लोकसभा चुनाव- 2019 के नतीजों को देखें तो बिहार की जनता ने राजनीतिक पंडितों के अलावा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और महागठबंधन के नेताओं को भी चौंकाया है. एनडीए राज्य की 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रहा. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) ने अपने-अपने हिस्से की सभी सीटों पर जीत दर्ज की. वहीं, जनता दल-यूनाइटेड (जदयू) केवल कांग्रेस के गढ़ और मुस्लिम बहुल सीट किशनगंज में सेंधमारी नहीं कर सका. यानी महागठबंधन के खाते में भी किशनगंज के रूप में बस एक ही सीट आई.

चुनाव से पहले बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेतृत्व में पांच दलों ने मिलकर महागठबंधन बनाया था. इनमें राजद के अलावा उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा, जीतनराम मांझी की हम, मुकेश सहनी की वीआईपी और शरद यादव का लोकतांत्रिक जनता दल शामिल था. लेकिन नतीजे आए तो पता चला कि उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश सहनी और जीतनराम मांझी अपनी-अपनी सीट भी नहीं जीत पाए. उपेंद्र कुशवाहा तो दो सीटों-काराकाट और उजियारपुर- से चुनावी मैदान में उतरे थे. वहीं, मुकेश सहनी और राजद के चुनाव चिन्ह पर लड़े शरद यादव को भी हार का मुंह देखना पड़ा.

बिहार में कहा जा रहा था कि भाजपा, जदयू और लोजपा के गठबंधन के अलावा महागठबंधन को भी ठीक-ठाक सीटें मिल सकती हैं. इसके पीछे की वजह इसका बड़ा कुनबा और इनके पीछे के जातिगत समीकरणों को बताया गया. बिहार में यादव और मुसलमान को राजद का कोर वोट बैंक माना जाता रहा है. कहा गया कि राजद और कांग्रेस के साथ आने पर इसमें कुछ सवर्ण वोटी भी जुड़ेंगे ही. वहीं, उपेंद्र कुशवाहा को कुर्मी-कोइरी समाज और जीतनराम मांझी को दलित नेता के तौर पर देखा जाता है. इसके अलावा निषाद समुदाय के नेता मुकेश सहनी के साथ आने की वजह से महागठबंधन और मजबूत दिख रहा था. लेकिन चुनावी नतीजे उलट हैं.

बिहार : लोकसभा चुनाव 2019 में राजनीतिक दलों का प्रदर्शन | साभार : चुनाव आयोग
बिहार : लोकसभा चुनाव 2019 में राजनीतिक दलों का प्रदर्शन | साभार : चुनाव आयोग

ऐसे में सवाल उठता है कि चुनाव के दौरान एक वक्त मुकाबले में दिख रहे महागठबंधन को इतनी बड़ी हार का सामना क्यों करना पड़ा. इसका जवाब महागठबंधन के बीच सीट बंटवारे से ही शुरू होता दिखता है.

कांग्रेस को अनसुना करना और रालोसपा-‘हम’-वीआईपी को अधिक तव्वजो देना

महागठबंधन के भीतर रालोसपा, ‘हम’ और वीआईपी को कुल मिलाकर 40 में से 11 सीटें दी गई थीं. इन दलों के हिस्से क्रमश: पांच और तीन-तीन सीटें आईं. वहीं, यदि जमीन पर इन दलों की स्थिति देखें तो इनके पास इन सभी 11 सीटों पर एनडीए को टक्कर देने लायक उम्मीदवार की कमी साफ-साफ नजर आई. उपेंद्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी और मुकेश सहनी अपनी-अपनी पार्टी के इकलौते बड़े चेहरे थे. उपेंद्र कुशवाहा के हिस्से में जो पांच सीटें आईं, उनमें से वे खुद दो पर लड़े. इसके अलावा पूर्वी चंपारण में भाजपा के राधामोहन सिंह के खिलाफ कांग्रेस के राज्यसभा सांसद अखिलेश कुमार सिंह के पुत्र आकाश कुमार सिंह को उतार दिया गया. यह सीट रालोसपा के हिस्से में थी. आकाश को राधा मोहन सिंह के हाथों करीब तीन लाख वोटों से हार का सामना करना पड़ा.

उधर, औरंगाबाद सीट को भी ‘हम’ के खाते में डाल दिया गया जबकि इस सीट पर कांग्रेस ने अपनी दावेदारी पेश की थी और उसके नेता निखिल कुमार ने साल 2004 में इस सीट पर जीत भी दर्ज की थी. उन्हें इस बार भी प्रबल उम्मीदवार माना जा रहा था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वहीं, मधुबनी सीट भी वीआईपी को दे दी गई जबकि इस सीट पर कांग्रेस के डॉ. शकील अहमद की दावेदारी थी. वे यहां से 12वीं और 14वीं लोकसभा में सांसद रह चुके हैं. टिकट न मिलने पर उन्होंने बतौर निर्दलीय उम्मीदवार अपना पर्चा भरा और 1.31 लाख वोट हासिल किए. वीआईपी उम्मीदवार बद्री कुमार पूर्वे को भी करीब इसके बराबर ही (1.40 लाख) मत मिले. यानी शकील अहमद की बगावत की वजह से महागठबंधन को भारी नुकसान उठाना पड़ा. मधबुनी में भाजपा उम्मीदवार अशोक कुमार यादव ने एकतरफा जीत दर्ज की.

महागठबंधन में सीटों का बंटवारा भी काफी देरी से किया गया. शुरुआती चरण के मतदान के लिए तो नामांकन की आखिरी तारीख के कुछ दिन पहले ही यह बताया गया कि कौन सी पार्टी किस सीट से लड़ रही है और उसके उम्मीदवार कौन-कौन हैं. जानकारों के मुताबिक नतीजों पर इस लेटलतीफी का असर भी हुआ.

घटक दलों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों का एक-दूसरे से न जुड़ना

महागठबंधन के बीच सीट बंटवारे के दौरान जो मतभेद पैदा हुए थे, उनका असर बाद में भी दिखा. उदाहरण के लिए मधेपुरा सीट को लिया जा सकता है. यहां पर शरद यादव मैदान में थे. उधर, अपने पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष के खिलाफ जदयू ने दिनेश चंद्र यादव को उतारा. इनके अलावा पप्पू यादव भी अपनी जन अधिकार पार्टी (जाप) इस त्रिकोणीय दंगल में शामिल थे. इससे पहले पप्पू यादव ने साल 2014 के चुनाव में राजद के टिकट पर जीत हासिल की थी. इस लिहाज से उनकी दावेदारी भी मजबूत थी. बताया जाता है कि पप्पू यादव महागठबंधन से टिकट चाहते थे. लेकिन, राजद नेता तेजस्वी यादव इसके लिए तैयार नहीं हुए. पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन सुपौल से कांग्रेस उम्मीदवार थीं. लेकिन उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र में राजद के लोगों का पूरा समर्थन हासिल नहीं हो पाया. पप्पू यादव के साथ ही उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा.

एनडीए के पक्ष में जातिगत समीकरणों का टूटना, महिला मतदाताओं की अहम भूमिका

सूबे में एनडीए की प्रचंड और ऐतिहासिक जीत के पीछे जातिगत समीकरणों का टूटना भी रहा है. देश में बिहार की छवि एक ऐसे राज्य के रूप में प्रचलित है जहां जातिगत आधार पर ही चुनावी परिणाम तय होते हैं. लेकिन, इस बार के नतीजों को देखें तो यह धारणा टूटती दिखती है. सूबे में एनडीए को 53 फीसदी वोट हासिल हुए हैं. यह आंकड़ा 2014 की तुलना में करीब 10 फीसदी अधिक है. वहीं, राजद का वोट घटकर 15 फीसदी रह गया. पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी के लिए यह आंकड़ा 20 फीसदी था. यानी इसके वोट बैंक में एनडीए ने बड़ी सेंधमारी की. माना जा रहा है कि इनमें से अधिकांश यादव युवा हैं, जिन्होंने इस बार एनडीए में अपना विश्वास जाहिर किया है. वहीं, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान के एक साथ होने की वजह से दलित और पिछड़े तबके के वोट भी एनडीए की झोली में ही गिरे हैं.

जाति से इतर जेंडर की बात करें तो महिलाओं के समर्थन ने भी भाजपा, जदयू और लोजपा की जीत में बड़ी भूमिका निभाई है. राज्य की कटिहार, सुपौल, किशनगंज, अररिया, पूर्णिया, बेगूसराय, समस्तीपुर, वैशाली और उजियारपुर सीट पर 65 फीसदी से अधिक महिलाओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया. बताया जाता है कि महिला सशक्तिकरण के लिए उठाए गए कई कदमों की वजह से इस आधी आबादी के मतदाताओं में नीतीश कुमार की काफी लोकप्रियता है. वहीं, केंद्र की उज्ज्वला योजना और शौचालय निर्माण की वजह से भाजपा की पकड़ भी इन पर मजबूत हुई है.

नरेंद्र मोदी का चेहरा और चुनावी मुद्दों का एनडीए के पक्ष में होना

लोकसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद एक बड़ा मुद्दा थे. अन्य राज्यों की तरह बिहार में भी करीब-करीब सभी उम्मीदवारों ने नरेंद्र मोदी के नाम पर ही मतदाताओं से वोट की मांग की. साथ ही, उन्होंने नीतीश सरकार और मोदी सरकार के कामकाज को भी जनता के सामने एक साथ रखने की कोशिश की. इसके अलावा एक ओर जहां नीतीश कुमार विकास की पिच पर खेलते हुए दिखाई दिए तो वहीं, भाजपा की ओर से राष्ट्रवाद के साथ-साथ हिंदुत्व के मुद्दे को भी उठाया गया. दूसरी ओर, विपक्ष की ओर से कुछ बुनियादी मुद्दों के साथ प्रमुखता से आरक्षण और संविधान बचाने पर ही जोर दिया गया जो वोटरों का उतना ध्यान नहीं खींच सका.

जहां तक स्टार चेहरे की बात है तो एनडीए के पास नरेंद्र मोदी, अमित शाह, सुशील कुमार मोदी, राजनाथ सिंह, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे कई चेहरे थे. उधर, महागठबंधन में सबसे बड़ा चेहरा तेजस्वी यादव ही थे. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी बिहार में अपनी सीमित सक्रियता ही दिखाई. वहीं, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की चुनावी दंगल से गैर-मौजूदगी का असर उनकी पार्टी की सीटों की संख्या पर दिख रहा है. साल 2015 में उनकी मौजूदगी में विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल करने वाला राजद इस चुनाव में अपना खाता भी नहीं खोल पाया.