‘वो इस समय उस जगह पर खड़ा है जहां से वह दुनिया भर के एवरेस्ट के दीवानों से बेहिचक कह सकता है कि आप जिस स्कूल में पढ़ाई करने आ रहे हो, मैं अब उस स्कूल का प्रिंसिपल बन गया हूं.’ 49 साल के कामी रीता शेरपा के रिकार्ड तेईसवीं बार एवरेस्ट शिखर पर जा पहुंचने के बाद कामी रीता शेरपा के एक ब्रिटिश प्रशंसक ने अपनी भावनाओं को कुछ इस तरह प्रकट किया.

यह 15 मई 2019 की बात है. उस दिन सुबह 7.50 पर जब कामी रीता शेरपा एवरेस्ट के शिखर पर थे तो उन्होंने 2018 में 22वीं बार एवरेट पर पहुंचने के अपने ही रिकार्ड को ध्वस्त कर दिया था. इसके छह दिन बाद ही खबर आई कि कामी शेरपा फिर माउंट एवरेस्ट पर पहुंच गए हैं. इस तरह हफ्ते भर से भी कम समय में उन्होंने दुनिया की इस सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ने का अपना ही रिकॉर्ड दो बार तोड़ दिया.

इस असंभव से दिखने से वाले कारनामे ने एकाएक कामी रीता शेरपा को दुनिया भर में चर्चित बना दिया. कामी शेरपा को इस बार की सफलता रूट ओपनिंग टीम के सदस्य के रूप में मिली है. यह रूट ओपनिंग टीम बेस कैंप से एवरेस्ट शिखर तक का पूरा रास्ता तैयार करके बाद में आने वाले एवरेस्ट आरोहियों की कठिनाइयों को आसान बना देती है.

कामी शेरपा से पहले एवरेस्ट पर 21 बार सफल आरोहण करने का रिकार्ड पहले अपा शेरपा और फिर उन्हीं की तरह फुरबा ताशी शेरपा के नाम पर संयुक्त रूप से था. ये दोनों ही अपनी उम्र के चलते अब पर्वतारोहण को अलविदा कह चुके हैं. लेकिन 24 बार एवरेस्ट पहुंचने का एक दुर्लभ रिकार्ड अपने नाम करने के बावजूद कामी शेरपा अभी थके नहीं हैं. इसी वर्ष मार्च में अपने 24वें एवरेस्ट अभियान की तैयारी करते हुए उन्होने कहा था, ‘मैं अभी शारीरिक तौर पर पूर्णतः मजबूत हूं और चाहता हूं कि इस बार के बाद कम से कम दो बार और सगरमाथा को नमन करूं.’ यानी वे अभी कम से कम 25 बार एवरेस्ट आरोहण का इरादा रखते हैं.

आज भले ही कामी शेरपा के चाहने वाले उन्हें एवरेस्ट स्कूल का प्रधानाचार्य जैसा मानने लगे हों, लेकिन उनकी जिंदगी हमेशा इतनी खुशनुमा नहीं थी. सोलखुम्भू घाटी के हर शेरपा बच्चे की तरह उन के बचपन के दिन भी बेहद दुश्वारियों से भरे थे. उनका जन्म सोलखुम्भू के उसी प्रसिद्ध थामे गांव में हुआ था जहां महान पर्वतारोही तेनजिंग का जन्म हुआ था जो 29 मई 1953 को एडमंड हिलेरी के साथ पहले एवरेस्ट विजेता बने थे. कामी शेरपा के परिवार का पुश्तैनी पेशा भेड़ पालन था. 1950 में जब नेपाल सरकार ने नामचे बाजार होकर दक्षिणी मार्ग से एवरेस्ट आरोहण के लिए विदेशियों को अनुमति देने की शुरुआत की तो सोलखुम्भू के शेरपाओं के लिए घर में ही पर्वतारोहण के जरिए रोजगार पाना आसान हो गया. इसके बाद कामी शेरपा के पिता एवरेस्ट के आरम्भिक शेरपा गाइडों में से एक बन गए.

कामी शेरपा को एक मठ में शिक्षा पाने के लिए भेजा गया, लेकिन वे वहां ज्यादा समय तक नहीं रह सके. 12 वर्ष की उम्र में उन्हें एक एवरेस्ट अभियान में भार ढोने का काम मिल गया. 22 वर्ष की उम्र में वे एवरेस्ट बेस कैंप में सहायक कुक के रूप में मौजूद थे. अब तक वे एक अच्छे शेरपा के तौर पर भी पहचाने जाने लगे थे. 1994 में उन्हे हाई एल्टीट्यूट वर्कर (पहले इन्हें हाई एल्टीट्यूट पोर्टर कहा जाता था) के रूप में एवरेस्ट अभियान में शामिल होने का अवसर मिला. उन्होंने इस मौके का भरपूर फायदा उठाया और एवरेस्ट शिखर पर पहली बार पहुंचने का लक्ष्य हासिल कर लिया.

1995 में कामी शेरपा को फिर एवरेस्ट जाने का मौका मिला लेकिन 8500 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचने के बावजूद अपने एक अस्वस्थ साथी की जान बचाने के लिए उन्हें वहीं से वापस लौटना पड़ा. उनके पास दो रास्ते थे. एक अपने बीमार साथी को मरने के लिए छोड़ कर खुद शिखर आरोहण का प्रयास करना और दूसरा आरोहण का प्रयास छोड़ कर अपने साथी की जान बचाना. उन्होंने बाद वाला रास्ता अपनाया.

1996 कामी शेरपा के लिए बहुत खराब साल रहा. वे कई पारिवारिक समस्याओं से घिरे रहे. लेकिन 1997 में वे दूसरी बार एवरेस्ट शिखर पर थे और इस बार वे हाई एल्टीट्यूट वर्कर की तरह नहीं बल्कि एक पर्वतारोही के रूप में शिखर पर पहुंचे थे. इसके बाद 1998 से 2000 तक फिर 2002 से 2008 तक वे लगातार हर वर्ष एवरेस्ट पर हाई एल्टीट्यूट वर्कर के तौर पर सफल आरोहण करते रहे थे. 2009 और 2010 में वे दो-दो बार एवरेस्ट विजेता बने. 2012 में कामी शेरपा को एक मौका और मिला. फिर 2013 में वे फिर दो बार एवरेस्ट फतह करने में सफल हुए. 2014 में कामी शेरपा जब एवरेस्ट अभियान के लिए निकले थे तो उनकी टीम को बेस कैंप से थोड़ा ऊपर भयानक हिमस्खलन यानि एवेलांश का सामना करना पड़ा. एवरेस्ट के अब तक के सबसे भयानक उस हिमस्खलन में 16 नेपाली हाई एल्टीट्यूट वर्कर्स को अपनी जान गंवानी पड़ी.

कामी शेरपा खुश किस्मत थे कि वे बच गए लेकिन उनके पांच अभिन्न शेरपा मित्र उनसे बिछड़ गए. उनके सबसे करीबी शेरपा पर्वतारोही फुरवा ताशी शेरपा ने हमेशा के लिए अपने बूट टांग लिए. कामी शेरपा के लिए यह बहुत बड़ा मानसिक आघात था. लेकिन उन्होंने एवरेस्ट आरोहण स्थगित हो जाने के बाद 8611 मीटर ऊंचे के-2 शिखर आरोहण के लिए मिले अवसर का पूरा उपयोग किया और इसे फतह करने में सफलता हासिल कर ली. इसके बाद 2015 में वे फिर एवरेस्ट अभियान पर पहुंच गए. लेकिन 2015 में नेपाल के भयावह भूकम्प के दौरान एवरेस्ट बेस कैंप में भी भारी तबाही हुई और 16 शेरपा हाई एल्टीट्यूट वर्कर्स सहित 18 पर्वतारोही बेस कैंप में ही दफन हो गए.

इसके बाद उस वर्ष एवरेस्ट आरोहण के सारे प्रयास रद्द कर दिए गए और कामी रीता को भारी मन से बेस कैंप से ही वापस लौटना पड़ गया. फिर उन पर परिवार और दोस्तों की ओर से तरह तरह का दबाव डाला गया कि वे अब पर्वतारोहण छोड़ दें और आराम की जिंदगी बिताएं. लेकिन पर्वतों के सम्मोहन में बंधे कामी शेरपा पर किसी दबाव का कोई असर नहीं हुआ. और वे 2016 से लेकर 2019 तक बदस्तूर फिर से हर वर्ष एकबार एवरेस्ट आरोहण करते रहे हैं. वे आठ बार 8188 मीटर ऊंचे चो ओयू शिखर पर सफल आरोहण का रिकार्ड भी अपने नाम कर चुके हैं. 2001 से यह सिलसिला शुरू हुआ और 2004, 2006, 2009, 2011, 2013, 2014 और 2016 में वे चो ओयू शिखर पर पहुंच चुके हैं. उनके नाम 8,516 मीटर ऊंचे लोत्से, 8,163 मीटर ऊंचे मनासलू और 8,091 मीटर ऊंचे अन्नपूर्णा शिखर पर आरोहण की सफलता भी दर्ज है.

कामी रीता शेरपा हर प्रसिद्ध शेरपा की तरह अपनी बचपन की जिन्दगी और अपने गरीबी के दिन नहीं भूलते. आज उनका परिवार काठमाण्डू में काफी बेहतर जिन्दगी जी रहा है. कामी रीता कहते हैं, ‘मैं नहीं चाहता कि मेरे दोनों बेटे मेरी तरह ढंग से पढ़ाई करने के अवसर पाने से वंचित रहें. हम उन्हे बेहतरीन शिक्षा दिलाने का प्रयास कर रहे हैं. हम तो बेहद गरीब थे. जिंदा रहने के लिए हमारे पास पर्वतारोहण जैसे खतरनाक पेशों के अलावा दूसरा कोई काम नहीं था. लेकिन मैं यह बिल्कुल नहीं चाहता कि मेरे बेटे आजीविका के लिए ऐसा खतरनाक काम करें.’

हालांकि कामी रीता शेरपा को अपने पेशे पर गर्व भी है. वे बेहद गर्व से कहते हैं कि उन दोनों भाइयों ने अब तक 40 बार एवरेस्ट आरोहण में कामयाबी पाई है. उनके भाई लखपा रीता शेरपा भी 17 बार एवरेस्ट आरोहण कर चुके हैं. उनके प्रशंसक उन्हे चाहे जिस रूप में देखें, वे खुद अपने बारे में बेहद विनम्रता से कहते हैं, ‘ये ठीक है कि मैं एवरेस्ट को बहुत अच्छी तरह जान गया हूं क्योंकि मैं कई बार एवरेस्ट आरोहण कर चुका हूं. मैं यह भी जानता हूँ कि किसी बार भी ऐसा हो कता है कि मैं वापस न लौट पाऊं. लेकिन मैं तो एक सैनिक की तरह हूं, जो अपने परिवार की जिम्मेदारियों और अपने देश के सम्मान के लिए लड़ता रहता है.’

अपने सहयोगियों के बीच कामी रीता शेरपा बेहद लोकप्रिय हैं. वे बेहदमिलनसार, मृदुभाषी और विनम्र हैं और एकदम सरल स्वभाव के हैं. उनकी कद काठी देखकर यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि उनके अंदर कितनी शारीरिक और मानसिक शक्ति भरी हुई है. अपनी पर्वतारोही जिंदगी से वे पूरी तरह संतुष्ट हैं. वे मानते हैं कि अब पर्वतारोहण उनके लिए आजीविका से कहीं अधिक ऐसा आनंद बन गया है जिसको वे बार बार हासिल करना चाहते हैं.

फिलहाल कामी रीता शेरपा सेवन समिट ट्रैक्स पर्वतारोहण कंपनी से 30 लाख रुपए के वेतन पर अनुबंधित हैं. इस वर्ष इसी कंपनी को दुनिया भर के एवरेस्ट आरोहियों के लिए एवरेस्ट शिखर तक का रास्ता तैयार करने का काम मिला है. इसके तहत पूरे एवरेस्ट शिखर तक रोप फिक्स करना, खतरनाक स्थानों पर सीढ़ियों के जरिए रास्ता तैयार करना और कैंप स्थलों की साफ-सफाई का काम करना होता है. इसी टीम के तहत ये सारे काम करते हुए कामी शेरपा एवरेस्ट शिखर तक पहुंचे थे. उनके सहयोगियों ने उनके प्रति सम्मान जाहिर करते हुए उन्हें यह अवसर दिया कि वे ही 2019 में सबसे पहले एवरेस्ट शिखर पर पहुंच सकें.

कामी शेरपा खुद अपनी स्थिति से पूरी तरह संतुष्ट हैं, लेकिन वे शेरपाओं के हालात से परेशान रहते हैं. उन्हें लगता है कि नेपाल सरकार शेरपाओं की ओर गंम्भीरता से ध्यान नहीं देती. शेरपा गांवों में शिक्षा के अच्छे इंतजाम नहीं हैं. उन्हें यह आशंका भी सताती है कि अगर सारे शेरपा अपने बच्चों को गांवों से दूर शहरों में, देश-विदेश में पढ़ाने के लिए और बेहतर जीवनयापन के लिए भेजते रहेंगे तो फिर पर्वतारोहण के लिए शेरपाओं को कौन याद करेगा.

हालांकि आज कामी शेरपा एवरेस्ट आरोहण का अपराजेय सा लगने वाला रिकार्ड अपने नाम कर चुके हैं, लेकिन नेपाल के शेरपाओं के लिए पर्वतारोहण में रिकार्ड बनाना एक तरह की आदत जैसी बन चुकी है. कामी शेरपा का रिकार्ड भी जल्द ही टूट सकता है क्योंकि निगमा नुरू नामक एक युवा शेरपा बड़ी तेजी से उनका पीछा कर रहे हैं. 37 वर्षीय निगमा नुरू शेरपा ने इसी वर्ष 16 मई को 21वीं बार तिब्बत की ओर से उत्तरी मार्ग से एवरेस्ट आरोहण करने में कामयाबी पाई है. नामचे बाजार के पास ही त्सो गांव में 6 नवम्बर 1981 को जन्मे निगमा, कामी शेरपा से 12 वर्ष छोटे हैं और अगर एवरेस्ट ने अवसर दिए तो वे कामी शेरपा के रिकार्ड से भी बहुत आगे बढ़ सकते हैं.

बहरहाल आज का सत्य यह है कि कामी शेरपा 24 बार एवरेस्ट शिखर पर पहुंच चुके हैं. लेकिन मनुष्य के साहस, जिजीविषा, संकल्प और हौसले की परीक्षा का एवरेस्ट जिस तरह एक मानक बन चुका है उसमें यह भी सम्भव है कि भविष्य में इस सत्य में और भी कई तरह के नए सत्य जुड़ जाएं.