‘जिसको न दे मौला, उसको दे आसफुद्दौला’. लखनऊ को पुराने इलाकों में आज भी इस कहावत को बात-बात पर दोहराने वालों की कमी नहीं. अवध के नवाबों में से एक नवाब आसफुद्दौला को जितना अवध की राजधानी फैजाबाद से लखनऊ लाने के लिए जाना जाता है उससे कहीं ज्यादा अपनी जनता के सुख-दुख की चिंता करने वाले शासक के तौर पर याद किया जाता है. अवध की गंगा-जमनी तहजीब के जन्मदाता और इसके महत्वपूर्ण संरक्षक के रूप में भी उनका नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज है.

इस गंगा-जमनी तहजीब ने न सिर्फ नवाबों के दिनों में बल्कि मौजूदा दौर में भी लखनऊ को सांप्रदायिक सौहार्द और मिली-जुली संस्कृति के गुलदस्ते के रूप में बचाए रखा है. वरिष्ठ पत्रकार और अवध की संस्कृति के जानकार हुसैन अफसर कहते हैं, ‘जैसे दो दरिया अलग अलग बहते हैं और अपना रुख नहीं बदलते ठीक उसी तरह यहां हिंदू और मुस्लिम इसी तरह मिल जुल कर रहते हैं. अपने मजहब में पूरी आस्था के साथ दूसरे मजहब की इज्जत करना, यही गंगा-जमनी तहजीब है. यही कारण है कि लखनऊ में मजहबी दंगों का इतिहास नहीं मिलता.’

जाने माने फिल्मकार मुजफ्फर अली इस बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ‘यहां न गंगा बहती न जमुना. लेकिन वो बात तो है जो इसे गंगा-जमनी तहजीब का घर बनाती है. यहां मुसलमान मंदिर बनाते हैं और हिंदू इमामबाड़े.’ अवध के इतिहास के अध्येता रवि भट्ट गंगा जमनी तहजीब के लिए नवाब आसफुद्दौला के योगदान को कुछ इस तरह याद करते हैं, ‘जब 1775 में आसफुद्दौला ने लखनऊ को राजधानी बनाया तो उन्होंने फूलों की होली की परम्परा शुरू की और ये सिलसिला आज भी बरकरार है.’ आसफुद्दौला के बारे में यह भी कहा जाता है कि एक बार मुहर्रम के दौरान होली पड़ने पर भी उन्होंने होली खेलने से गुरेज नहीं किया क्योंकि होली प्रजा का त्योहार था.

9 सितम्बर 1722 को मुगल बादशाह मोहम्मद शाह ने सआदत अली खां को अवध की सत्ता सौंपी थी. 1732 में सआदत अली ने अवध के स्वतंत्र होने की घोषणा कर दी. आसफुद्दौला, सआदत खां द्वितीय और वाजिद अली शाह उन नवाबों में थे जिन्होंने गंगा-जमनी तहसील को सबसे ज्यादा बढ़ावा दिया. अवध के नवाब के तौर पर आसफुद्दौला ने 1775 में सत्ता संभाली थी. उसी साल वे अपनी राजधानी फैजाबाद से लखनऊ ले गए.

1784 में अवध में भयानक अकाल पड़ा. लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए. गरीब तो गरीब अमीरों को भी दो वक्त के निवाले के लाले पड़ गए. ऐसे कठिन वक्त में आसफुद्दौला जनता की मदद के लिए आगे आए. उन्होंने लखनऊ में एक बड़ी इमारत बनवाने का काम शुरू कर दिया. आज इस इमारत को हम लखनऊ के बड़े इमामबाड़े के तौर पर जानते हैं. कहते हैं कि इस इमामबाड़े को बनने में ग्यारह वर्ष लगे और इस पर कुल पांच लाख दस हजार रुपए का खर्च आया.

इमामबाड़े के निर्माण को लेकर तरह तरह के किस्स- कहानियां हैं. कहा जाता है कि अमीर-गरीब सबको इमामबाड़े में काम मिल सके, इसके लिए दिन में आम जनता इमामबाड़े का निर्माण करती और हर तीसरी रात अमीर लोगों को उस निर्माण को ढहा देने का काम दिया जाता. गरीब-अमीर मिला कर करीब 20 हजार लोगों को इस तरह रोजगार मिला था.

बड़ा इमामबाड़ा या आसिफी इमामबाड़ा आज भी अवध की शान बना हुआ है. इसके मुख्य वास्तुकार दिल्ली के किफायतुल्ला को माना जाता है. हालांकि इसे बनाने में ऐसे आम लोगों का सहयोग था जो वास्तुकला के जानकार नहीं थे, फिर भी यह निर्माण वास्तुकला का एक शानदार नमूना है. इसका मुख्य हाॅल 50 गुणा 16 गुणा 15 मीटर का है जो खम्भों के बिना टिका हुआ है. इसे बनाने में लखौरी ईंट, चूना, सुर्खी, सिंघाड़े का गूदा, गुड़, गोंद, बाजरे का आटे और उड़द की पिसी दाल जैसी चीजों का इस्तेमाल किया गया था.

इस इमामबाड़े के निर्माण को कई व्यंजनों से भी जोड़ा जाता है. कहते हैं कि निर्माण में लगी जनता के खाने के लिए गोश्त को खास मसालों के साथ रात भर पकाया जाता और सुबह-सुबह काम शुरू होने से पहले सबको वही गोश्त और रोटियां खाने को दी जातीं. खाली पेट यानी निहार पेट खाए जाने के कारण इस भोजन का नाम ही निहारी पड़ गया. ऐसे ही बिरयानी को भी इमामबाड़े के निर्माण से जोड़ते हुए कहा जाता है कि बहुत ज्यादा लोगों का भोजन बनने के कारण गोश्त और चावल को एक साथ पकाने का जो सिलसिला तब शुरू हुआ था वही बाद में बिरयानी की लज्जत में बदल गया.

जैसा कि पहले जिक्र हुआ कि बड़ा इमामबाड़ा बनवाने में अमीरों को मजदूरी करने में झिझक न हो, इसलिए उनके लिए रात को काम का इंतजाम किया गया था. शहर के चौक इलाके में तहसीन की मस्जिद का निर्माण भी इसीलिए करवाया गया था कि ऊंचे खानदान के जो लोग इमामबाड़े की भीड़ के बीच शर्म के कारण काम नहीं करना चाहते थे वे इस मस्जिद के निर्माण में काम कर सकें. आसफुद्दौला के करीबी दरोगा तहसीन अली खां की देखरेख में यह मस्जिद 1788 से 1794 के दौरान बनवाई गई थी.

अवध में परोपकार के लिए इस तरह के निर्माणों की सूची काफी बड़ी है. साथ ही दूसरे धर्म के प्रति सम्मान का भाव बताने वाले उदाहरणों की भी कमी नहीं है. नवाब शुजाउद्दौला ने 1739 में अयोध्या में हनुमान गढ़ी को जमीन दी थी. आसफुद्दौला ने इसके लिए धन दिया था. लखनऊ में अलीगंज के हनुमान मंदिर का निर्माण अवध की अलिया बेगम ने अपनी एक मन्नत पूरी होने के बाद करवाया था. आज इस हनुमान मंदिर की बहुत मान्यता है और जेठ में लखनऊ में बड़ा मंगल मनाने की परंपरा यहीं से शुरू हुई. बड़ा मंगल में पूरे शहर में सैकड़ों जगहों पर लोग भंडारों का आयोजन करते हैं जिनमें मुस्लिमों की भी भागीदारी रहती है.

अवध की परंपरा का एक और प्रतीक अमीनाबाद की पड़ाइन मस्जिद है. करीब पौने पांच सौ साल पुरानी इस मस्जिद को बरहानुल मुल्क की हिंदू पत्नी बेगम खदीला खानम ने बनवाया था, जिसमें महिलाओं के लिए पर्दे में नमाज की भी व्यवस्था थी. इसी तरह ठाकुरगंज में झाउलाल का इमामबाड़ा और काजमैन का निर्माण भी हिंदुओं ने ही करवाया था. टिकैतराय का इमामबाड़ा भी इसी कड़ी का एक सिलसिला है.

अवध की गंगा-जमनी तहजीव का एक रूप लखनऊ की रोजा इफ्तारी में भी देखा जा सकता है. अनेक इलाकों में हिंदू लोग मुस्लिम साथियों के साथ रोजा इफ्तार में शामिल होते हैं तो कई जगहों पर हिंदुओं की ओर से रोजा इफ्तार का इंतजाम किया जाता है. यह लखनऊ ही है जहां गुरुद्वारों मे भी रोजा खुलवाया जाता है और मंदिरों भी. पिछले वर्ष जून में रमजान के दौरान लखनऊ के प्रसिद्ध मनकामेश्वर मंदिर के आरती स्थल पर महंत दिव्य गिरि ने ऐसा ही इफ्तार आयोजन किया. इसमें 500 से ज्यादा मुस्लिमों ने आरती स्थल पर नमाज अदा की और फिर रोजा खोला.

मिल-जुलकर रहने और सामूहिक रूप से धार्मिक परंपराओं के पालन का एक और उदाहरण ‘शाही रसोई’ है. अवध के तीसरे नवाब मुहम्मद अली शाह ने छोटे इमामबाड़े का निर्माण कराया था. इस इमामबाड़े के साथ ही शाही रसोई भी बनवाई गई थी जहां रमजान और मुहर्रम में गरीबों के लिए तरह-तरह के व्यंजन बनवाए जाते थे. मुहम्मद शाह ने अपनी वसीयत यानी कार-ए-खैर में कई तरह के सामाजिक दायित्वों का उल्लेख भी किया था. उन्होंने ही हुसैनाबाद ट्रस्ट की स्थापना की और अपनी वसीयत को उसमें शामिल किया.

हुसैनाबाद ट्रस्ट आज लगभग 200 साल बाद भी शाही रसोई की परंपरा जिंदा रखे हुए है. ट्रस्ट रमजान के पूरे महीने शहर की अलग अलग दो दर्जन से अधिक मस्जिदों में हर रोज अलग अलग तरह की इफ्तारी भेजता है. नमाज के बाद रोजेदार इसी इफ्तारी से अपना रोजा खोलते हैं. इतना ही नहीं, रमजान के दिनों में शाही रसोई से हर रोज सुबह ग्यारह बजे से सैकड़ों गरीब और यतीम परिवारों को भोजन बांटा जाता है. हफ्ते में तीन दिन सालन रोटी और तीन दिन दाल रोटी. इस साल ट्रस्ट ने इस काम के लिए 18.81 लाख रुपए का इंतजाम किया. हालांकि अब यह ट्रस्ट सरकारी अधिकारियों की देख रेख में है. ट्रस्ट पर अपनी संपत्तियों को खुर्द-बुर्द करने के अनेक आरोप भी लगते रहे हैं. लेकिन गंगा-जमनी तहजीब को बचाए रखने में शाही रसोई जैसे उसके योगदान प्रशंसा पा ही जाते हैं.