन) स्वच्छ भारत अभियान से व्यावहारिक बदलाव आया. इसने गांव में सामूहिक जिम्मेदारी की भावना पैदा की जिससे गरीबी रेखा से ऊपर के लोग भी खुद से शौचालय बनाने लगे.’

भाजपा ने इस योजना को काफी ज्यादा प्रचारित किया है. उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने के बाद यहां यह योजना तेजी से लागू की गई. जमीनी स्तर पर शौचालय को ‘इज्जत घर’ का नाम दिया गया. इसका क्या प्रभाव रहा, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिस पश्चिम बंगाल में केंद्र की अधिकतर योजनाएं खारिज हो गईं, वहां भी ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ भारत योजना लगभग सौ प्रतिशत लागू हुई. वहीं, झारखंड में शौचालयों के निर्माण की वजह से महिला मिस्त्रियों को रोजगार मिला.

रिपोर्ट के मुताबिक उज्जवला योजना को लागू करने में भी एसईसीसी की बीपीएल सूची को ध्यान में रखा गया. बाद में इसमें एससी-एसटी परिवारों के साथ आवास योजना तथा अंत्योदय अन्न योजना के लाभार्थियों, वनवासियों, ‘अधिकतम’ पिछड़े वर्गों, चाय बागान में काम करने वाले आदिवासियों और द्वीप या नदियों के पास रहने वाले लोगों को भी शामिल कर लिया गया. ग्रामीण इलाकों में महिलाएं खाना पकाने के लिए लकड़ी, कोयले या उपलों का इस्तेमाल करती आई हैं. उज्जवला योजना के तहत सरकार ने इन महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिया.

इसका खासा असर हुआ, क्योंकि ये गरीब परिवार गैस कनेक्शन कराने के लिए लगने वाला पैसा भी नहीं दे सकते थे. लेकिन मोदी सरकार ने उनके लिए यह काम मुफ्त में कर दिया. उसने मई, 2016 में उत्तर प्रदेश के बलिया से इस योजना को लागू किया और 11 महीने के अंदर दो करोड़ एलपीजी कनेक्शन दे दिए. इस साल मार्च तक उसने देश के 725 जिलों में से 714 में 7.19 करोड़ कनेक्शन दिए. पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के सूत्रों की मानें तो उज्जवला के तहत सरकार ने लाभार्थियों को सब्सिडी के रूप में 4,500 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए हैं. हालांकि कई रिपोर्टें बताती हैं कि कई परिवारों को गैस महंगे दाम पर ही मिल रहे हैं.

बहरहाल, देश के सभी घरों में बिजली पहुंचाने के लिए भी मोदी सरकार ने एसईससी डेटा का इस्तेमाल किया. इसी की मदद से सरकार ने उन घरों की पहचान की जिनके यहां बिजली नहीं थी. उसने इन्हें मुफ्त बिजली कनेक्शन दिए. विद्युत मंत्रालय के डेटा के मुताबिक सितंबर, 2017 से अब तक सरकार देश के 2.63 घरों को बिजली दे चुकी है. रिपोर्ट की मानें तो इन्हीं योजनाओं के बलबूते भाजपा 2014 में मजबूत हुई और इनकी लोकप्रियता से इस चुनाव में उसे अधिकतर सीटें जीतने में मदद मिली.