सुबह अलार्म बजता,प्रेशर कुकर सीटी मारता, स्कूल बस का हॉर्न बजता और आख़िर में स्नेहचिन्ह के आदान-प्रदान के बाद वो (मेरे पति) घर के दरवाजे के उस पार होते और मैं इस पार. उनके जाने के बाद मन करता पैर पसार कर चाय का कप हाथ में लूं और फ़ोन की स्क्रीन पर हाथ चलाने लगूं. रामदेव बाबा की सलाह ऐसा नहीं करने देती तो थोड़ा सांस अंदर-बाहर करनी ही पड़ती. ज़िंदगी एकदम शांत झील की तरह थी, तभी 10 मार्च 2019 को इलेक्शन कमीशन ने कहा कि लोकसभा के इलेक्शन 11 अप्रैल से 19 मई तक सात चरणों में होंगे.

साल में इतने त्यौहार आते हैं, कितनी तैयारी करनी पड़ती है. ये तो लोकतंत्र का महापर्व था, 5 साल में एक बार आता है, तैयारी तो बनती है. ऐसा सोच कर मैंने जोर-शोर से काम शुरू कर दिया. सोशल मीडिया के जितने भी ठिकाने थे मुझे सबका ख्याल आया. कुछ नए ठिकानों पर अपना स्थान आरक्षित करवाया और कुछ पुराने ठिकानों के पासवर्ड ढूंढे. राजनीति के धुरंधर, किंगमेकर, बुद्धिजीवी, पत्रकार सबको ख़ोज कर फॉलो करना शुरू किया क्योंकि मज़ा तो तभी आता न जब अलग-अलग विचारधारा के लोगों को सुना जाता.

फेसबुक पेज के इतिहास में जाकर पुरानी पोस्ट एडिट कीं. क्या पब्लिक रखना है और क्या प्राइवेट, इसके लिए सब सेटिंग्स चेक कीं. (अरे, डर सबको लगता है!) इन सबके बाद, सब जगह जाकर अपनी डीपी भी बदल दी. ये सारे काम पूरे करने के बाद लगा कि अब मैं इलेक्शन के लिए एकदम तैयार हूं.

हिंदुस्तानी होने के नाते राजनीति मेरे खून में है. अब ऐसे में इतना करना तो मेरा हक़ बनता था. और वैसे भी, पिछले इलेक्शन के वक्त बच्चे छोटे थे. मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यमों पर जूझते राजनीति की नब्ज़ जरा पकड़ में आती कि पीछे से आवाज़ आती ‘मम्मी, हो गयी.’ साथ ही, तब मेरा फ़ोन भी उतना स्मार्ट नहीं था. इसलिए इस बार बच्चों की उम्र और फ़ोन की स्मार्टनेस बढ़ने के कारण भी मेरा उत्साह दुगुना था.

अब हर सुबह घर का दरवाज़ा बंद होता और फ़ोन का खुल जाता. इस नेता ने ये कहा, उस पार्टी ने ये किया, इसने पार्टी बदली, उसने अपनी ही पार्टी के नेता के खिलाफ ट्वीट किया, ये पत्रकार इस पार्टी का है,ये चैनल बिका हुआ है, बॉलीवुड भी पूरा राजनीतिक हो गया है. ये अभिनेता या अभिनेत्री क्यों बोल रहा है? जो नहीं बोल रहा वो क्यों नहीं बोल रहा?

शाम को पति घर आते तो बातें होने लगतीं. असली वाली बातें! एकदम इंटेलेक्चुअल टाइप! बहुत मज़ा आता. दोनों दिन भर पढ़ते ताकि शाम को अच्छे से बहस कर सकें. सबसे मज़ेदार बात तो ये थी कि पति और मैं एकदम अलग-अलग विचारधारा के प्राणी हैं. किसी दिन उनका पलड़ा भारी, किसी दिन मेरा. ज़िंदगी में इतना मसाला! बहुत मज़ा दे रहा था. मगर हुआ यूं कि जैसे उबली लौकी खाने वाले अगर रोज दावत खाने लगें तो पेट साथ छोड़ देता है और बदहजमी होने लगती है. ऐसा ही कुछ हमारे साथ भी हुआ .

एक दिन बहस हुई. नतीज़ा - वो बिस्तर के एक कोने पर और मैं दूसरे पर. (कोई नहीं, ऐसा तो पहले भी होता रहा है.) दो दिन बाद फिर से बहस हुई. नतीज़ा - मैं सोफे पर और वो बिस्तर पर. (कोई नहीं, ये भी कौन सा पहली बार हो रहा था!) एक बार फिर से बहस हुई. और इस बार का नतीजा – 3-4 दिनों तक बातचीत ही बंद. (यूं तो, ये भी होता रहता था पर इस बार कारण थोड़ा अलग था.)

आमने-सामने बात बंद थी पर कॉमन व्हाट्सएप्प ग्रुप पर दोनों का एक-दूसरे की टांग खींचना चालू था. फीलिंग ऐसी कि अच्छा तुम ऐसा सोचते हो? घर आओ. लौकी, करेला मिलेगा! यहां तक तो सब ठीक था लेकिन जब गुस्सा बच्चों तक पहुंचने लगा तब एंटीना खड़े हुए. मुझे लगा कुछ गड़बड़ है. सो मैंने पति के साथ राजनैतिक चर्चा बंद कर दी. लेकिन समस्या का हल नहीं मिल रहा था. दिन भर इधर-उधर से पढ़ने वाला दिमाग चाहता कि वह कुछ चर्चा भी करे. लेकिन गालियां खाने ही हिम्मत हर किसी में नहीं होती ना! (शायद इसीलिए ऐसे बहुत से लोगों को लगने लगा है कि लोकतंत्र खतरे में है.)

मुझे लगा इस तलब को शांत करने के लिए कुछ करना चाहिए. और सोची समझी साज़िश के दौरान मैंने गुब्बारे में पिन चुभाना शुरू किया. अब जब वे घर आते तो हम थोड़ी-बहुत ‘चखने औचाय पर चर्चा’ कर लेते. इस दौरान अगर कभी उन्हें तैश आता तो मैं चुप हो जाती. जब मैं जोश में आती तो वे धीरे ‘भारत माता की जय’ बोल देते. लेकिन वो और मैं दोनों ये जानते थे कि इतना सब हमारे लिए काफी नहीं था. सो एक दिन रात को नींद से जगाकर कहने लगे- नींद नहीं आ रही, तुमसे लड़ाई करनी है. आधी नींद में एक ही ख्याल आया, अब क्या नया पढ़ लिया जो नींद उड़ गयी?

वो जानते हैं, बच्चों की मां कहां जाएगी? थोड़ा सा नाराज़ हो जाएगी तो मना लेंगे. बहुत हुआ तो सब्ज़ी में मिर्च ज्यादा डाल देगी, खा लेंगें. मुझे भी लगता है कि थोड़ी भड़ास निकल जाएगी तो चैन से सो जायेंगे, ऑफिस में ठीक से काम कर पाएंगे, ज्यादा कमाएंगे तो कहीं घूम आयेंगे.

बाहर चुनाव का एक-एक चरण ख़त्म होने के साथ लोगों का टकराव बढ़ता जा रहा था, नेताओं की ज़ुबान बेलगाम होती जा रही थी, सोशल मीडिया पर फैला ज़हर लोगों के दिमाग पर चढ़ता नज़र आ रहा था. लेकिन हमारे घर का माहौल थोड़ा उलटा हो रहा था. हम दोनों अब एक-दूसरे को सुन पा रहे थे, समझने की कोशिश कर रहे थे और सबसे अच्छी बात ये हो रही थी कि हम एक दूसरे को स्वीकार करना सीख रहे थे. पति-पत्नी के मामले में ऐसा होना दुर्लभ है.

इस सबके बीच एक दिन 19 मई आ गई. तब तक शोर मचाते, नफरत फैलाने की कोशिश करते, भीड़ को अपनी लच्छेदार भाषा से लुभाते नेता थक चुके थे. इस दिन देश का भविष्य इवीएम मशीन में बंद हो गया था. शाम को आए एग्जिट पोल संभावित चुनाव परिणाम की ओर इशारा कर रहे थे. दिन-रात सोशल मीडिया पर लगे रहने वाले लोग कुछ वक़्त के लिए बेरोजगार सा महसूस कर रहे थे.

एक वीडियो घूम रहा था जिसमें हलवाई लड्डू बना रहे थे. लेकिन मुझे खीर पसंद है और उन्हें ज़लेबी. मैंने दूध मंगवा कर फ्रिज में रख लिया, चावल का डिब्बा खोल कर तसल्ली कर ली. उन्होंने भी जोमैटो खोल कर देख लिया कि जलेबी कहां से अच्छी मिलती है. आखिर, 23 मई की तैयारी हमें भी तो करनी थी.

आखिरकार वह दिन आ गया, जिसका सबको इंतज़ार था. परिणाम वही रहा जिसका अंदाजा था. अगले पांच साल तक देश किस दिशा में जायेगा इसका फैसला हो गया था. और उस दिन खीर और जलेबी खाकर हमने अपनी गृहस्थी बचा ली. हमें उम्मीद है कि बहुत से लोग हमारी तरह अपने रिश्ते बचा पाने में सफल हुए होंगे. उन्होंने बोलने के साथ सुनना भी सीखा होगा. अगर सुन रहे थे तो समझना भी.

कहते हैं अगर आप दूसरों के अनुभव से सीख लें तो ज़िंदगी थोड़ी आसान हो जाती है. कहने में थोड़ा भाषणबाजी टाइप लग सकता है लेकिन जिस दृष्टिकोण से हमने अपना रिश्ता मज़बूत किया, वही नज़रिया लोकतंत्र को भी तो मज़बूत कर सकता है. लोकतंत्र को फलते-फूलते देखना चाहते हैं तो अपने आस-पास के मनुष्यों को बोलने की आज़ादी दीजिये. आखिर, इस लोकतंत्र की पहली इकाई मनुष्य ही तो हैं.