निर्देशक : ओमंग कुमार

लेखक : संदीप सिंह, अनिरुद्ध चावला, विवेक ओबेरॉय

कलाकार : विवेक ओबेरॉय, मनोज जोशी, जरीना वहाब, प्रशांत नारायण, बोमन ईरानी, अंजन श्रीवास्तव

रेटिंग : 1/5

देश में किसी की हवा हो या सुनामी, उस शख्स पर बनी फिल्म को तो सिनेमा की कसौटी पर ही खरा उतरना होगा. और इसमें कोई शक नहीं कि दूसरी बार प्रचंड बहुमत से लोकसभा चुनाव जीते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ एक अझेल फिल्म है. क्योंकि यह सिनेमा है ही नहीं. बल्कि एक नीरस स्तुतिगान, ओवर द टॉप प्रोपेगेंडा है जिसमें मोदी जी को सुपरहीरो की तरह प्रस्तुत किया गया है.

‘पीएम नरेंद्र मोदी’ में मोदी के खिलाफ षड़यंत्रों की कमी नहीं है, विपक्ष हमेशा खलनायक है और वे ही इस सृष्टि को बचाने की एकमात्र उम्मीद हैं. ऐसी फिल्म आखिरी बार उचित रूप से गांधी जी को नसीब हुई थी (गांधी, 1982) और शायद आगे जब कभी किसी ईश्वर पर बायोपिक बनेगी तो उसकी प्रेरणा इस फिल्म में हुए स्तुतिगान के स्तर से ली जाएगी.

एक वाक्य में कहें तो निर्देशक ओमंग कुमार और लेखक-एक्टर विवेक ओबेरॉय, करोड़ों नागरिकों के वोट दो-दो बार हासिल करने वाले कद्दावर नेता नरेंद्र मोदी पर एक काबिल फिल्म बनाने में पूरी तरह असफल सिद्ध हुए हैं.

इसमें भी कोई शक नहीं कि इस फिल्म को बनाने का मकसद चुनावों के दौरान मोदी जी के प्रचार-प्रसार में मदद करना था. वोटरों को उनके पक्ष में करने की यह एक बड़ी मार्केटिंग स्ट्रेटजी थी जो वक्त रहते रिलीज नहीं हो पाई. नहीं तो क्या वजह रही होगी कि मोदी जी के बचपन से शुरू हुई फिल्म हर वह महत्वपूर्ण घटनाक्रम दिखाती है जो उन्हें हीरोइक आभामंडल दे सके, लेकिन 2014 में प्रधानमंत्री बनते ही खत्म हो जाती है. अगर कायदे से किसी को 2018-19 में मोदी जी की बायोपिक ही बनानी होती तो वह उनके प्रधानमंत्री के तौर पर पूरे किए पांच वर्षीय कार्यकाल को भी खुद में समेटता और उस दौरान उनके लिए (ऐतिहासिक?) फैसलों को भी महिमामंडित करता.

लेकिन ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ ने ऐसा नहीं किया क्योंकि एक तो यह जल्दबाजी में बनी फिल्म है और इसे देखते वक्त यह एहसास लगातार बना भी रहता है. दूसरे, 2014 के बाद के घटनाक्रम शामिल करने पर नोटबंदी, जीएसटी से लेकर बेरोजगारी, मॉब लिंचिंग और रफाल तक का मसला उठाना पड़ता और वह इस प्रोपेगेंडा फिल्म के मकसद के विपरीत चला जाता. जबकि फिल्म का मकसद तो ‘मोदी कल्ट’ को थोड़ी और मजबूती से स्थापित करना था, और ऐसा तभी असरदार तरीके से किया जा सकता था जब उनसे जुड़ी बेहद पुरानी घटनाओं और उनके द्वारा खुद के आसपास बुनी किंवदंतियों को सच-झूठ के पार ले जाकर ऐसे महिमामंडित किया जाए कि वे वोट करने वाली जनता का ब्रेनवॉश करने के काम आ सकें.

ऐसे उदाहरणों की लिस्ट फिल्म में बहुत लंबी है. एक घटनाक्रम ऐसे परोसा गया है कि जैसे इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी मोदी जी के द्वारा उनकी कांग्रेस सरकार का गुजरात में विरोध करने की वजह से लगाई थी! फिर इमरजेंसी को हटाने के लिए भी वे इसलिए मजबूर हुई थीं क्योंकि नरेंद्र मोदी ने ही उनका अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने भगत सिंह स्टाइल में विरोध किया था!

साथ ही मोदी जी को 1992 में आंतकवादियों की गोलियों की परवाह किए बिना कश्मीर के लाल चौक में अकेले तिरंगा फहराते हुए दिखाया गया है, जबकि असलियत में उस वक्त के भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने यह काम किया था और वह भी मुस्तैद आर्मी की मौजूदगी में.

गोधरा कांड के दौरान दंगों को नहीं रोक पाने की नाकामी का ठीकरा भी पड़ोसी प्रदेशों द्वारा समय पर पुलिस फोर्स न भेजने और ‘बिकाऊ’ मीडिया द्वारा उनका दुष्प्रचार करने के सर फोड़ा गया है. इन दंगों और उन्हें कंट्रोल करने में हुई लेटलतीफी का जो स्पष्टीकरण मोदी जी रियल लाइफ में मीडिया के सामने आकर कभी नहीं दे सके, उसे फिल्म में स्टाइलिश ‘लाइव इंटरव्यू’ के रूप में दिखाकर उन्हें क्लीनचिट दी गई है. गोधरा कांड के दौरान हिंदू-मुस्लिम सौहार्द का मसीहा भी उन्हें बताया गया है.

मकसद एकदम साफ है. दुनियाभर में मोदी जी की जितनी भी आलोचनाएं हुई हैं, उनको लेकर फिल्म ने बार-बार रेखांकित किया है कि इनके पीछे या तो कांग्रेस थी/है, या कांग्रेस समर्थित बिजनेसमैन, या फिर बिकी हुई मीडिया. मोदी जी की कोई गलती नहीं थी और उन्होंने तो हर बार पापियों का नाश करते हुए धर्म और राष्ट्रवाद की पताका ही लहराई है.

सच की परवाह किए बिना महिमामंडित करने की इस लगन के चलते फिल्म खासी नीरस हो जाती है. आपने जिसे महानायक माना है, उस पर फिल्म बनाते वक्त कम से कम ऐसी चुनौतियां उसे देनी होती हैं जिसे पार करने में उसे पसीना आ जाए. क्योंकि तभी उसका नायकत्व उभरकर सामने आता है. लेकिन ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ में हर मुश्किल को सुलझाना मोदी जी के बाएं हाथ का खेल हो जाता है और एक दिलचस्प फिल्म होने की जगह वह उबाऊ स्तुतिगान बनकर रह जाती है. भविष्य में अगर कभी कोई तटस्थ होकर मोदी पर यथार्थवादी फिल्म बना पाया, तो शायद अपने इस दिलचस्प सब्जेक्ट और उसकी वाजिब उपलब्धियों के साथ न्याय कर पाएगा.

यह भी काफी हास्यास्पद है कि जो नेरेटिव और नारे नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन का पिछले पांच साल से ही हिस्सा हैं, उनको स्तुतिगान करने के चक्कर में मोदी जी के बचपन और जवानी तक से जुड़ा हुआ दिखाया गया है! इसीलिए बाल नरेंद्र ‘चाय पर चर्चा’ की बात करने से लेकर ‘भारत माता की जय’ तक के नारे लगाते हैं. जवान होने पर गुजरात में रहने के दौरान वे ‘बेटी बचाओ’ जैसी बात करते हैं और गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए ही खुद को ‘चौकीदार’ का दर्जा दे देते हैं. चूंकि फिल्म 2014 के बाद की बात नहीं कर सकती थी, इसलिए उसने 2014 के बाद के नारों व नेरेटिव को मोदी जी के बचपन और जवानी का ही हिस्सा बना दिया!

एक यह भी बात समझने वाली है कि मोदी के भारत से प्यार करने को फिल्म अपनी सतत थीम बनाकर चलती है और बचपन से ही हमें ऐसे देशभक्त मोदी से मिलवाया जाता है जो कि गुजरात का सीएम बनकर भी भारत की बात ज्यादा करते हैं. लेकिन हम सभी जानते हैं कि यह नेरेटिव मोदी जी की पॉलिटिक्स में 2013-14 के आसपास आया था जब वे गुजरात से बाहर निकलकर देशव्यापी नेता बनने की कोशिश कर रहे थे. उससे पहले तो गुजरात ही उनके लिए भारत था.

विवेक ओबेरॉय फिल्म में नरेंद्र मोदी नहीं बन पाते. बल्कि प्रोस्थेटिक, सफेद दाढ़ी-मूंछ और मोदी समान कुर्ता पहनने के बावजूद विवेक ओबेरॉय ही रहते हैं. ऐसा कोई नियम वैसे नहीं है कि बायोपिक में अभिनेता को अपने रियल लाइफ सब्जेक्ट की हूबहू नकल करनी ही होगी. डैनी बॉयल की ‘स्टीव जॉब्स’ (2015) जैसे उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं. लेकिन जो फिल्म घोर व्यक्तिवादी है और मोदी के कल्ट पर ही आधारित है, उसमें ऐसा नहीं कर पाना अभिनेता की असफलता ही मानी जाएगी.

विवेक ओबेरॉय न तो मोदी की मुख्तलिफ आवाज की नकल कर पाए हैं, न उनके हिंदी शब्दों को बोलने के खास तरीके को पकड़ पाए हैं, न उनकी बॉडी लैंग्वेज को पूरा आत्मसात कर पाए हैं, और न ही वह आभामंडल परदे पर रच पाए हैं जो मोदी जी के इर्द-गिर्द असल जिंदगी में नजर आता है. अगर वे परेश रावल को अपना एक्टिंग कोच रखते, तो शायद बेहतर मोदी बन पाते!

लेकिन, ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ नाम की इस फिल्म के प्रभाव को नकारना मूर्खता होगी. आज के वक्त में नरेंद्र मोदी वह राजनेता बन चुके हैं जो आलोचनाओं से परे जा चुके हैं. इसमें उन्हें चाहने वालों की अहम भूमिका है और यही लोग - जिनमें भारी संख्या में आज का राजनीतिक रूप से अपरिपक्व युवा शामिल है - इस फिल्म में कही गई ज्यादातर काल्पनिक और इनएक्यूरेट बातों को वैसे ही ऐतिहासिक रूप से सही मानेंगे जैसे व्हाट्सएप फॉर्वर्ड्स और फेक न्यूज को मानते आए हैं. यही इस फिल्म की सबसे खतरनाक बात है.