उत्तर प्रदेश में अमेठी से चुनाव हारने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दिखाने के लिए ही सही, कम से कम इस्तीफे की पेशकश तो की है. इसके बाद समाजवादी कुनबे के असंतुष्टों की ओर से यह सवाल उछाला जाने लगा है कि क्या राहुल गांधी का अनुसरण करते हुए अखिलेश यादव भी अपने इस्तीफे की पेशकश करेंगे. अखिलेश तो कुनबे की सीटें तक नहीं बचा पाए हैं. बसपा से गठबंधन के बावजूद पत्नी समेत दो भाइयों की सीटें उनके हाथ से निकल गई हैं. मुलायम सिंह यादव भी किसी तरह घिसटते हुए ही जीत पाए हैं. जो सीटें निकली हैं उनमें भी उम्मीदवारों का खुद का कद जीत की बड़ी वजह बना न कि अखिलेश यादव की राजनीति. दूसरी तरफ, मायावती को गठबंधन का खूब फायदा हुआ. उनकी सीटों का आंकड़ा पिछली बार के शून्य से बढ़कर 10 पर पहुंच गया.

नरेंद्र मोदी की आंधी के चलते 2019 के लोकसभा चुनाव में कई नेता पुत्रों को अर्श से फर्श पर आना पड़ा. हालांकि दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश के जगन मोहन रेड्डी और तमिलनाडु के स्टालिन ने परिवार की राजनीति को मजबूती देने में कामयाबी पाई, लेकिन बिहार में न तो लालू पुत्र तेजस्वी का तेज चला और न उत्तर प्रदेश में मुलायम पुत्र अखिलेश की साइकिल ही चल पाई. इनमें भी अखिलेश यादव तो समाजवादी पार्टी के लिए लगातार निराशाजनक फैसले लेने वाले नेता साबित हो रहे हैं.

2012 में मुलायम सिंह यादव ने पार्टी के सभी बड़े नेताओं के विरोध के बावजूद अखिलेश यादव को उनकी भयानक अनुभवहीनता के बाद भी उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया था. उसके पीछे उनकी सोच सिर्फ यही थी कि एक तो उनके जीते जी उनकी राजनीतिक विरासत का किसी विवाद के बिना आसानी से हस्तांतरण हो जाए और दूसरे, उनका पुत्र अपने युवा जोश से उस समाजवादी पार्टी को नई ऊंचाइयों तक ले जाए जिसे उन्होंने अनेक संघर्षो और कठिनाइयों से स्थापित किया था.

लेकिन समाजवादी पार्टी की सरकार के अंतिम वर्ष यानी 2016 के बाद के हालात देखें तो अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी को कदम-कदम पर ठोकरें लगती रही हैं. उनका हर फैसला पार्टी पर भारी पड़ता रहा है. उनकी अति महत्वाकांक्षा के कारण ही समाजवादी परिवार में कलह शुरू हुई. इसकी परिणिति दिसंबर 2016 में मुलायम सिंह यादव को समाजवादी पार्टी अध्यक्ष के पद से सार्वजनिक रूप से हटाए जाने के रूप में हुई. अखिलेश खुद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए और उन्होने 229 विधायकों में से 200 का समर्थन अपने साथ होने का दावा किया. मामला सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग तक भी पहुंचा. इसके बाद पार्टी के विधायकों के टूटने का सिलसिला शुरू हुआ. उनके चाचा और सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल ने अपनी अलग पार्टी बना ली. कुछ विधायक और नेता बसपा के पाले में चले गए.

इसी कलह के दौरान समाजवादी पार्टी की ओर से 2017 के विधानसभा चुनावों के लिए टिकट बंटवारे को लेकर अखिलेश और शिवपाल के बीच 39 नामों को लेकर विवाद हुआ था. अखिलेश के अड़ियल रुख के चलते पार्टी में विभाजन तक हो गया था. लेकिन चुनाव आते आते अखिलेश ने ‘यूपी को साथ पसंद है’ के नारे के साथ राहुल गांधी से गठबंधन कर लिया. चाचा से झगड़े में अखिलेश 39 सीटें छोड़ने को तैयार नहीं थे, लेकिन राहुल गांधी की कांग्रेस से समझौते में उन्होने 111 सीटें छोड़ दीं. अखिलेश की इस रणनीति ने पार्टी को 224 से 54 सीटों तक सीमित कर दिया. लेकिन इसके बाद भी अखिलेश ने हार नहीं मानी. लोकसभा चुनाव 2019 के लिए वे बसपा के हाथी पर अपनी साइकिल लेकर लद गए. समझौते के तहत अखिलेश उनके हिस्से 36 सीटें आईं. अब नतीजों के बाद वे इनमें से कुल पांच सीटें जीत सके हैं.

इस गठबंधन के बारे में मुलायम सिंह यादव ने पहले ही कह दिया था कि गठबंधन करते ही अखिलेश ने आधी पराजय तो पहले ही मोल ले ली है. हालत यह है कि समाजवादी पार्टी सीटों की संख्या के मामले में तो 2014 की स्थिति में ही पहुंच गई है, लेकिन बसपा से गठबंधन और कांग्रेस के समर्थन के बावजूद समाजवादी कुनबे के तीन सिपहसलार चुनावी मैदान में खेत हो चुके हैं. अखिलेश और मुलायम के अलावा जिन तीन सीटों पर सपा जीती है वे तीनों ही विजेता मुस्लिम हैं और अपने दम पर चुनाव जीते हैं. चाहे रामपुर से आजम खान हों, मुरादाबाद से डॉ एसटी हसन हों या फिर सम्भल से सफीकुर्रहमान विर्क, तीनों ही सीटों पर मुस्लिम मतदाता संख्या के आधार पर ये निर्णायक स्थिति में थे और इसका समाजवादी पार्टी को पूरा लाभ भी मिला.

उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा का गठबंधन भले ही समाजवादी पार्टी के लिए कन्नौज, फिरोजाबाद और बदायूं में आत्मघाती साबित हुआ हो, लेकिन बहुजन समाज पार्टी के लिए तो वह छप्परफाड़ सफलता लेकर आया है. मायावती पिछले लोकसभा चुनाव में शून्य पर थीं, लेकिन अब 10 सीटों के साथ वे उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी की नेता बन गई हैं. बसपा की जीती सीटों के विश्लेषण से यह दिखता है कि उन सीटों पर सपा के अपने कमिटेड वोटरों ने बसपा को वोट देने में संकोच नहीं किया है जबकि बसपा के मामले में ऐसा स्वाभाविक तौर पर नहीं हुआ. गठबंधन से दूसरा फायदा बसपा को यह हुआ कि मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस को कमजोर देखते हुए अपना वोट गठबंधन के पाले में डालना अधिक बेहतर समझा.

उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो सीटें ऐसी थीं जहां कांग्रेस और गठबंधन दोनों के उम्मीदवार मुस्लिम थे, मगर दोनों ही सीटें गठबंधन ने जीतीं. सहारनपुर में बसपा के फलर्जुरमान के सामने कांग्रेस के दमदार इमरान मसूद थे और मुरादाबाद में सपा के एसटी हसन के मुकाबले कांग्रेस के इमरान प्रतापगढ़ी, मगर नतीजों से दिखता है कि मुस्लिम वोट एकतरफा गठबंधन को गया. अमरोहा में बसपा के दानिश अली, नगीना में बसपा के गिरीश चंद्र, बिजनौर में बसपा के मलूक चंद नागर और गाजीपुर में बसपा के अफजाल अंसारी आदि की जीत में ऐसा ही हुआ.

दरसल सपा-बसपा का गठबंधन हवाई गठबंधन था, जिसमें बड़े नेता तो आपस में मिल गए लेकिन जमीनी स्तर पर तालमेल हो ही नहीं पाया. अगर यह गठबंधन कुछ महीने पहले हो गया होता तो दोनों ही पार्टियों के नेता अपने जमीनी कार्यकर्ताओं तक बात पहुंचाने में कामयाब हो सकते थे. लेकिन गठबंधन की घोषणा में अनावश्यक विलम्ब के कारण ऐसा हो नहीं सका. जमीनी स्तर पर सपा के यादवों और बसपा के दलितों के बीच जिस तरह के सामाजिक आर्थिक और अंतर्विरोध हैं उनके चलते भी नीचे के स्तर पर गठबंधन की दूसरी पार्टी के पक्ष में वोट डालने के लिए वोटर बहुत उत्सक नहीं रहे. कन्नौज के एक वरिष्ठ समाजसेवी अमरदेव मिश्र कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव तो दो चार दिन में निपट जाएगा. लेकिन गांव में जिस दलित नेता ने कई वर्ष की मेहनत से जो रुतबा बनाया है उसे वह यों ही क्यों यादव साहब की जेब में चला जाने देगा? ऐसी ही धारणा दूसरे पक्ष की भी होती है. इसके चलते सामंजस्य बन ही नहीं बन पाया. डिंपल की पराजय की एक बड़ी वजह यह भी रही.’

गठबंधन में मायावती के सामने हर प्रकार से नतमस्तक हो जाना भी अखिलेश यादव के लिए भारी पड़ा. तालमेल का मुद्दा हो, या सीटों के बंटवारे का या फिर गठबंधन की संयुक्त सभाओं का , हर जगह निर्णय मायावती का ही रहा. चुनाव सभाओं में अखिलेश भले ही कंधे उचका उचका कर गठबंधन के पक्ष में नोटों की बरसात का दावा करते रहे, लेकिन मायावती अर्जुन की तरह मछली की आंख पर ही नजरें गड़ाए रहीं. इसीलिए उन्होंने सहारनपुर के मुस्लिम मतदाताओं से कांग्रेस के बजाए बसपा के पाले में मतदान की अपील की तो अम्बेडकरनगर में वहीं से उपचुनाव लड़ने का दावा कर दिया. हालांकि अब मायावती अपनी जीत को भी भाजपा की साजिश बता रही हैं, यह कहकर कि ‘यूपी में गठबंधन के कुछ सीटें जीतने का सवाल है तो ये बीजेपी की सोची समझी रणनीति थी कि कुछ सीटों पर ईवीएम में गड़बड़ी न की जाए ताकि पूरा चुनाव परिणाम प्रभावित होता न दिखे.’

मायावती की इस सोच पर तो सिर्फ हंसा जा सकता है, लेकिन चुनाव चुनाव नतीजों ने यह भी साफ कर दिया है कि राजनीति में दो और दो हमेशा चार ही नहीं होते क्योंकि इस बार 2014 की तुलना में सपा और बसपा का वोट प्रतिशत भी कम हुआ है. हालांकि गठबंधन की लाभार्थी सिर्फ और सिर्फ बसपा रही जो 10 सीटों पर जीत के साथ 23 सीटों पर दूसरे नंबर पर आने में भी सफल रही. मायावती का अगला लक्ष्य अब उत्तर प्रदेश में तीन मंत्रियों सहित कुल 11 विधायकों के लोकसभा सांसद बन जाने के कारण होने वाले विधानसभा उपचुनाव में बड़ी हिस्सेदारी पाने का होगा और गठबंधन के बने रहने की पहली अग्निपरीक्षा भी यही होगी.

बहरहाल चुनाव नतीजों ने चंद्रबाबू नायडू की तरह किंग या किंगमेकर बनने के मायावती के अरमानों पर पानी फेर दिया. चुनाव नतीजों ने उत्तर प्रदेश में तीन राष्ट्रीय अध्यक्षों को आत्मसमीक्षा करने को मजबूर कर दिया है. राहुल गांधी, अजित सिंह और अखिलेश यादव को अब अपनी असफलताओं की समीक्षा खुद करनी पड़ेगी. हालांकि राजनीति में अंतिम अध्याय जैसा कुछ होता नहीं, लेकिन अगर अपने अपने गिरेबान में ठीक से झांका नहीं गया तो एक बड़ा सा फुलस्टाप तो लग ही सकता है.