30 मई से शुरू हो रहे क्रिकेट विश्व कप 2019 की तैयारियां पूरी हो गई हैं और सभी टीमें विश्व कप के लिए इंग्लैंड भी पहुंच चुकी हैं. भारतीय टीम का पहला मुकाबला पांच जून को दक्षिण अफ्रीका से होना है. इस विश्व कप में टीमों की जीत और खिलाड़ियों के प्रदर्शन को लेकर भविष्यवाणियां भी की जाने लगी हैं. लेकिन, इस बार विश्व कप में एक और बात जो ध्यान खींचने वाली है, वह है इसका फॉर्मेट यानी प्रारूप. इस बार विश्व कप का फॉर्मेट पिछले छह विश्व कप टूर्नामेंट्स से अलग है. इस बार सभी 10 टीमों को एक ही ग्रुप में रखा गया है और सभी टीमें सेमीफाइनल में पहुंचने से पहले एक-दूसरे से भिड़ेंगी. यानी, प्रत्येक टीम को लीग स्टेज में नौ मैच खेलने होंगे.

यह फॉर्मेट बेहतर क्यों?

जब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने इस विश्व कप के फॉर्मेट की घोषणा की थी तो ज्यादातर जानकारों ने इसे लेकर ख़ुशी जताई थी. इन लोगों का मानना था कि विश्व कप का यह फॉर्मेट सभी टीमों को ज्यादा मौका देता है और हर एक टीम के पास आखिर तक वापसी करने का मौका होता है. इस विश्व कप के प्रबंध निदेशक स्टीव एलवर्थी एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘यह फॉर्मेट ज्यादा ओपन है. इसमें लीग मैचों के दौरान सभी टीमों के लिए अगले राउंड में पहुंचने का बराबरी का मौका है. हमने और भी बहुत कुछ किया है, जैसे सेमीफाइनल और फाइनल के मैचों में अतिरिक्त दिन रखा है जिससे बारिश होने पर मैच अगले दिन करवाया जा सके.’

पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग इस फॉर्मेट पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, ‘वैसे तो मुझे लगता है कि यह विश्व कप जीतने की सबसे ज्यादा उम्मीद इंग्लैंड की है. लेकिन ध्यान रखना होगा कि यह टूर्नामेंट इस बार राउंड रॉबिन फॉर्मेट में है, हर टीम को लंबा सफर तय करना है, कभी भी कोई स्थिति को पलट सकता है.’

1992 विश्व कप और पाकिस्तान का करिश्मा

1992 का विश्व कप टूर्नामेंट भी इसी फॉर्मेट के तहत खेला गया था. यह विश्व कप ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की धरती पर हुआ था. यह ऐसा पहला विश्व कप था जिसमें सफ़ेद गेंद का इस्तेमाल किया गया था, साथ ही इस टूर्नामेंट में पहली बार डे-नाइट मैच खेले गए थे. यह ऐसा भी पहला विश्व कप था जिसमें खिलाड़ी रंगीन कपड़ों में खेलने उतरे थे. 1992 के इस विश्व कप में नौ टीमों ने हिस्सा लिया था जिसमें ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड, पाकिस्तान, भारत, वेस्टइंडीज, दक्षिण अफ्रीका और श्रीलंका आठ पूर्ण सदस्य थे और जिम्बॉब्वे सहयोगी सदस्य था.

खेल पत्रकार जी कृष्णन अपनी एक टिप्प्पणी में इस फॉर्मेट की खूबी बताते हुए लिखते हैं कि यह फॉर्मेट कैसे हर टीम को अंत तक मौका देता है और इसका बड़ा उदाहरण पाकिस्तान है. 1992 का विश्व कप पाकिस्तान ने जीता था. कृष्णन बताते हैं कि यह जानकार कईयों को अचंभा होता है कि पाकिस्तान इस विश्व कप के अपने शुरुआती पांच मैचों में से केवल एक मैच ही जीत सका था. शुरुआती पांच मैचों में से उसे तीन में हार मिली थी और एक मैच बारिश के चलते रद्द हो गया था.

लेकिन, इस स्थिति के बाद भी पाकिस्तान के कप्तान इमरान खान ने हिम्मत नहीं हारी और लीग स्टेज के आखिरी तीन मैच जीतकर नौ पॉइंट्स के साथ सेमीफाइनल में जगह बनाई. इसके बाद पहले सेमीफाइनल में पाकिस्तान ने न्यूजीलैंड को शिकस्त दी फिर फाइनल मुकाबले में इंग्लैंड को हराकर विश्व कप अपने नाम कर लिया.

कई खेल विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर 1992 के विश्व कप में एक ग्रुप वाला फॉर्मेट नहीं रहा होता तो पाकिस्तान पहले ही दौर में बाहर हो गया होता. इनके मुताबिक अगर टूर्नामेंट दो ग्रुपों वाले फॉर्मेट पर आधारित होता तो पाकिस्तान को सेमीफाइनल में पहुंचने के लिए अपने ग्रुप में दो या तीन मुकाबले तो जीतने ही पड़ते और ऐसे में जाहिर है कि वह ग्रुप स्टेज में ही टूर्नामेंट से बाहर हो जाता. लेकिन, टूर्नामेंट की सभी नौ टीमों के एक ही ग्रुप में होने की वजह से उसके पास आखिर तक मौका बना रहा और उसने शुरुआती मैच हारने के बाद भी आखिर के तीन मैच जीतकर सेमीफाइनल में प्रवेश कर लिया.

फॉर्मेट को लेकर भारतीय कप्तान और कोच की राय जुदा

कुछ खेल विशेषज्ञ कहते हैं कि विश्व कप के इस फॉर्मेट को लेकर कई बड़ी टीमें थोड़ी दुविधा में हैं, क्योंकि इस फॉर्मेट में केवल मजबूती ही नहीं बल्कि टीमों पर निरंतरता के साथ बेहतर प्रदर्शन करने का भी दबाव होगा. इसमें आईपीएल की तरह मैच जीतने के साथ-साथ नेट रन रेट का भी ध्यान रखना होगा. लीग राउंड के अंत में कई टीमों के पॉइंट्स बराबर होने की स्थिति में नेट रन रेट से ही उनके अगले दौर में पहुंचने का फैसला किया जाएगा.

भारतीय कप्तान विराट कोहली इस बारे में मीडिया से बातचीत में कहते हैं, ‘यह मेरा तीसरा विश्व कप है, जो कि मुझे सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण लग रहा है और इसकी वजह इसका फॉर्मेट.’

हालांकि, 1992 विश्व कप में भारतीय टीम का हिस्सा रहे मुख्य कोच रवि शास्त्री की राय कप्तान कोहली से थोड़ी अलग है. विश्व कप के लिए इंग्लैंड जाने से पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनका कहना था, ‘हम इसे इस तरह से भी देख रहे हैं कि इसमें हमारे पास केवल तीन या चार मैच नहीं बल्कि नौ मैच हैं, यानी ज्यादा मौके और इस तरह से यह फॉर्मेट अच्छा कहा जाएगा.’

शास्त्री का यह भी कहना था कि यह प्रारूप वर्तमान परिस्थितियों में और भी बेहतर लगने लगता है क्योंकि इस समय कोई भी टीम किसी भी टीम को हरा सकती है. यदि आप 2014 और 2019 में तुलना करें तो देखते हैं कि 2014 में अफगानिस्तान क्या था और वे अब क्या हैं. बांग्लादेश पहले से बेहतर हुआ है और वेस्टइंडीज के खिलाड़ी कभी भी मैच का रुख बदलने की क्षमता रखते हैं. शास्त्री के मुताबिक ऐसे में अगर कोई (छोटी) टीम आपको चौंका भी देती है तो यह फॉर्मेट आपके लिए उम्मीद बनाए रखता है.