गुरुवार को नरेंद्र मोदी एक बार फिर से भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेंगे. उनके मंत्रिमंडल में कौन-कौन होंगे, इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं. लोकसभा चुनावों में अपने बूते 300 से अधिक सीटों का आंकड़ा पार करने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में भी नए मोदी मंत्रिमंडल को लेकर तरह-तरह की बातें चल रही हैं. वैसे तो भाजपा के पास अपने दम पर सरकार बनाने भर संख्याबल है, इसके बावजूद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जो सरकार बन रही है, उसे खुद वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार कह रहे हैं. इस लिहाज से यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि उनके मंत्रिमंडल का स्वरूप कैसा होगा.
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए में उसके सहयोगी दलों को नए मंत्रिमंडल में कितना प्रतिनिधित्व मिल सकता है. एनडीए में भाजपा के पास सबसे अधिक सीटें महाराष्ट्र की शिव सेना और बिहार के जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के पास हैं. शिव सेना के 18 लोकसभा सांसद जीतकर आए हैं तो वहीं जेडीयू के पास 16 लोकसभा सांसद हैं. ऐसे में इन दोनों दलों को मोदी सरकार में ठीक-ठाक प्रतिनिधित्व मिलने की उम्मीद है. इन दोनों में से भी शिव सेना ने थोड़ी अधिक उम्मीदें इसलिए लगा रखी हैं, क्योंकि इसी साल महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. भाजपा नेताओं से बातचीत करने पर भी यह पता चलता है कि शिव सेना को मोदी सरकार में ठीक-ठाक प्रतिनिधित्व मिल सकता है.
लेकिन जेडीयू को लेकर तरह-तरह की बातें चल रही हैं. पार्टी को उम्मीद है कि उसे कम से कम तीन मंत्री पद मिलेंगे. एक कैबिनेट, एक स्वतंत्र प्रभार और एक राज्यमंत्री. जेडीयू के नेता इसके पक्ष में यह तर्क दे रहे हैं कि अगर छह सांसदों वाली लोक जनशक्ति पार्टी को एक कैबिनेट सीट मिल सकती है तो इस लिहाज से 16 सांसदों वाले जेडीयू को दो कैबिनेट सीट और एक राज्यमंत्री का मत तो मिलना ही चाहिए. इन नेताओं के मुताबिक अगर यह भी न हो कम से कम एक कैबिनेट सीट, एक स्वतंत्र प्रभार और एक राज्यमंत्री पद मिले. हालांकि, जेडीयू के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि सोमवार शाम तक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से नाम मांगने के लिए न तो प्रधानमंत्री की ओर से और न ही अमित शाह की ओर से कोई संपर्क किया गया था.
भाजपा में एक बात स्पष्ट तौर पर चल रही है कि इस बार मंत्रिमंडल गठन को लेकर प्रधानमंत्री या अमित शाह पर दबाव डालने की स्थिति में कोई भी सहयोगी दल नहीं है. इसलिए निर्णय पूरी तरह से नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर निर्भर करेगा. इसमें भी यह बात कही जा रही है कि जिन राज्यों में अगले एक साल में चुनाव होने हैं, उन राज्यों को थोड़ा अच्छा प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है. इन राज्यों में महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और झारखंड शामिल हैं. दिल्ली से पिछली बार चांदनी चौक के सांसद हर्षवर्धन मंत्री थे. इस बार यहां से एक और मंत्री बनाया जा सकता है. ऐसे ही हरियाणा का प्रतिनिधित्व भी बढ़ाया जा सकता है.
इसके अलावा पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां अगले साल तो चुनाव नहीं होना, लेकिन उसे मोदी मंत्रिमंडल में बहुत अच्छा प्रतिनिधित्व मिल सकता है. पश्चिम बंगाल में भाजपा को 18 सीटें मिली हैं. यहां 2021 में विधानसभा चुनाव होने हैं. लेकिन कहा जा रहा है कि पार्टी यहां प्रदेश की सत्ता में आने के लिए जो भी जरूरी हो, वह करने को तैयार है. सूत्रों के मुताबिक यहां से कुछ प्रमुख मंत्री बनाकर प्रदेश में अभी से ही विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए माहौल बनाने का काम किया जाएगा.
इस बार नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में पूर्वोत्तर का प्रतिनिधित्व भी बढ़ सकता है यहां. कई राज्यों में भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया है. त्रिपुरा की दोनों लोकसभा सीटें जीतने के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब अपने दोनों सांसदों को लेकर दिल्ली में पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों से मिले. उनके इस कदम के बारे में यह कहा जा रहा है कि वे मोदी मंत्रिमंडल में त्रिपुरा को प्रतिनिधित्व दिलाने की कोशिश में हैं. मोदी सरकार में कर्नाटक का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की बात भी चल रही है. क्योंकि वहां भी पार्टी को बड़ी सफलता मिली है और आने वाले दिनों में कभी भी कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं.
भाजपा के अंदर एक बात यह भी चल रही है कि नरेंद्र मोदी के पहले मंत्रिमंडल के कितने लोगों को दोबारा मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है. इस संबंध में कई तरह की बातें चल रही हैं. वित्त मंत्री अरुण जेटली की खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर यह कहा जा रहा है कि उन्हें मंत्रिमंडल में न शामिल करके वित्त मंत्रालय का काम पीयूष गोयल को दिया जा सकता है. वहीं सुषमा स्वराज और उमा भारती ने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने की बात कही थी. इन दोनों को दोबारा मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने को लेकर भी संशय की स्थिति बनी हुई है.
सबसे अधिक चर्चा गृह मंत्रालय को लेकर चल रही है. माना जा रहा है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह गृह मंत्री बनने के लिए इच्छुक हैं. ऐसे में सवाल राजनाथ सिंह को लेकर भी है. यह बात चल रही है कि अगर नरेंद्र मोदी अमित शाह को गृह मंत्री बनाने के लिए तैयार हो गए तो फिर राजनाथ सिंह का क्या होगा. एक चर्चा यह भी है कि प्रधानमंत्री राजनाथ सिंह को लोकसभा स्पीकर बना सकते हैं. हालांकि, पार्टी के अधिकांश नेता यह मानते हैं कि राजनाथ सिंह की दिलचस्पी लोकसभा स्पीकर बनने में नहीं होगी बल्कि गृह मंत्रालय अमित शाह के हाथ में जाने की स्थिति में वे रक्षा मंत्री बनना चाहेंगे.
नरेंद्र मोदी के पुराने मंत्रिमंडल के कुछ सहयोगियों से बात करने पर पता चलता है कि कई पुराने चेहरों को नई टीम में जगह नहीं मिल सकती है. एक मंत्री बताते हैं, ‘चुनाव परिणाम आने के बाद लोकसभा भंग करने की सिफारिश करने के लिए मंत्रिमंडल की जो बैठक हुई, उसमें प्रधानमंत्री ने यह कहा कि न्यू इंडिया की परिकल्पना को साकार करने के लिए वे कुछ बड़े बदलाव कर सकते हैं. इसके बैठक के बाद मंत्रियों में बात यह चली कि प्रधानमंत्री नए लोगों को मौका देना चाहते हैं.’ वे आगे कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री की बातों के आधार पर मेरी राय यह है कि वे इस बार 45 साल से 55 साल आयु वर्ग वाले नेताओं को अपनी टीम में खास तौर पर जगह दे सकते हैं.’
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