इसी उपन्यास के अध्याय ‘ख़्वाबगाह’ का एक अंश :

‘क्या यह मुमकिन है कि कोई मां अपने बच्चे को देखकर डर जाए? जहांआरा बेगम डर गईं. उनकी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि उन्हें अपना दिल सिकुड़ता हुआ और हड्डियां राख होती हुई लगीं. दूसरी प्रतिक्रिया यह थी कि उन्होंने एक बार फिर से देखा कि देखने में कोई चूक तो नहीं हुई है. तीसरी प्रतिक्रिया यह थी कि उन्होंने अपने ही रचे हुए से मुंह फेर लिया, जिससे उनके पेट में ऐंठन हुई और टांगों पर दस्त की एक पतली धार बह निकली. चौथी प्रतिक्रिया यह थी कि उन्होंने ख़ुद को और अपनी संतान को ख़त्म करने के बारे में सोचा. पांचवी प्रतिक्रिया यह थी कि उन्होंने बच्चे को आग़ोश में लिया और जिस दुनिया को वे जानती थीं और जिन दुनियाओं के वजूद से अनजान थीं, उनके बीच किसी दरार से नीचे गिरती चली गईं... हर चीज़ या तो पुल्लिंग थी या स्त्रीलिंग, आदमी थी या औरत. उनके बच्चे के अलावा हर चीज़. वे यह जरूर जानती थीं कि उस जैसों के लिए भी एक लफ़्ज़ है - हिजड़ा, बल्कि दो लफ़्ज़ हैं- हिजड़ा और किन्नर. लेकिन दो लफ़्ज़ों से कोई भाषा तो नहीं बनती.’


उपन्यास : अपार खुशी का घराना

लेखिका : अरुंधति रॉय

अनुवादक : मंगलेश डबराल

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन

कीमत : 399 रुपए


लोकतंत्र में यकीन रखने वाले वोट भी डालते हों यह कतई जरूरी नहीं. मताधिकार का प्रयोग लोकतंत्र में यकीन रखने का एक जरिया जरूर है, लेकिन यही एकमात्र जरिया नहीं है. हर कोई बहुत सारे तरीकों से लोकतंत्र में अपनी आस्था दिखा सकता है, दिखाता है. कोई लोकतांत्रिक तरीके से बोलकर, कोई लिखकर, कोई अपने बुनियादी अधिकारों के लिए लड़कर, कोई मौलिक/बुनियादी अधिकार छीनने की क्षमता रखते हुए भी उन्हें न छीनकर. हमारे समय की जानदार लेखिका अरुंधती रॉय न सिर्फ अपने भाषणों में, बल्कि अपने उपन्यासों में भी उस लोकतंत्र को जबरदस्त तरीके से जीती हैं. उनका यह उपन्यास ‘अपार खुशी का घराना’ भी भारत के धड़कते और सुलगते लोकतंत्र की एक बेहद सजीव, मार्मिक और शानदार अभिव्यक्ति है.

अरुंधति रॉय की कलम में अल्पसंख्यकों, हाशियाकृत लोगों, शोषितों और वंचितों के प्रति एक गहरी टीस है. उनमें ऐसे लोगों के दर्द, खुशी, दबी-छिपी चाहतों, सपनों, अपेक्षाओं और उपेक्षाओं को देखने की पैनी नजर है. वे ऐसे हर एक पात्र के मनोभावों का बयान इतनी गहराई से करती हैं कि जैसे वह किसी और की नहीं बल्कि अपनी ही आत्मकथा के किसी किस्से को सुनाने लगी हों. पुरानी दिल्ली के एक किशोर (भावी किन्नर) के मन में एक युवा किन्नर को देखकर पैदा हुए आकर्षण को बयान करते हुए अरुंधति लिखती हैं –

‘आफ़ताब ने जिस औरत का पीछा किया, वह जैसे कपड़े पहने थी और जिस तरह चल रही थी, वह इसलिए था कि वह कोई औरत नहीं थी. लेकिन वह जो भी थी आफ़ताब वही होना चाहता था...वह उसके जैसा होना चाहता था...

वह चाहता था कि अपना नेलपॉलिश वाला हाथ और चूड़ियों से भरी कलाई आगे बढ़ाए और दूकान पर मोलभाव करने से पहले नज़ाकत के साथ मछली का गलाफड़ा उठाकर देखे कि वह ताज़ा है या नहीं. वह चाहता था कि सड़क पर एक डबरे को पार करते हुए अपनी सलवार को इतना उठा ले कि उसकी चांदी की पाज़ेब नज़र आने लगे.

आफ़ताब का ज़नाना हिस्सा महज़ एक पैबंद नहीं था.’

व्यंग्य, हंसी के मूल भाव से नहीं बल्कि टीस से पैदा होता है. अरुंधति रॉय के इस उपन्यास में कदम-कदम पर व्यंग्य और कटाक्ष मिलते हैं जो सत्ता और व्यवस्था के साथ-साथ पाठकों के कलेजे पर भी तीखे वार करते हैं. कश्मीर के लोगों की जीवन की विडंबना को लेखिका बहुत शिद्दत से महसूस करती है. कश्मीर को अरुंधति एक ऐसे शहर के रूप में याद करती हैं जो संत्रास में जीने को ही सामान्य जीवन मानने लगा है! जहां के लोग सेना, सत्ता और आतंकवाद के पाटों में पिसते हैं और कभी भी अपनी बात को सही तरीके से कहने का रास्ता न पाकर हर घड़ी एक अंतहीन हताशा में जीते हैं. उन्हीं कश्मीरियों के जेहन में झांकती और उनकी अनंत हताशा को बेहद तीखे और मार्मिक अंदाज में व्यक्त करते हुए अरुंधति लिखती हैं –

‘उसे याद आया कि वह उन लोगों के बीच है जो पिछली रात को मिली यंत्रणा को सामान्य जिंदगी मानते हैं... दोनों औरतें होटल से बाहर उस शहर की सड़क पर आ गईं जो तभी जागता था जब उसे अपने मृतकों को दफनाना होता था... औरतों को कब्र के पास जाने की इजाज़त नहीं है. हम बाद में वहां जा सकते हैं, जब सब चले जाएंगे.

औरतों को इजाज़त नहीं है. औरतों को इजाज़त नहीं है. औरतों को इजाज़त नहीं है.

क्या यह क़ब्र को औरतों से बचाने के लिए है या औरतों को क़ब्र से बचाने के लिए?’

अल्पसंख्यकों के हक में खड़ी अरुंधति के इस उपन्यास में उनकी स्त्री-दृष्टि भी साफ तौर पर उभर कर आती है. कदम-कदम पर वे हर समूह और धर्म के स्त्री विरोधी रवैये और रवायतों को देख, पहचानकर उसे खुले आम कोंचने और उस पर तीखे कटाक्ष करने से बाज नहीं आती.

‘अपार खुशी का घराना’ ‘द मिनिस्टिी ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ का हिन्दी अनुवाद है. इसके अनुवादक मंगलेश डबराल हैं. उनके अनुवाद की सफलता शुरू के पन्नों से ही महसूस होने लगती है जब ‘अपार खुशी का घराना’ पढ़ते हुए किसी भी स्तर पर यह कोई अनुदित कृति नहीं लगती. अरुंधति रॉय का यह दूसरा उपन्यास भी उनकी सम्मोहक, मर्मस्पर्शी, सशक्त और बेहद जीवंत अभिव्यक्ति का प्रमाण है. इस उपन्यास के नायक-नायिका अपने हाशियाकृत जीवन के कारण ही फौलादी इरादों में ढल जाते हैं. यहां टीसती हुई प्रेम-कथा भी है, ‘संदिग्ध लोगों’ के ‘असंदिग्ध प्रतिरोध’ भी!

इस उपन्यास का भूगोल केरल से लेकर कश्मीर तक फैला हुआ है. अरुंधति ने एक तरफ व्यक्तिगत प्रेम की गहराई को मुलायम अहसास के साथ दर्ज किया हैतो दूसरी तरफ सत्ता के चरित्र को बेखौफ तरीके से उघाड़ा भी है. यह उपन्यास दुनिया की विविधता, जटिलता, विभिन्नता से निपटने का एक ही मार्ग दिखाता है - प्रेम का. संक्षेप में ‘अपार खुशी का घराना’ भारतीय संदर्भ में लिखे जाने के बावजूद एक वैश्विक कहानी है जो प्रेम, रोमांस, थ्रिलर और तीखे व्यंग्य के साथ अल्पसंख्यकों के वैश्विक संघर्ष का बेबाक बयान है. इस उपन्यास में पहले ही पन्ने से आपको बांधने की अदभुत क्षमता है. उपन्यास प्रेमियों के लिए यह एक अच्छा तोहफा है.