1983 का क्रिकेट विश्व कप आज के जैसा नहीं था. मुझे याद नहीं पड़ता कि इंग्लैंड जाने से पहले विश्व कप की तैयारी के लिए हमारा कोई कैंप हुआ हो. उन दिनों वन डे मैच भी बहुत कम होते थे और उनके बीच में काफी अंतर हुआ करता था.

उस समय विश्व कप के दावेदारों में भारत की चर्चा दूर-दूर तक नहीं थी. इसलिए जब हम इंग्लैंड के लिए रवाना हुए तो कुछ ऐसे मूड में थे जैसे छुट्टी मनाने जा रहे हों. क्रिकेट हमारे दिमाग में सबसे ऊपर नहीं था. सनी (सुनील गावस्कर) और कपिल के अलावा हम सब का वह पहला विश्व कप था और हम में से लगभग सभी पहली बार इंग्लैंड के दौरे पर जा रहे थे.

हम वहां मैल्कम मार्शल, बॉब विलिस और जेफ थॉम्सन की बॉलिंग का सामना कैसे करेंगे, इससे ज्यादा यह सोच रहे थे कि कहां-कहां घूमने जाना है. लंदन पहुंचकर जब हमने बकिंघम पैलेस, हाइडे पार्क और ट्राफल्गर स्क्वायर देखा तो बहुत रोमांचित थे. शायद इसी ने हमारे भीतर कहीं कुछ बदल दिया.

टूर्नामेंट के अपने पहले मैच में ही हमने वेस्टइंडीज को हरा दिया. हममें से कोई इस बात पर यकीन नहीं कर पा रहा था. उसके बाद सब कुछ अपने आप सही होता गया जैसे हम किसी योजना से चल रहे हों. हालांकि ईमानदारी से कहूं तो, हमारी योजना नाममात्र ही थी, जिसमें कैप्टेन को थैंक्स बोलना और छोटी-छोटी टीम मीटिंग करना शामिल था. अब चूंकि कपिल का हाथ अंग्रेजी में थोड़ा तंग था, हिंदी भी बहुत अच्छी नहीं थी तो वो अपनी बात बस इतना कह कर खत्म करते थे, ‘शेरों जीत लो!’ यह बिल्कुल आम बात थी लेकिन इसकी वजह से हमारे ऊपर कोई दबाव नहीं रहा. इसका यह असर था कि हम टूर्नामेंट की शुरुआत से फ्री होकर खेले और आखिर में ट्रॉफी लेकर घर लौटे.

पहले मैच में वेस्टइंडीज पर हमारी जीत से पूरी दुनिया चौंक गई. इससे हम भी बहुत हैरान थे. नॉकआउट राउंड में पहुंचने की हमारी उम्मीदें तब बढ़ीं जब जिंबॉब्वे ने एक बड़ा उलटफेर करते हुए ऑस्ट्रेलिया को हरा दिया. जिंबॉब्वे की टीम का यह पहला विश्वकप था और उन्होंने अपने पहले ही मैच में ऑस्ट्रेलिया को तगड़ा झटका दे दिया. इसी दिन हमने वेस्टइंडीज को हराया था. इस जीत ने हमें भरोसा दे दिया कि जब तक हम एक साथ धराशायी नहीं होते, सेमीफाइनल तक पहुंच सकते हैं.

आने वाले मैचों में हमने ठीक यही किया. हर खिलाड़ी ने कम से कम एक मैच में बढ़िया प्रदर्शन किया. रोजर (बिन्नी) और जिमी (मोहिंदर अमरनाथ) दो ऐसे खिलाड़ी थे जो पूरे टूर्नामेंट के दौरान अच्छा खेले. बाकी सब भी उनके साथ बराबरी से खेलने की कोशिश करते रहे और हमने वो कर दिया जो किसी ने नहीं सोचा था.

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि जीत हमारी किस्मत में थी. यदि कपिल ने जिंबॉब्वे के खिलाफ वनडे की वो ऐतिहासिक पारी न खेली होती, यशपाल शर्मा और मैंने सेमीफाइनल में वो पारियां न खेली होतीं, बल्लू (बलविंदर संधू) ने वो गजब की इन स्विंगर न डाली होती जिसपर गॉर्डन ग्रीनिज आउट हुए या फिर विवियन रिचर्ड्स के उस पुल शॉट की टाइमिंग गड़बड़ न होती और कपिल देव ने उसे लपका न होता . यदि किसी तरह से ये सब न हुआ होता तो शायद हम विश्व कप भी न जीत पाते. लेकिन ये हुआ और हम जीते.

उस दिन फाइनल का एक मजेदार वाकया मैं आज भी नहीं भूला हूं. जब विवियन रिचर्ड्स हमारे बॉलरों के धुर्रे उड़ा रहे थे तो ऐसा लग रहा था कि मैच जल्दी ही खत्म हो जाएगा. मैं डीप स्क्वायर लेग पर फील्डिंग कर रहा था और मेरे पीछे ही स्टेडियम में पम्मी (मार्शनील, गावस्कर की पत्नी) बैठी थीं. उन्होंने वहीं से चिल्लाकर कहा कि मैं सुनील तक ये मैसेज पहुंचा दूं कि मैच के बाद 15 मिनट में वे उन (मार्शनील) से सेंट जॉन्स वुड में मिलें. बल्लेबाज जब स्ट्राइक चेंज कर रहे थे तब मैं दौड़कर सनी के पास पहुंचा और ये मैसेज दे दिया. लेकिन अगले ही ओवर में रिचर्ड्स आउट हो गए और मैच हमारे पक्ष में आ गया. मुझे नहीं लगता कि मैच के बाद काफी समय तक पम्मी की सुनील से मुलाकात हो पाई होगी! हालांकि उन्हें इसका बुरा नहीं लगा होगा.

1983 का विश्व कप जीतने वाली भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल रहे संदीप पाटिल ने यह लेख मूलत: ईएसपीएनक्रिकइन्फो के लिए अंग्रेजी में लिखा था.