नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार ने केंद्र में दोबारा वापसी कर इतिहास रच दिया है. इतना अभूतपूर्व जनमत तो जवाहरलाल नेहरू या फिर इंदिरा गांधी को ही मिला था. नरेंद्र मोदी के लिए यह कारनामा इसलिए भी बड़ा है कि वे पहले ग़ैर कांग्रेसी नेता हैं जो दोबारा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटे हैं.

वैसे किसी भाजपाई प्रधानमंत्री के लिए सत्ता में लौटना पहली बार नहीं हुआ है. अटल बिहारी वाजपेयी ने यह कारनामा 1996 और फिर 1998 और 1999 में दोहराया था. बस फ़र्क इतना है कि 1996 में वे महज़ 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बने और 1998 में 13 महीनों के लिए. और फिर 1999 में उन्होंने पूरे पांच सालों के लिए उन्होंने सरकार बनाई. नरेंद्र मोदी दोनों बार यानी 2014 और 2019 में प्रचंड बहुमत लाये हैं, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने को सत्ता के लिए गठबंधन यानी नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट(एनडीए) का सहारा लेना पड़ा था. इस लिहाज़ से साल 1998 के आम चुनाव भाजपा के उभार में निर्णायक कहे जा सकते हैं. आइये, इन चुनावों से पहले के हालात पर नज़र डालते हैं.

आर्थिक और राजनैतिक अस्थिरता का माहौल

1991 में कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और उनके वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने देश की अर्थव्यवस्था को उदारीकरण की राह पर डालकर नयी दिशा दी थी. लाखों नौकरियों का सृजन हुआ, देश में तरक्की हुई पर साथ ही कई सारे घोटाले भी हुए. इसकी वजह से नरसिम्हा राव को बहुत मुश्किल आई.

राव की समस्या थी कि कांग्रेस पार्टी के भीतर उनके समर्थक नहीं थे. विकल्प न होने की वजह से पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री चुना था. वे राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी थे. उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद अपनाकर प्रतिद्वंदियों को हटाया और अपना रास्ता निष्कंटक बनाया. पर घोटालों के प्रकरणों की वजह से सरकार की ऐसी-तैसी हो रही थी, उसकी साख गिर रही थी. यह तय दिख रहा था कि नरसिम्हा राव जैसे-तैसे कर पांच साल तो खींच लेंगे पर कांग्रेस अगले चुनावों में वापसी नहीं कर पाएगी.

विपक्ष का हाल

कांग्रेस की बदहाली का सीधा-सीधा फ़ायदा भाजपा को मिला क्योंकि अन्य कोई विपक्षी दल किसी मुद्दे को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में असफल रहा. कभी बोफ़ोर्स कांड के शोर-शराबे को उठाकर विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने थे. उन्होंने मंडल कमीशन की सिफ़ारिशें लागू करने का वादा भी किया था. पर ऐसा होने से पहले ही भाजपा ने उनकी सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. इसके बाद भाजपा ने राम मंदिर के मुद्दे पर ध्रुवीकरण शुरू कर दिया जिसकी शुरुआत 1990 में ही हो गई थी. फिर, दिसंबर 1991 में कारसेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढहा दी. देश में अयोध्या मुद्दा छाया हुआ था. ऐसे माहौल में भाजपा एक मज़बूत विपक्ष बनकर उभरी.

11वें आम चुनाव

कांग्रेस के कार्यकाल में हुए घोटालों की वजह से विपक्षी पार्टियों को फ़ायदा था. भाजपा ने अपने घोषणापत्र में पारदर्शी सरकार, उत्तरांचल, वनांचल, छत्तीसगढ़ और विदर्भ को अलग राज्य बनाने के साथ संविधान में कश्मीर को अलग दर्ज़ा देने वाला अनुच्छेद 370 ख़त्म करने की बात कही. पार्टी ने आर्थिक सुधार प्रक्रिया को और तेज़ करने जैसे वादे भी किए.

उधर, कांग्रेस ने ‘ग़रीबी हटाओ’ के नारे की तर्ज़ पर लगभग साढ़े छह करोड़ नयी नौकरियों, कृषि सुधार, लोकपाल, पब्लिक सेक्टर कंपनियों के पुनर्गठन और जांच एजेंसियों को स्वायत्तता देने की बात कह रही थी. उसके नेता अपनी चुनावी रैलियों में कहते फिरते कि ‘अनुभव कहता है बारम्बार, कांग्रेस ही दे स्थिर सरकार’. सुभाष चंद्र बोस के प्रसिद्ध नारे की तर्ज़ पर नरसिम्हा राव ने कहा, ‘तुम मुझे स्थिरता दो, मैं तुम्हें संपन्नता दूंगा.’ कांग्रेस ने पांच लाख ऐसे प्रचारक तैयार किये जो गांव-गांव जाकर सरकार की बात रख रहे थे.

उधर, भाजपा ने पिछले चुनाव की तरह ही इस बार भी राम मंदिर का कार्ड खेला. उसने और भी आक्रामकता के साथ राम मंदिर बनाने के नारे लगवाए. पार्टी ने ‘परिवर्तन’ की हुंकार भरते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा. उसका नारा था कि ‘हमें स्थायी सरकार के साथ जवाबदेह सरकार चाहिए’. ‘अबकी बारी- अटल बिहारी’ के नारे से देश गूंज उठा.

चुनावी आंकड़े

कांग्रेस को कुल 136 सीटें मिलीं. नेशनल फ़्रंट और लेफ़्ट फ्रंट के गठबंधन को 111 और भाजपा और उसके समर्थक दलों को सबसे ज़्यादा 186 सीटें मिलीं. इन चुनावों में सबसे अहम बात यह रही कि क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व बढ़ा. सभी क्षेत्रीय दलों ने मिलाकर 101 सीटें जीतीं. नेहरू परिवार पर कांग्रेस की निर्भरता का ही खामियाज़ा था कि मई 1991 में राजीव गांधी की मृत्यु के बाद कांग्रेस बेहद कमज़ोर हो गई. 1996 तक सोनिया गांधी ने भी राजनीति से दूरी बनाकर रखी हुई थी. इन चुनावों में कांग्रेस का कुछ वैसा ही हाल था जैसा 1977 में हुआ था. वह अब राष्ट्रव्यापी पार्टी होने का दावा नहीं कर सकती थी.

13 दिन की वाजपाई सरकार

चूंकि 186 सीटें लेकर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी इसलिए राष्ट्रपति ने उसको सरकार बनाने का न्योता दिया. यह उसके लिए इस तरह का पहला मौका था. 1980 में अपने वजूद में आने के बाद पहली बार भाजपा की सरकार बनने जा रही थी. पर दिक्कत इस बात की थी कि उसके पास बहुमत नहीं था. इसे संसद में सिद्ध करने के लिए उसे 13 दिन का समय दिया गया .

भाजपा ने जीतोड़ कोशिश करके क्षेत्रीय पार्टियों को मिलाने की कोशिश की. पार्टी के मैनेजरों को एकबारगी यकीन भी हो गया कि उनके पास वह जादुई आंकड़ा आ गया है. पर तमाम विपक्षी पार्टियों ने मानो एकजुट होकर भाजपा को 272 का आकंड़ा नहीं छूने दिया. 28 मई, 1996 को सरकार गिर गई.

यूनाइटेड फ़्रंट की सरकार

भाजपा की सरकार गिरने के बाद राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने यूनाइटेड फ़्रंट को सरकार बनाने का न्यौता दिया. उसे कांग्रेस ने समर्थन दिया. एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने. हालांकि इस समीकरण में तनानती चलती रही और देवगौड़ा के बाद इंद्र कुमार गुजराल ने प्रधानमंत्री पद संभाला. यह सरकार लगभग दो साल चली. 1998 में कांग्रेस ने लेफ़्ट फ़्रंट की सहयोगी पार्टी डीएमके का राजीव गांधी हत्याकांड में नाम आने से समर्थन वापस ले लिया. इससे सरकार गिर गई. चूंकि किसी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था, इसलिए अगले आम चुनाव की घोषणा हो गई. ग्यारहवीं लोकसभा का कार्यकाल 15 मई, 1996 से लेकर चार दिसम्बर, 1997 तक रहा.

1998 और बारहवीं लोकसभा का चुनाव

चुनावी आंकड़ों के हिसाब से देश में कुल 65 करोड़ मतदाता प्रत्याशियों की क़िस्मत का फैसला करने वाले थे. तकरीबन 61 फीसदी मतदान हुआ. 543 सीटों के लिए 176 पार्टियों के 4,750 प्रत्याशी मैदान में थे. राष्ट्रीय स्तर की सात और बाकी स्थानीय पार्टियां थीं. औसतन 8.75 प्रत्याशी हर सीट पर थे. 1998 में एक बार फिर भाजपा को सबसे ज़्यादा (182) सीटें मिलीं. यूं तो कांग्रेस और भाजपा का वोट प्रतिशत करीब-करीब समान रहा, पर भाजपा को 41 सीटें ज़्यादा मिलीं.

वाजपेयी को दूसरा मौका

एक बार फिर राष्ट्रपति ने भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. सहयोगी दलों की मदद से वह इस मकसद में कामयाब हुई. भाजपा आज की तरह तब भी एनडीए का मुख्य घटक दल थी. 1998 में इसके साथ अन्य दल थे- समता पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, बीजू जनता दल, शिव सेना, नेशनल तृणमूल कांग्रेस, जनता पार्टी, मिज़ो नेशनल फ़्रंट, एनटीआर तेलगु देशम पार्टी (एलपी), हरियाणा विकास पार्टी, एआईएडीएमके और तमिलनाडु की ही पीएमके.

कुल मिलाकर यह 24 पार्टियों की सरकार थी जिसके मुखिया अटल बिहारी वाजपेयी थे. इतने सारे दलों को साथ लेकर चलना कोई आसान काम नहीं होता. हर पार्टी का अपना मिज़ाज था. यह वाजपेयी का व्यक्तित्व ही था जो इसे संभाल रहे थे. पर एक रोज़ एआईडीएमके की सर्वेसर्वा जयललिता ने किसी बात पर एनडीए से बाहर निकलने का फ़ैसला कर लिया. इससे एनडीए गठबंधन अल्पमत में आ गया. अटल बिहारी वाजपेयी को संसद में बहुमत सिद्ध करने को कहा गया. उनके सबसे विश्वस्त पॉलिटिकल मैनेजर प्रमोद महाजन की ज़मीन-ओ-आसमान मिलाने की कोशिश बेकार हुई. वोटिंग होने से पहले वाजपेयी ने सांसदों को अंतरात्मा की आवाज़ पर वोट देने को कहा. लेकिन राजनीति में अंतरात्मा सब कुछ नहीं होती. 13 महीने पुरानी सरकार एक वोट से गिर गई. अटल बिहारी वाजपेयी पहले 13 दिन के लिए और अब महज़ 13 महीनों के लिए प्रधानमंत्री रह पाए.

इसके बाद केआर नारायण ने कांग्रेस से फ्लोर टेस्ट को कहा. सोनिया गांधी ने इससे इनकार कर दिया. 10 मार्च, 1998 को शुरू हुई बारहवीं लोकसभा 27 अप्रैल, 1999 को भंग हो गई और अगले आम चुनाव की घोषणा हो गई. इस बार भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए ने सरकार चलाने लायक बहुमत हासिल किया और तब पांच सालों के लिए सरकार चल पाई.