इस आम चुनाव के दौरान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दावा किया था कि उनकी पार्टी अकेले के दम पर 300 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज करेगी. ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों को उनका यह दावा एक बढ़े-चढ़े चुनावी बयान से ज्यादा नहीं लगा था लेकिन 23 मई को आए नतीजों ने इन जानकारों को काफी चौंकाया है. अब भाजपा 303 लोकसभा सांसदों के साथ एक बार फिर अपनी अगुवाई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार यानी मोदी सरकार बनाने जा रही है.

नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए की न सिर्फ बढ़ी हुई सीटों, बल्कि वोट शेयर के साथ भी वापसी होना एक ऐसी घटना है जिसे समझने-समझाने की तमाम चुनाव विश्लेषक अलग-अलग कोणों से कोशिश कर रहे हैं. सत्याग्रह ने इसे समझने के लिए कुछ आम मतदाताओं से बातचीत की और यह जानने की कोशिश की कि उनके मुताबिक़ किन वजहों से जनता ने पिछली सरकार को एक बार फिर चुना है.

लोगों को मोदी जी पसंद हैं : रोहित भट, जम्मू (जम्मू और कश्मीर)

कैमिकल इंडस्ट्री में सेफ़्टी ऑफ़िसर के तौर पर काम करने वाले रोहित का मानना है कि लोगों को नरेंद्र मोदी से निजी लगाव है, ख़ासकर महिलाओं को. वे कहते हैं, ‘अटल जी के अलावा लोग अगर किसी नेता के काम और उसकी बातों से ख़ुश हुए हैं तो वो मोदी जी हैं. उन्होंने मजबूत निर्णय लिए जबकि कांग्रेस पुलवामा में 40 सैनिकों के मरने के बाद भी कश्मीर से आफ्स्पा कानून (विशेष सशस्त्र बल अधिनियम) हटाने की बात कर रही थी. महिलाओं को भी लगता है कि मोदी आदर्शवादी पुरुष हैं, और फिर उन्होंने उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर देकर और टॉयलेट बनवाकर उनके लिए चीज़ें आसान की हैं.’

हिंदुत्व को बचाए रखने के लिए मोदी को वोट दिया : डॉ देवेंद्र शर्मा, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)

होम्योपैथिक चिकित्सक डॉक्टर शर्मा कहते हैं कि मोदी हिंदुत्व के रक्षक हैं और पिछली तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकारें भारतीय संस्कृति को खत्म कर रही थीं. डॉ शर्मा के मुताबिक, ‘बीजेपी कांग्रेस की तरह तुष्टिकरण की राजनीति नहीं करती. आखिर राहुल गांधी को मुस्लिम बहुल वायनाड से लड़ने की क्या ज़रूरत थी. मोदी के राज में देशविरोधी मुसलमानों के भीतर डर रहेगा और वे देश को नुक़सान नहीं पहुंचा पाएंगे. इसके अलावा मोदी और उनके साथी भ्रष्टाचारी नहीं हैं. ये लोग सबका साथ, सबका विकास चाहते हैं ताकि कोई भिखारी न रहे और कल आरक्षण हटाया जा सके. इनकी विदेशी नीति मजबूत है. शिक्षा पर भी ध्यान दे रहे हैं. सेकुलर सरकारें अशोक महान और चंद्रगुप्त महान को छोड़कर अकबर महान पढ़ा रही थीं, मोदी सरकार में ऐसा नहीं होगा.’

मोदी के अलावा कोई और विकल्प नहीं था : रंजना कुमार, उडुपी (कर्नाटक)

एमबीबीएस की विद्यार्थी रंजना मानती हैं कि ज़्यादातर लोगों को लगा कि मोदी के अलावा कोई और ऐसा नेता नहीं था जिसे वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहते. रंजना कहती है, ‘ऐसा लगा जैसे इस चुनाव में सांसदों को नहीं, प्रधानमंत्री को चुना जाना था. और टीवी पर, अख़बारों में, फ़ेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप पर, हर जगह सबसे ज़्यादा जिस शख़्स की बात हो रही थी, वो नरेंद्र मोदी था. दिन में कोई न कोई ऐसा मैसेज ज़रूर आता था जो कांग्रेस की बुराई और मोदी या बीजेपी की तारीफ़ में न लिखा गया हो. मुझे और मेरे दोस्तों को भी लगा कि भारत के पास कोई और नेता है ही नहीं. सब मानने लगे कि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने का कोई चांस ही नहीं तो फिर कांग्रेस या किसी और को वोट देने का क्या फ़ायदा.’

विपक्ष के पास न तो सीधी कहानी थी, न साफ रणनीति : राज शेखर, मुंबई (महाराष्ट्र)

गीतकार राज शेखर भाजपा को दोबारा मिले बड़े बहुमत के लिए विपक्ष की कमज़ोरी को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. राज शेखर दलील देते हैं, ‘विपक्ष के पास ‘मोदी नहीं तो कौन’ का जवाब नहीं था. उनका प्रचार ज़मीन तक नहीं पहुंचा. राहुल गांधी ने रफाल और चौकीदार चोर है, में काफी वक्त बरबाद किया. और वे जिस इनक्लूसिव इंडिया (समावेशी भारत) की बात कर रहे थे, वो बात एक तो बड़ी देर से शुरू हुई और फिर ठीक से लोगों तक नहीं पहुंची. दूसरी पार्टियों के साथ गठबंधन के मामले में भी कांग्रेस काफी अड़ियल रही. बीजेपी ने जहां दो सांसदों वाली जेडीयू को भी 17 सीटें दे दीं वहीं कांग्रेस यूपी, हरियाणा, दिल्ली और पंजाब जैसे सूबों में बाकी पार्टियों को साथ नहीं ला पाई. तेजस्वी यादव जैसे क्षेत्रीय नेता भी मार्क्स और ग्राम्शी की बातों में उलझे रहे, संविधान बचाने की बातें करते रहे, जबकि उनके वोटर को नहीं पता था कि वो क्या बचाना चाह रहे हैं.’

राष्ट्रवाद, आतंकवाद, पाकिस्तान को लेकर मोदी ने लोगों को देश पर गर्व करने का मौक़ा दिया : अमित, दिल्ली

दिल्ली के पत्रकार अमित का कहना है कि मोदी के कैंपेन से ही समझा जा सकता है कि आखिर लोगों ने उन्हें दोबारा वोट क्यों दिया. अमित के मुताबिक, ‘मोदी अपने भाषणों के पहले हिस्से में आतंकवाद, पाकिस्तान और देश की सुरक्षा की बात करते और दूसरे हिस्से में अपनी जनहित योजनाओं की. तथाकथित उदारवादी हर उस चीज़ का मज़ाक़ बनाते रहे जो आम लोगों को भारतीय संस्कृति के गौरव से जोड़ती थी. इस बात ने लोगों को उनसे दूर किया और मोदी ने इस बात का पूरा फ़ायदा उठाते हुए लोगों के दिमाग में राष्ट्रवाद के बीज बोए. डोकलाम और बालाकोट पर उन्हें गर्व करने का मौक़ा दिया. इसके अलावा मोदी की कठोर निर्णय ले सकने वाली छवि ने भी उन्हें फ़ायदा पहुंचाया.’

जो ज़मीन पर लोगों से जुड़ा, उसे वोट मिले : ओंकार, पंजिम (गोवा)

पेशे से कंसल्टेंट ओंकार की राय है कि लोगों ने इस बार परिवारों और घरानों की राजनीति के खिलाफ वोट किया. ओंकार अपनी बात साफ करते हुए कहते हैं, ‘राहुल का अमेठी से हारना, सिंधिया या डिंपल यादव जैसों का हारना यही बताता है. कांग्रेस ने नए चेहरों को मौक़े देने के बजाय इस चुनाव को भी गांधी परिवार के इर्द-गिर्द रखा और ज़मीन पर लोगों से जुड़ने की ईमानदार कोशिश नहीं की. जबकि बीजेपी के कैडर की मेहनत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. फ़ेसबुक और ट्विटर पर रहने वाले बुद्धिजीवियों ने बीजेपी को कम कर के आंका. जगन मोहन रेड्डी की जीत भी साबित करती है कि लगातार ज़मीन पर काम करते रहने से ही आप जनता का दिल जीत सकते हैं.’

1000 साल की ग़ुलामी के बाद लोगों ने अपने जैसे शख़्स को चुना : अंकुर शर्मा, कठुआ (जम्मू-कश्मीर)

जम्मू में कथित जनसांख्यिक बदलाव के खिलाफ सूबे की सरकार को कानूनी चुनौती देने वाले वकील अंकुर कहते हैं कि 2014 से देश में हिंदुत्व के पुनरुत्थान की लहर थी और मोदी उस लहर पर सवार. अंकुर का मानना है, ‘1000 साल की ग़ुलामी के बाद लोग अपने जैसे आम व्यक्ति को सत्ता की ऊंचाई पर देखकर ख़ुश हैं. इस चुनाव में विचारधाराओं की लड़ाई थी. कांग्रेस ने हिंदुओं को जातियों में बांटे रखकर, उन्हें ग़ुलामों की तरह देखा. यह विचारधारा उसे न तो राष्ट्र की बात करने दे रही थी और न ही हिंदू की. जबकि मोदी में लोगों ने हिंदू नेता को देखा. उन्होंने हिंदू प्रधानमंत्री चुना. उन्हें लगा कि यह प्रधानमंत्री उनकी ग़ुलामी को खत्म कर देगा.’