विवेक सोलंकी पिछले एक साल से दिल्ली में टैक्सी चला रहे हैं. इससे पहले उनका अपना व्यापार हुआ करता था. ग़ाज़ियाबाद में उनकी एक फ़ैक्टरी थी जहां ट्रैक सूट बनाए जाते थे. ये ट्रैक सूट देश के कोने-कोने में सप्लाई होते थे और विवेक का कारोबार अच्छा-ख़ासा चल रहा था. लेकिन 8 नवंबर 2016 के बाद उनका कारोबार चौपट हो गया.

विवेक बताते हैं, ‘नोटबंदी ने मेरा सारा धंधा खत्म कर दिया. पीछे से ऑर्डर आना बिलकुल बंद हो गए और तैयार माल तक गोदामों में धरा रह गया. हमें प्रोडक्शन बंद करना पड़ा लेकिन ख़र्चे तो वहीं के वहीं थे. दो महीने तक मैंने कर्मचारियों को ख़ाली बैठने के पैसे दिए लेकिन मैं लगातार क़र्ज़े में डूबता जा रहा था. हारकर मुझे फ़ैक्टरी बंद करनी पड़ी. मोदी जी के इस एक फ़ैसले के कारण मुझे क़रीब 60 लाख का नुक़सान हुआ. मैं व्यापारी से टैक्सी ड्राइवर बन गया. लेकिन फिर भी वोट तो मैंने मोदी जी को ही दिया है.’

इतना नुक़सान होने के बाद भी नरेंद्र मोदी को ही वोट देने के बारे में विवेक कहते हैं, ‘नोटबंदी से मेरा जो नुक़सान हुआ उसकी भरपाई तो अब कोई भी सरकार नहीं कर सकती. मोदी जी कम से कम हिंदुओं के लिए काम कर रहे हैं, पाकिस्तान को मुंह-तोड़ जवाब दे रहे हैं और आज की तारीख़ में उनका कोई विकल्प भी नहीं है. अब उनकी जगह हम राहुल गांधी जैसे पप्पू को तो प्रधानमंत्री नहीं बना देंगे.’

नोटबंदी के चलते अपना सब कुछ गंवा चुके विवेक सोलंकी में भी जब नरेंद्र मोदी के प्रति ऐसी दीवानगी दिखती है तो वे कारण आसानी से समझे जा सकते हैं जिनके चलते उन्हें यह प्रचंड बहुमत मिला है. विवेक की बातों में ही इस जीत के तीन मुख्य कारण देखे जा सकते हैं - सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, मज़बूत राष्ट्रवाद और विकल्पहीनता की हद तक कमज़ोर दिखता विपक्ष.

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आरोप भाजपा ने हमेशा गहनों की तरह पहने और साध्वी प्रज्ञा जैसे लोगों को आगे करके इनकी चमक भी बनाए रखी. और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर उसने लगभग पेटेंट हासिल कर लिया. कश्मीर से लेकर छत्तीसगढ़ तक जवान शहीद होते रहे लेकिन इनके लिए भाजपा और मोदी सरकार विपक्ष को कटघरे में खड़ा करते रहे और जनता से इनके नाम पर वोट भी मांगते रहे. मोदी सरकार ऐसा सफलतापूर्वक कर सकी तो इसकी सबसे बड़ी वजह बेहद कमज़ोर विपक्ष भी रहा.

राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का एकमात्र विकल्प कांग्रेस को माना जाता है. लेकिन बीते पांच सालों में वह न सिर्फ़ सांगठनिक रूप से अपने सबसे कमज़ोर दौर में रही बल्कि राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष होना भी भाजपा के लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं हुआ. यह सही है कि राहुल गांधी की पप्पू वाली छवि स्थापित करने में भाजपा के आईटी सेल ने अहम भूमिका निभाई है. लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं जिन्हें गांधी परिवार का वारिस होने के अलावा उनमें ऐसी कोई योग्यता नहीं दिखती जिसके चलते उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष या प्रधानमंत्री बनाया जा सके.

अगर लोग राहुल गांधी के बारे में ऐसी धारणा रखते हैं तो उसके कई वाजिब कारण भी नजर आते हैं. वे राजनीति में नए नहीं हैं और 2004 में पहली बार सांसद चुने गए थे. इसके बाद लगातार दस साल तक उनकी ही सरकार केंद्र में रही. आज उनकी उम्र अर्धशतक लगाने को है और बतौर सांसद वे अपने तीन कार्यकाल पूरा कर चुके हैं. लेकिन इतने लंबे समय में भी वे देशवासियों के बीच अपनी स्वीकार्यता नहीं बना पाये. बल्कि इस बार तो उनके पैर अमेठी की उस धरती से भी उखड़ गए जिसे गांधी परिवार की पुश्तैनी विरासत समझा जाता था.

हालांकि पिछले कुछ समय में राहुल गांधी में काफी बदलाव भी देखने को मिले हैं. अब वे पहले की तुलना में बेहतर वक़्ता हुए हैं, कठिन सवालों का जवाब देना सीखें हैं, जनता के बीच पहले से ज़्यादा पहुंचे हैं और अपनी पप्पू वाली छवि को भी तोड़ने में कामयाब हुए हैं. लेकिन बहुत देर से आने वाले ये बदलाव क्या इतने और ऐसे हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री पद का योग्य दावेदार बना दें? उनमें ये सुधार ऐसे लोगों को तो अच्छे लग सकते हैं जो गांधी परिवार से आगे नहीं सोच पाते, लेकिन लोकसभा चुनावों के परिणामों से साफ जाहिर है कि देश की बहुसंख्य जनता ऐसा नहीं मानती.

फिर भी इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि बीते सालों में राहुल गांधी की स्वीकार्यता बढ़ी है. सिर्फ़ पार्टी कार्यकर्ताओं को ही नहीं बल्कि आम जनता के भी एक हिस्से को उनकी कुछ ख़ूबियां भाती हैं - उनका सहज होना, आक्रामकता से भरा न रहना, व्यक्तिगत टिप्पणियों पर भी उत्तेजित न होना, सहिष्णुता और उदारता की बातें करना आदि. लेकिन ये तमाम खूबियां भी शायद तुलनात्मक ही हैं. ये वे गुण हैं जिन्हें कुछ लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जोड़कर नहीं देखते. इसलिए राहुल गांधी में इनका दिखना उन्हें अच्छा लगता है.

भावनात्मक होकर अक्सर राहुल गांधी के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि उनके परिवार ने देश के लिए कई बलिदान दिए हैं. यह बात सही भी है. लेकिन क्या सिर्फ़ इसी वजह से उन्हें एक लोकतांत्रिक देश या उसकी सबसे पुरानी पार्टी का मुखिया बनने का अधिकार मिल सकता है? गांधी परिवार का वारिस होने के कारण ही वे आज कांग्रेस के अध्यक्ष हैं और बीते 15 सालों से सांसद भी चुने जा रहे हैं. वे ऐसे अकेले नहीं हैं जिन्हें ये चीजें विरासत में मिली हो. लेकिन विरासत का बोझ संभालने के लिए दोगुने मज़बूत कंधों की ज़रूरत होती है. वंशवाद के आरोपों को सिर्फ़ योग्यता के प्रदर्शन से मिटाया जा सकता है. राहुल गांधी ज्यादातर लोगों की नजरों में अब तक ऐसा नहीं कर पाए हैं.

राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने भाजपा पर अधिनायकवाद या व्यक्तिपूजा का आरोप लगाती रही है, लेकिन उस परंपरा को देश में स्थापित करने वाली ख़ुद कांग्रेस पार्टी ही है. ऐसा पहली बार नहीं है कि लोकसभा का चुनाव सिर्फ़ एक व्यक्ति के नाम पर या उसके चेहरे पर लड़ा गया हो. पंडित जवाहरलाल नेहरु से लेकर इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी तक हर चुनाव कांग्रेस पार्टी ऐसे ही लड़ती आई है. ‘इंदिरा इज़ इंडिया एंड इंडिया इज़ इंदिरा’ का नारा कांग्रेस से ही आया था.

आज कांग्रेस के पास कोई लोकप्रिय चेहरा नहीं रह गया तो वह भाजपा पर व्यक्तिपूजा का आरोप लगा रही है जबकि हक़ीक़त ये है कि वह आज भी एक ही परिवार के चंद लोगों के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है. भाजपा में तो यह परंपरा अब पहली बार जगह बना रही है. कम-से-कम नरेंद्र मोदी ने अपनी जगह अपने बूते तो हासिल की है और उसी प्रक्रिया से हासिल की है जैसी किसी लोकतांत्रिक समाज में की जानी चाहिए. नरेंद्र मोदी का विवादित होना अपनी जगह है लेकिन वे संगठन में नीचे से ऊपर पहुंचने वाले नेताओं में शामिल हैं, वंशवाद के चलते ऊपर से थोपे गए नेताओं में नहीं.

‘मोदी नहीं तो कौन’ - ये वाक्य आम जनमानस के मन में इसलिए भी घर कर गया क्योंकि बीते पांच सालों राहुल गांधी विपक्षी नेता की भूमिका ही नहीं निभा सके. उनसे बेहतर विपक्ष की भूमिका तो छात्रों, चुनिंदा पत्रकारों और स्टैंडअप कॉमेडियनों ने निभाई है. देश में जब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हवा दी जा रही थी, बहुसंख्यकवाद हावी हो रहा था और धर्मनिरपेक्षता को गाली बनाया जा रहा था तब राहुल गांधी संविधान और अपनी पार्टी के सिद्धांतों पर टिके रहने की बजाय कभी ख़ुद को जनेऊधारी ब्राह्मण बता रहे थे, कभी अपना गोत्र खोज रहे थे और कभी ख़ुद को शिवभक्त बता रहे थे. ये सब करने के फेर में राहुल गांधी कांग्रेस के तमाम सिद्धांतों को तिलांजलि देते हुए उस मैदान में जा उतरे जिसमें भाजपा दशकों से चैम्पियन रही है.

व्यक्तिगत तौर पर राहुल गांधी एक अच्छे इंसान हो सकते हैं लेकिन एक नेता के तौर पर वे लगातार विफल हुए हैं. किसी भी पार्टी अध्यक्ष का काम होता है कि वह अपनी नेतृत्व क्षमताओं से अपनी पार्टी को जनता के बीच स्थापित करे. लेकिन राहुल गांधी के मामले में ठीक इसका उलट है. यहां पार्टी ही बीते कई सालों से राहुल गांधी को स्थापित करने में खपी जा रही है.

ऐसे में या तो अब राहुल गांधी को बिना रुके और थके खुद और पार्टी को एक साथ और बड़ी तेजी से तैयार करना होगा. या फिर कांग्रेस अपने नेतृत्व के लिए किसी ऐसे नेता को ढूंढ़ना होगा जो पार्टी को गांधी परिवार से बेहतर तरीके से चला सके और उसे फिर से जनता के बीच स्थापित कर सके. सवाल यह है कि क्या गांधी परिवार किसी अन्य नेता की अध्यक्षता में पार्टी का काम करने को तैयार होगा? या सिर्फ ऐसा होगा कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में राहुल अपना पद छोड़ने की बात करेंगे और उनकी बहन प्रियंका गांधी इसे सबकी मिली-जुली हार बताकर हवा में उड़ा देंगी. फिर चाहे इन नतीजों का संदेश कितना ही साफ और यही क्यों न हो कि जैसे अभी हैं वैसे राहुल गांधी सिर्फ कांग्रेस की मजबूरी हो सकते हैं, इस देश की नहीं.