लखनऊ से रायबरेली होकर अमेठी जाते समय शायद आप उम्मीद करेंगे कि आप ऐसे इलाके में पहुंच रहे हैं जहां शानदार सड़कें होंगीं, ख़ुशहाल लोग होंगे, खेत फ़सलों से अटे होंगे. एक ऐसे इलाक़े में, जहां से देश की राजनीति के शीर्ष पर रहे परिवार के लोगों को प्रतिनिधि बनाकर संसद में भेजा जाता रहा हो, वहां पहली बार जाते समय आपको लगेगा कि स्थितियां देश और सूबे के बाकी हिस्सों से अलग होंगी.

स्थितियां वाक़ई अलग हैं, लेकिन दूसरी जगहों से नहीं, आपकी इस सोच से हैं. आप एक खस्ताहाल हाइवे से गुज़रते हुए फ़ुरसतगंज पहुंचते हैं. यहां अमेठी का एयरफील्ड है, जहां सिर्फ चार्टर्ड उड़ानें पहुंंचती हैं. स्थानीय लोग शिकायत करते हैं कि राहुल और प्रियंका गांधी यहां उतरते हैं, जनसभाओं में भाषण देते हैं और चले जाते हैं. लोगों ने राहुल गांधी को छोड़कर स्मृति ईरानी को क्यों चुना, यह जानने के लिए हम एयरफील्ड के नज़दीक बसे गांव पूरे बादेसिंह पहुंचते हैं.

लोगों के कुछ बोलने से पहले नहर के साथ-साथ चलती गांव तक पहुंचने की ऊंची-नीची, कच्ची सड़क अपने आप बहुत कुछ कह जाती है. गांव की शुरुआत में ही कुछ झोंपड़ियां हैं जहां एक महिला एल्युमिनियम के बर्तन में चावल खा रही हैं. वह नेताओं और वोट के बारे में बात नहीं करना चाहती. वह नहीं बताना चाहती कि उसने किस पार्टी को वोट दिया या जिसे दिया उसका नाम क्या है. थोड़ी देर उसकी झोंपड़ी में वक्त बिताने के बाद वह कहती है कि उसने कमल को वोट दिया. बस. इस पर वह और बात नहीं करती.

आगे बढ़ने पर एक बड़े और पक्के मकान के सामने चारपाई डाले पोते-पोतियों के साथ बैठीं चंदा सिंह ठाकुर को यह बताने में कोई उज्र नहीं कि उन्होंने बीजेपी को वोट दिया. वे कहती हैं, ‘बड़े लोगों ने कहा कि इस बार रानी को वोट दिया जाए, देखें क्या करती हैं. क्या मालूम बाल-बच्चों को नौकरी मिलने लगे. हमें किसी को तो देना था, सो दे आए.’ लेकिन चंदा के परिवार में एक अजीब बात भी देखने को मिलती है. उनकी बहू इंदिरा गांधी आई हॉस्पिटल में काम करती हैं. उन्होंने और उनके पति ने कांग्रेस को वोट दिया, बाकी छह लोगों ने भाजपा को. दिलचस्प बात यह है कि ऐसा सोच-समझकर किया गया है. चंदा कहती हैं कि छह वोट अगर हम बीजेपी को दे रहे हैं तो ज़रूरी है कि कम से कम दो वोट कांग्रेस को जाएं. आखिर राहुल अमेठी को अपना परिवार मानते हैं.

वहीं पास में ईंटों की चारदीवारी पर बैठे रामसुघड़, जो पासी समुदाय से संबंध रखते हैं, कहते हैं कि चाहे जो हो, लेकिन सबके समझाने के बावजूद उन्होंने राहुल गांधी को ही वोट दिया है. वे मोदी सरकार द्वारा चुनावी बजट में घोषित प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, ‘किसानन को दोइ-चार हज़ार खाते में मिल गया रहा, तो दे आए कमल को वोट.’ उनकी बात झूठी नहीं लगती. सरायखेमा गांव के चौहान परिवार की महिलाएं अपनी फूस की झोपड़ी दिखाते हुए बताती हैं कि वे कमल को वोट देकर आई हैं ताकि उनके परिवार को ‘कलोनी’ (सरकार की तरफ से मिलने वाला आवास) मिल सके.

‘बिना काम किए कांग्रेस संगठन ने सोच लिया कि मतदाता हमारे सिवा जाएगा कहां’

जब हम फ़ुरसतगंज के एक कांग्रेस कार्यकर्ता पवन शुक्ला से बात करते हैं तो वे इस बड़े बदलाव का ठीकरा सोशल इंजीनियरिंग और भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे पर फोड़ने की कोशिश करते हैं. वे कहते हैं, ‘एक तो हमें बीएसपी का उम्मीदवार न होने का नुकसान हुआ. दलित वोट बीजेपी की तरफ चला गया. और फिर इन लोगों ने हिंदुत्व का इतना शोर मचाया कि उन हिंदुओं का वोट भी वहीं गया जो जात-धर्म के नाम पर वोट नहीं देते थे.’

कांग्रेस के संगठन में न्याय पंचायत (छह पंचायतों का समूह) अध्यक्ष के तौर पर काम कर रहे रामशंकर यादव पार्टी की हार पर थोड़ा खुलकर बोलते हैं. वे सीधे कहते हैं कि कांग्रेस का संगठन बीजेपी के सामने कहीं नहीं टिकता. ‘हमारा वरिष्ठ नेता जनता के पास गया ही नहीं. हमने बिना कुछ किए ही मान लिया कि मुसलमान और दलित वोट तो राहुल को वोट देगा ही, वो कहां जाएगा. लेकिन बहुत सा अल्पसंख्यक मतदाता वोट डालने निकला ही नहीं.’ ध्यान देने वाली बात है कि अमेठी लोकसभा क्षेत्र में लगभग 33 फ़ीसदी जनसंख्या मुसलमान है.

इसके अलावा वे संगठन की बाकी ख़ामियों की भी बात करते हैं. यादव बताते हैं कि मध्य प्रदेश के गजेंद्र सिसोदिया को अमेठी का कोऑर्डिनेटर बना दिया गया, जो कि स्थानीय कार्यकर्ताओं को पसंद नहीं आया. ‘बात ठीक भी थी, बाहर से आने वाले को यहां की स्थिति क्या पता होगी. उन्होंने ठीक से चीज़ें संभाली ही नहीं. ज़िलाध्यक्ष योगेंद्र मिश्रा ने भी काम नहीं किया. न तो ब्लॉक स्तर की बैठकें हुईं, न उन्होंने ग्राम सभा अध्यक्षों की मीटिंग कराकर कोई रणनीति बनाई. पिछले इलेक्शन तक पुरवा प्रभारी बनाए जाते थे, इस बार वो भी नहीं हुआ. हमने बड़े नेताओं से शिकायत भी की तो उन्होंने टाल दिया कि देखेंगे. नतीजा ये हुआ कि चुनाव के दिन भी लोगों ने बूथ पर काम नहीं किया.’

मुस्लिम बहुल इलाके जायस में रहने वाले ज़मीर हसन बताते हैं कि वे पिछले चालीस सालों से कांग्रेस से जुड़े रहे हैं. वे भी कांग्रेस की हार की ज़िम्मेदारी स्थानीय नेताओं पर डालते हैं. ‘इस बार नेता सब गाड़ियों में सड़कों पर घूम रहे थे, लोगों के पास कोई नहीं गया. निकाय चुनाव हारने के बाद भी ये संभले नहीं. अगर चुनाव वाले दिन भी ये लोग काम कर लेते तो हारने की नौबत न आती.’ वे बताते हैं कि भाजपा के नेताओं ने सब गांवों के जीते, हारे, नए, पुराने प्रधानों को इकट्ठा करके उन्हें पैसा दिया कि लोगों को वोट डलवाएं. जबकि कांग्रेस के अंदर इतनी लॉबीइंग थी कि जिसे पैसा मिला उसने अपने लोगों को दिया और बाकी अपने पास रखकर बैठ गए. काम करने में इन लोगों की दिलचस्पी थी ही नहीं.

जब जायस के नगरपालिका अध्यक्ष महेश सोनकर से पूछा जाता है कि कांग्रेस के गढ़ में बीजेपी ने कैसे सेंध लगाई तो वे गिनाने लगते हैं कि पिछला लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद स्मृति ईरानी ने अमेठी के लोगों के लिए क्या-क्या किया. जबकि राहुल अपनी सांसद विकास निधि भी खर्च नहीं कर पाए. वे बताते हैं कि राहुल इतने साल यहां के सांसद रहे लेकिन नगर पालिका में न तो एक भी सरकारी डिग्री कॉलेज है और न ही अस्पताल, महज़ एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के ज़िम्मे 40 हज़ार लोगों के स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी है. वे स्वीकार करते हैं कि ग़रीब किसान का वोट बीजेपी तक पहुंचाने में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के ज़रिए उन्हें मिले पैसे का बड़ा योगदान है. नगरपालिका दफ़्तर में उनकी मेज़ को घेरकर बैठे लोग हां में हां मिलाते हुए कहते हैं कि उन सबके खातों में पैसे आए हैं. सोनकर तो यहां तक बताते हैं कि उनके अपने बेटे को भी इस योजना का लाभ मिला है.

‘स्मृति ने हारने के बाद भी पांच साल में वो किया जो राहुल जीत कर 15 साल में भी नहीं कर पाए’

अमेठी के गौरीगंज विधानसभा क्षेत्र पहुंचने पर हम भाजपा के चमचमाते हुए दफ़्तर में पार्टी के मीडिया प्रभारी गोविंद सिंह चौहान से मिलते हैं. वे स्मृति ईरानी की जीत के कारणों पर बात करते हुए सोनकर की तरह ही सबसे पहले पूरी तफ़सील से उनके पिछले पांच साल के कामों का ब्यौरा देते हैं. किस तरह ‘दीदी’ ने 2014 के चुनावों की कैंपेनिंग के दौरान चुनाव का बहिष्कार करने वाले पिपरी गांव के लोगों से वादा किया था कि वे जीतें या न जीतें मगर उनकी ज़मीन को हर साल बाढ़ में डुबा देने वाली गोमती पर तटबंध हर हाल में बनवाएंगी. और किस तरह उन्होंने अपना यह वादा पूरा किया. कैसे उन्होंने राज्य और केंद्र सरकार के मंत्रियों को अमेठी ला-लाकर क्षेत्र को चुटकियों में खाद वितरण से लेकर रेलवे दोहरीकरण, विद्युतीकरण, अस्पताल, डिग्री कॉलेज और केंद्रीय विद्यालय जैसी सुविधाएं दिलवाईं. कैसे उन्होंने पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से कहकर उस राजीव गांधी पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट को 319 करोड़ रुपये दिलवाकर उद्घाटन तक पहुंचाया, जिसे शुरू करने की घोषणा 2008 में मनमोहन सिंह ने की थी.

इसके बाद वे बताते हैं कि चुनावों के लिए स्मृति ईरानी ने ऐसा क्या किया जो राहुल गांधी ने नहीं किया. राहुल ने जहां यह कहा कि अपने घर में कौन वोट मांगता है वहीं स्मृति ने लोगों से जुड़ने की कोशिश की. ‘जैसे उन्होंने कुंभ के दौरान अपने पैसे से रोज़ चार गाड़ियां प्रयाग भेजकर अमेठी के लगभग 30,000 लोगों को कुंभ स्नान करवाया. पांच बसें भेजकर लगभग 300 लोगों को हरिद्वार के दर्शन करवाए. एक लाख फलदार वृक्ष बांटे, जिनके अब फल आते हैं तो बच्चे कहते हैं कि दीदी वाले पेड़ का आम है, नींबू है. 2014 में एक बीजेपी समर्थक की मौत होने पर उन्होंने उसके चारों बच्चों की पढ़ाई का ज़िम्मा अपने ऊपर ले लिया. उन्हीं दिनों 50,000 हज़ार लोगों का बीमा उन्होंने अपने सेविंग अकाउंट से चैक देकर कराया. लगभग हर बूथ से 10-20 लोगों का बीमा हुआ.’

गोविंद सिंह चौहान यहीं नहीं रुकते. वे बताते हैं कि स्मृति एक तो यहां बार-बार आईं और जब यहां नहीं भी थीं तो भी रोज़ किसी न किसी वजह से लोकल अख़बार और टीवी पर बनी रहती थीं. अगर किसी के घर में आग लग गई हो तो वे उधर से कपड़ा, चावल और दूसरे ज़रूरी सामान पीड़ित के घर पहुंचवा देती थीं. वे कहते हैं, ‘दीदी कम से कम 500 कार्यकर्ताओं को नाम से जानती हैं, और मैं चैलेंज करता हूं कि गांधी अपने दस लोगों के नाम भी नहीं ले पाएंगे. जबकि वो कहते हैं कि वो यहां अपने पिता के वक्त से आ रहे हैं. अगर अमेठी का कोई दिल्ली में ‘दीदी’ से मिलता था तो वो खुद पूछती थीं कि कहां रुके हो, अपने पीए को बोल देती थीं कि देख लेना इनके आने-जाने, रुकने-रहने का. कार्यकर्ता फिर दोगुने जोश से काम करता था.’ वे अपने आईटी सेल की भी तारीफ़ यह कहते हुए करते हैं कि इसी दफ़्तर से लगातार कम से कम छह-सात लोगों की टीम ने सोशल मीडिया पर लोगों तक हमारा संदेश पहुंचाया.

इस आरोप पर कि भाजपा ने इस लोकसभा क्षेत्र पर बहुत ज्यादा पैसा खर्च किया, चौहान कहते हैं कि ‘मैं स्वीकार भी कर लूं कि पार्टी की तरफ से पैसे के लिए कोई कोताही नहीं की गई तो आप ये देखिए कि कांग्रेस के पास क्या पैसा कम था? वे कहते हैं, ‘हम ये सीट पिछली बार ही जीत सकते थे पर पिछली बार हमारे कार्यकर्ताओं को यकीन ही नहीं था कि हम जीत भी सकते हैं. वो खुद बोलता था कि जीतेंगे तो राहुल गांधी ही. लेकिन जब हमने देखा अंतर सिर्फ एक लाख सात हजार वोटों का ही था तो लगा कि हमें तो बस 55000 वोट और चाहिए थे. यानी हर बूथ से करीब 30 वोट और. तब लगा कि हम तो जीत भी सकते थे. इसलिए इस बार हमें अपने जीतने का पूरा यकीन था.’

राहुल हमारे वोट की हिफ़ाज़त नहीं कर पाए’

राहुल की हार से सबसे ज़्यादा हैरान और दुखी मुस्लिम समुदाय और कांग्रेस का पारंपरिक मतदाता है. वह आरोप लगाता है कि राहुल गांधी उनका वोट नहीं बचा पाए. वे यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि अमेठी की जनता ने राहुल को वोट नहीं दिया. इन्हें लगता है कि ईवीएम मशीनों को बदले बिना भाजपा का यहां से जीतना संभव नहीं था. ‘हमारा काम वोट देना था, हमने राहुल को दिया. वोट संभालना, गिनवाना प्रत्याशी का काम था. लेकिन राहुल और कांग्रेसियों ने हमारे वोट की हिफ़ाज़त नहीं की’ मुंशीगंज रोड, अमेठी के नियाज़ अहमद कहते हैं, ‘इन लोगों को देखना चाहिए था कि कैसे उनके इलाके में ईवीएम खराब हो रही है, बिना पहरे के गाड़ियों में भरी जा रही है.’ नियाज अहमद पूछते हैं कि अमेठी में करीब साढ़े चार लाख मुस्लिम मतदाता है, जिसमें से कम से कम तीन-साढ़े तीन लाख वोट राहुल को मिलने ही थे, तो फिर राहुल यहां से हारे कैसे?

मुसलमान वोटों के बारे में पूछने पर पार्टी के क्षेत्रीय मीडिया प्रभारी गोविंद चौहान भी साफ कहते हैं कि उनके कार्यकर्ताओं ने मुसलमान मतदाताओं में कोई दिलचस्पी नहीं ली. ‘एक दो बार हमने कहा भी कि जाके राम-राम ही कर लो. चाय पिलाएं तो पी आओ, पर उन्होंने सीधे कह दिया कि टाइम खराब करने का कोई मतलब नहीं.’

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मुस्लिम समुदाय के सारे वोट कांग्रेस को चले गये. इस समुदाय के कई लोगों से बात करने पर ज्यादातर यही कहते हैं कि न तो उनके पास कांग्रेस के लोग वोट मांगने आए और न ही भाजपा के. और जो लोग थोड़ा खुल कर बात करते हैं, वे कहते हैं कि इस वजह से उनके आस-पास काफी लोग वोट देने ही नहीं गए.

रौशनपुर गांव के अब्दुल से इस बारे में पूछने पर पहले तो वे चुनावों के बारे में बात ही नहीं करना चाहते. बहुत कुरेदने पर सिर्फ इतना बताते हैं कि वे वोट देने गए थे और वहां क़ासिमपुर बूथ पर उनके सामने ईवीएम खराब हुई थी. लेकिन उनकी बातें सुनकर नज़दीक आईं उनके परिवार की एक महिला बताती हैं कि उन्होंने वोट इसलिए नही दिया क्योंकि ‘प्रधानों या विधायकी के चुनाव होते तो पार्टी वाले ले ही जाते, पर इस बार कोई पूछने नहीं आया तो हम गए ही नहीं.’

राहुल गांधी की अप्रत्यशित हार पर सबसे दिलचस्प टिप्पणी एक कांग्रेस समर्थक की तरफ से ही आती है. नाम में क्या रखा है कहते हुए वे बताते हैं, ‘राहुल की हार से अमेठी की जनता दुखी है. इस बार बहुत लोगों ने भाजपा की बातों में आते हुए उन्हें वोट नहीं दिया. पर ये लोग भी सोच रहे थे कि हम बीजेपी को वोट ज़रूर दे रहे हैं, पर जीतेगा तो राहुल ही. बस इसी भरोसे में कांग्रेस रही, इसी भरोसे में कांग्रेस का वोटर.’