लेखक-निर्देशक : राजकुमार गुप्ता

कलाकार : अर्जुन कपूर, राजेश शर्मा, बजरंगबली सिंह, सुदेव नायर

रेटिंग : 1.5/5

आज ही खबर आई है कि जम्मू-कश्मीर में हुई एक मुठभेड़ में मोस्ट वांटेड आतंकी जाकिर मूसा मारा गया है. इस खबर के सात यह अजब संयोग है कि आज ही फिल्म ‘इंडिया’ज मोस्ट वांटेड’ भी रिलीज हुई जो ऐसे ही एक मोस्ट वांटेड आतंकवादी को पकड़ने के लिए किए गए क्रॉस-बॉर्डर मिशन पर आधारित है. यह फिल्म 2008 से 2013 के बीच हिंदुस्तान के अलग-अलग कोनों में हुए बम धमाकों का जिक्र करती है और इसके मास्टरमाइंड आतंकी युसुफ को पकड़ने के लिए चलाए गए ऑपरेशन का किस्सा बताती है. बताया जाता है कि यह ऑपरेशन इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) और बिहार पुलिस ने मिलकर चलाया था.

‘इंडिया’ज मोस्ट वांटेड’ आईबी के एक सरफिरे इन्वेस्टिगेटेशन ऑफिसर, प्रभात को अपना नायक बनाती है. प्रभात पर देश बचाने का जुनून इस हद तक सवार है कि ऊपर से अप्रूवल न मिलने के बावजूद, एक छोटी-सी इन्फॉर्मेशन पर वह सरहद पार कर नेपाल पहुंच जाता है. यह और बात है कि यह भूमिका निभाते हुए अर्जुन कपूर ज्यादातर वक्त रुको-चलो और फॉलो जैसे निर्देश ही देते दिखाई देते हैं. इस दौरान सबसे ज्यादा अखरने वाली बात यह है कि इंटेलिजेंस ब्यूरो का यह अधिकारी केवल अपनी इंटेलिजेंस और इंस्टिंक्ट पर भरोसा करता है, मानो लॉजिक जैसी चीजों का इस्तेमाल करना उसके स्टैंडर्ड से मैच न करता हो!

इस सबके बाद आतंकवादी को खोजने-पकड़ने वाला सीक्वेंस इतना नाटकीय और सतही है कि लगता है जैसे आतंकी नहीं, मोहल्ले के किसी गमला चोर को पकड़ने की कवायद हो रही है. कहने का मतलब यह कि परदे पर जो दिखता है उसे सच तो दूर, बतौर फिक्शन स्वीकार करने में भी आपको मेहनत करनी पड़ती है.

फिल्म का लेखन और निर्देशन ‘आमिर’ और ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी फिल्में बनाने वाले राजकुमार गुप्ता ने किया है. उनकी पिछली फिल्म ‘रेड’ की तरह यह फिल्म भी अनसंग हीरोज को समर्पित है. इस कहानी में अफसरशाही का टच इसे एक बढ़िया आइडिया बना देता है. हालांक इसके साथ ही भारत-नेपाल और नेपाल-पाकिस्तान के आपसी समीकरण इसमें थोड़ा और रोमांच पैदा कर सकते थे. लेकिन पटकथा में इनमें से किसी का भी भरपूर इस्तेमाल नहीं किया गया. किसी तरह अंजाम तक पहुंचाने की हड़बड़ी में यह उन बारीकियों को अपनाने से चूक जाती है जो इसमें वास्तविकता के करीब होने वाला वजन पैदा कर सकती थीं. कहने का मतलब इतना ही है कि अगर गुप्ता जी ने अपनी इस पटकथा को थोड़ा और पकाया होता तो यह दर्शकों को न पका पाती.

अभिनय की बात करें तो अर्जुन कपूर इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बनकर भी अपने ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ वाले बिहारी आशिक के किरदार में फंसे दिखते हैं. एक खास तरह के लहजे में बोलते हुए भी उतने ही बनावटी लगते हैं कि उनके अभिनय को सीधे-सीधे बुरा कहा जा सके. इस फिल्म में वे ज्यादातर वक्त एक स्टैंडर्ड एक्सप्रेशंस रखते हैं और उससे जरा भी इधर-उधर नहीं होते यानी भरपूर बोर करते हैं. मजे-मजे में कहें तो अर्जुन कपूर इस फिल्म की खूबी भी हैं और खामी भी. अगर उन्हें फिल्म में न लिया जाता तो शायद ही कोई यह फिल्म देखने जाता, और उन्हें लिया गया है इसलिए फिल्म में देखने लायक कुछ भी नहीं मिलता.

‘इंडिया’ज मोस्ट वांटेड’ की बड़ी खामियों में पहली तो ये है कि प्रभात सहित किसी भी किरदार को ढंग से डेवलप नहीं किया जाता. इसका असर यह होता है कि जान दांव पर लगाने जा रहे इन नायकों से दर्शक किसी तरह का जुड़ाव महसूस नहीं कर पाता. कुछ किरदार तो ऐसे भी है जिनका इंट्रोडक्शन करवाना भी जरूरी नहीं समझा गया है. दूसरी खामी यह है कि कई बार संवाद दृश्यों का साथ नहीं देते. ऐसे में जब इनसे ड्रामा रचने की कोशिश की जाती है तो आपको चिढ़न होने लगती है. तीसरी खामी यह है कि जितेंद्र शास्त्री और राजेश शर्मा के अलावा कोई भी फिल्म में अभिनय करना जरूरी नहीं समझता. कुल मिलाकर, 127 मिनट लंबी ‘इंडिया’ज मोस्ट वांटेड’ असाधारण नायकों का किस्सा कहने वाली एक अति-साधारण फिल्म साबित होती है.