लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस में इस्तीफ़ों का दौर ज़ारी है. चुनाव के तुरंत बाद हुई कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कुछ ऐसी ही पेशकश की थी, जिसे कथित तौर पर बैठक में मौजूद सभी सदस्यों द्वारा ठुकरा दिया गया. इसके बाद राहुल गांधी ने पार्टी के तीन बड़े नेताओं की खिंचाई की. ये थे - पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत. राहुल ने इन तीनों नेताओं पर चुनाव में पार्टी से ज्यादा अपने-अपने बेटों की जीत को ज्यादा तवज्ज़ो देने का आरोप लगाया.

राहुल गांधी के इस रवैए ने कई राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाया है. इसकी पहली वजह तो ये है कि बीते करीब चार दशक से इन तीनों ही की गांधी परिवार के प्रति निष्ठा किसी से छिपी नहीं है. दूसरी बात यह भी कि जिस परिवारवाद का आरोप राहुल गांधी ने अपने इन प्रमुख सिपहसालारों पर लगाया है, वे ख़ुद उसकी सबसे बड़ी मिसाल के तौर पर देखे जाते रहे हैं. बीते करीब एक दशक से यही बात पार्टी के विरुद्ध एक बड़ा हथियार भी साबित हुई है. और फिर अपनी पारंपरिक सीट अमेठी को भी नहीं बचा पाने की वजह से भी विरोधी धड़ा गांधी के इस रुख़ का ख़ूब मखौल बना रहा है.

विश्लेषकों के बीच कांग्रेस अध्यक्ष की यह नाराज़गी खासतौर पर अशोक गहलोत को आड़े हाथ लेने की वजह से भी चर्चाओं में है. बीते करीब डेढ़ साल में वे राहुल गांधी के विश्वस्त सेनापति बनकर उभरे थे. इसकी शुरुआत उनके गुजरात का प्रभारी बनने के साथ हुई थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का गृहराज्य होने की वजह से गुजरात तब कांग्रेस के लिए डूबता जहाज माना जा रहा था. लेकिन वहां तीन सीटों के लिए हुए राज्यसभा चुनाव में अहमद पटेल की जीत ने अमित शाह समेत पूरी भाजपा को बैकफुट पर ला खड़ा किया. अतिनाटकीय रंग ले चुके इस चुनाव में अशोक गहलोत ने अपने रणनीतिक कौशल से कांग्रेस विधायकों को बांधे रखने में अहम भूमिका निभाई थी.

इसके ठीक बाद उन्होंने भाजपा की आंख की किरकरी बन चुके हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी और अल्पेश ठाकोर जैसे युवा नेताओं को गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ लाकर बड़ी उपलब्धि हासिल की. जबकि ये तीनों ही कथित तौर पर प्रदेश के तीन विरोधी समुदायों से ताल्लुक रखते थे. यही कारण था कि गुजरात में कांग्रेस के सम्मानजनक प्रदर्शन का सबसे ज्यादा श्रेय गहलोत को ही दिया गया.

इसके बाद बारी थी कर्नाटक विधानसभा चुनाव की जहां अशोक गहलोत का नाम एक बार फिर उन नेताओं में गिना गया जिन्होंने तुरत-फुरत बड़े निर्णय लेकर भाजपा को प्रदेश में उसी की स्टाइल में शिकस्त दी. जनता दल सेकुलर (जेडीएस) के साथ गठबंधन बनाना हो या फिर बड़ी सावधानी से अपने सभी विधायकों को संभालकर रखना, गहलोत इन सभी मोर्चों पर भाजपा पर भारी पड़े. यदि कांग्रेस ने अपने सभी विधायकों को आंख बंदकर पार्टी के कद्दावर नेता डीके शिवकुमार के रिसॉर्ट में ठहराया तो जिन बसों में कर्नाटक के विधायकों को चर्चित ढंग से लगातार घुमाया जाता रहा वे अशोक गहलोत के करीबी की थीं. इसके बाद कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री की कुर्सी देने के लिए हुए समझौते को अंतिम रूप देने में भी अशोक गहलोत की ही भूमिका प्रमुख रही.

लेकिन अब हालात बिल्कुल उलट हैं. इसका पता इससे चलता है कि कांग्रेस अध्यक्ष ने सोमवार को समय देने के बावज़ूद गहलोत से मुलाकात नहीं की. सूत्रों का कहना है कि इसके बीज राजस्थान में मुख्यमंत्री पद को लेकर गहलोत और प्रदेश के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट की आपसी तनातनी के वक़्त ही पड़ गए थे. राहुल पायलट को प्रदेश की कमान सौंपना चाहते थे, जबकि यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत कई वरिष्ठ नेताओं का समर्थन गहलोत को हासिल था. ख़ुद गहलोत भी मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी तीसरी पारी खेलने की इच्छा बार-बार जताते रहे. नतीजतन कांग्रेस अध्यक्ष को झुकना पड़ा.

इसके कुछ ही महीने बाद मौका था अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को टिकट दिए जाने का. सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी की असहमति के बावजूद वैभव को अपने गृहजिले जोधपुर से पार्टी का प्रत्याशी घोषित कर दिया गया. ख़बरों की मानें तो चुनावों के दौरान राजस्थान के कुछ प्रत्याशियों ने उनके क्षेत्र के मंत्रियों के वैभव के प्रचार में लगाए जाने की शिकायत कांग्रेस हाईकमान के पास भेजी थी. और फिर जब इस सब के बावजूद वैभव भाजपा प्रत्याशी गजेंद्र सिंह शेखावत से करीब पौने तीन लाख वोट से पिछड़ गए तो राहुल गांधी की त्यौरी चढ़ गई.

कई जानकार इस बात से इनकार नहीं करते कि अशोक गहलोत के चार दशक से पुराने राजनैतिक कैरियर पर यह अपनी तरह का पहला दाग है. लेकिन राजस्थान के मुख्यमंत्री बार-बार अपने संबोधनों में कहते रहे हैं कि वैभव गहलोत का टिकट पार्टी नेतृत्व की पसंद पर मिला है, न कि उनकी अनुशंसा पर. एक चुनावी रैली में सचिन पायलट ने भी यह बात कही थी कि जब वैभव को टिकट देने की बारी आई तो गहलोत ने चुप्पी साध ली थी.

बहरहाल अशोक गहलोत के प्रति राहुल गांधी का हालिया बर्ताव कई सवाल खड़े करता है. लेकिन उनसे भी बड़ा सवाल ये है कि दूसरे राज्यों में पार्टी के लिए संकटमोचक साबित हुए अशोक गहलोत अपने ही राज्य में मोदी लहर को रोक पाने में नाकाम कैसे हो गए?

इसका प्रमुख और सामान्य जवाब है- देश में पिछली बार की तरह इस बार भी जबरदस्त मोदी लहर का होना. जानकारों का एक बड़ा तबका मानता है कि भाजपा राजशाही इतिहास वाले राजस्थान में पुलवामा हमले को भुना पाने में पूरी तरह सफल रही. दूसरी तरफ राजस्थान में पार्टी ज्यादा कमजोर स्थिति में थी भी नहीं. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के वोट शेयर के बीच महज 0.5 प्रतिशत का ही अंतर था. विधानसभा चुनाव के पहले राजस्थान में यह नारा भी काफी चर्चित रहा ‘मोदी तुमसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी ख़ैर नहीं.’ हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से घोर नाराज़गी के बावजूद भी प्रदेश के मतदाताओं ने कांग्रेस को 200 में से 100 सीटें देकर, अपने दम पर सरकार बनाने का मौका नहीं दिया. और रही-सही कसर कांग्रेस की आपसी फूट ने पूरी कर दी.

जानकारों का एक तबका यह भी मानता है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पास मुख्यमंत्री पद के दावेदार के नाम पर के एक से बढ़कर एक विकल्प मौजूद थे. जबकि आज भी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को अधिकतर वोटर प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर स्वीकार नहीं कर पाए हैं. लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के कांग्रेस से छिटकने का यह भी बड़ा कारण रहा.

अब दूसरा अहम सवाल ये कि क्या अब कांग्रेस के प्रमुख स्तंभ माने जाने वाले गहलोत के राजनैतिक कैरियर पर हाल-फिलहाल कोई बड़ा संकट मंडरा रहा है. इस सवाल की गंभीरता इससे समझी जा सकती है कि बीते दो दिन में कई प्रमुख समाचार चैनल और अख़बारों में अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री पद से हटाकर सचिन पायलट को यह मौका दिए जाने की बात चल रही है. लेकिन कई जानकार इस संभावना से इत्तेफाक़ नहीं रखते.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक राजन महान इस बारे में कहते हैं कि राहुल गांधी को तुरत-फुरत में की गई किसी भी बड़ी प्रतिक्रिया से बचना चाहिए. बकौल महान, ‘यह ठीक है कि जिम्मेदार नेताओं को राजनीति में परिवारवाद को बढ़ाने से बचना चाहिए. लेकिन पूरी पार्टी की हार का ठीकरा दो या तीन नेताओं पर फोड़ना भी सही नहीं. निश्चित तौर पर यह कांग्रेस के लिए मंथन का समय है, लेकिन यह मंथन गहरा और वास्तविक होना चाहिए. कड़े कदम भी उठाए जाने चाहिए. लेकिन जिस तरह पार्टी अध्यक्ष अपने ही वरिष्ठ नेताओं से पेश आ रहे हैं, वह भी अन्याय सरीख़ा है. इससे पार्टी के अंदर और बाहर, दोनों जगह ग़लत संदेश जाएगा.’

राजस्थान विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष महान आगे जोड़ते हैं, ‘कांग्रेस आलाकमान को समझना होगा कि पार्टी के इस हाल के पीछे क्षेत्रवार गठबंधन से जुड़ी गलत रणनीतियां मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं. यह किसी राज्य के मुख्यमंत्री की नहीं बल्कि हाईकमान के हिस्से की चूक है.’

राजस्थान की राजनीति पर लंबे समय से नज़र रख रहे वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर किसी तरह के राजनीतिक संकट की संभावना से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, ‘सूबे के मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों को संभाल पाने में अशोक गहलोत जैसा विकल्प कांग्रेस में फिलहाल नज़र नहीं आता.’ गहलोत को पद से हटाए जाने की बात कईयों के गले इसलिए भी नहीं उतर रही क्योंकि देशभर की तरह पार्टी राजस्थान में भी किसी अन्य कद्दावर नेता के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर पाने में नाकाम रही है. सैनी के मुताबिक इस स्थिति में अकेले गहलोत के ख़िलाफ कार्रवाई का कोई तुक नहीं बनता.

कई अन्य राजनीतिक विश्लेषक इस बात से भी सहमति जताते हैं कि कमलनाथ और चिदंबरम समेत अशोक गहलोत पर की गई कोई बड़ी कार्रवाई पार्टी में अस्थिरता की वजह बन सकती है. इसके अलावा राजस्थान में बहुजन समाज पार्टी के जिन छह और 12 निर्दलीय विधायकों ने कांग्रेस को समर्थन दिया है, वे निजी तौर पर गहलोत से जुड़े बताए जाते हैं. संभावना है कि गहलोत के हटने पर ये विधायक अपना समर्थन सरकार से वापस ले सकते हैं. इनमें से कईयों ने इस बात के संकेत भी दे दिए हैं. तिस पर भाजपा द्वारा मध्य प्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान में सत्ता पलटने से जुड़ी कयासबाज़ी भी कांग्रेस को कोई बड़ा कदम उठाने से रोकेगी.

इस पूरे घटनाक्रम पर वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ एक अलग बात भी कहते हैं, ‘प्रत्येक पार्टी द्वारा अपनी हार की समीक्षा करना एक स्वभाविक प्रक्रिया है. इसमें सारे पहलुओं की चर्चा भी होती है. लेकिन पार्टी की ऐसी गोपनीय बैठकों से चुनिंदा बातों का बाहर आना, एक बड़ा सवाल खड़ा करता है. इससे कांग्रेस की छवि पर बड़ा धब्बा लगा है. पार्टी को जल्द से जल्द ये ख़बरें लीक करने वाले व्यक्ति की पहचान कर उचित कदम उठाने चाहिए.’ इस मामले में कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी मीडिया से बंद दरवाजे में हुई इस बैठक की ख़बरों को सार्वजनिक करने से बचने और पार्टी की ‘शुचिता’ का ख़्याल रखने की अपील की है.

अब रहा सवाल गहलोत को राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी भूमिका मिलने का तो उसके लिए राहुल गांधी हाल-फिलहाल शायद ही तैयार हों. लेकिन दिलचस्प बात ये भी है कि कुछ महीने पहले पार्टी महासचिव पद छोड़कर गहलोत ख़ुद भी दिल्ली रुकने की अपनी अनिच्छा जता चुके हैं.