क्या आने वाले पांच सालों में हिंदी सिनेमा खुलकर वह कर पाएगा जो कला का एक क्षेत्र होने के नाते उसे करना चाहिए, या वह करना चाहता है? या फिर सिनेमा के बड़े-बड़े महारथियों को भी सेंसर बोर्ड से लेकर समाज, सोशल मीडिया और सरकार तक से यह फिर से सीखना होगा कि सिनेमा कैसे बनाया जाता है?

मोदी सरकार के पहले पांच वर्षीय कार्यकाल में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जो इस तरह के सवाल कई लोगों के मन में उठा सकते हैं. इस मामले में साफ-साफ कुछ कह पाना तो अभी असंभव है. लेकिन निकट भविष्य में कुछ फिल्में और वेब सीरीज ऐसी आने वाली हैं जिन पर मिलने वाली प्रतिक्रियाओं से आने वाले समय का कुछ अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है. और इससे भी कि हम सिनेमा से जुड़े उन कुछ लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं जो वर्तमान सत्ता के साथ ज्यादा सहानुभूति नहीं रखने के लिए जाने जाते रहे हैं.

सेक्रेड गेम्स सीजन 2

नेटफ्लिक्स की बहुप्रशंसित और हर दिल अजीज हिंदुस्तानी वेब सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ के पहले सीजन की एक प्रमुख थीम ‘हिंदू आतंक’ भी थी. मुंबई का इतिहास दिखाने वाले हिंदी सिनेमा में अक्सर अंडरवर्ल्ड की कहानी कहते वक्त मुस्लिम आंतकवाद के उभार की कहानी कहने का चलन रहा है. लेकिन विक्रम चंद्रा के उपन्यास पर आधारित ‘सेक्रेड गेम्स’ गणेश गायतोंडे नाम के एक हिंदू डॉन की टेक लेकर मुंबई में उपजे हिंदू आतंक के इतिहास को रेखांकित किया था. उसने अपने किरदारों के मार्फत बताया था कि राजनीति और अंडरवर्ल्ड के गठबंधन ने कैसे एक धर्म को कट्टर और असहिष्णु चेहरा दे दिया है.

अब जब ‘सेक्रेड गेम्स’ का दूसरा सीजन नेटफ्लिक्स पर प्रसारित होने से कुछ ही महीने दूर है, सवाल उठना लाजिम है कि क्या इस बार इसको लेकर पिछली बार से ज्यादा हंगामा खड़ा होगा? क्या इस पर एंटी-हिंदू, एंटी-ब्राह्मण, प्रो-मुसलमान होने के आरोप लगेंगे और कई कोर्ट केस दर्ज होंगे? नए सीजन के लिए पंकज त्रिपाठी के गुरुजी नामक किरदार का पीले वस्त्रों में लिपटा लुक रिलीज कर नेटफ्लिक्स जता चुका है कि तमाम राजनीतिक सरगर्मियों के बावजूद इस बार ‘सेक्रेड गेम्स’ का मुख्य प्लॉट पॉइंट हिंदू टेरर ही रहने वाला है. और गायतोंडे के ‘तीसरे बाप’ गुरुजी की मदद से एक हिंदूवादी संगठन कोई छोटा-मोटा बम धमाका नहीं, बल्कि न्यूक्लियर एक्सप्लोजन करने का इरादा रखता है.

भगवा आतंकवाद और हिंदू टेरर को सिरे से नकारने के लिए ही भाजपा और नरेंद्र मोदी ने मालेगांव धमाकों में आरोपित प्रज्ञा ठाकुर सिंह को भोपाल से चुनाव लड़वाया था. ऐसे में हिंदू टेरर को आधार बनाकर जब यह बहुप्रतीक्षित और बहुचर्चित वेब सीरीज एक ऐसे मंच पर रिलीज होगी जिस पर सेंसर बोर्ड का कोई नियंत्रण नहीं है, तो क्या दक्षिणपंथी विचारधारा के समर्थक ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का सम्मान करेंगे या फिर ‘क्वांटिको’ के स्तर का विरोध यहां भी देखने को मिलेगा?

पिछले साल प्रियंका चोपड़ा की अमेरिकी टीवी सीरीज ‘क्वांटिको’ के केवल एक एपीसोड में एक हिंदू राष्ट्रवादी द्वारा न्यूयॉर्क को न्यूक्लियर बम से उड़ाने की साजिश रचने का एक ‘हिंदू टेरर प्लॉट’ दिखाया गया था. लेकिन हिंदुओं को आतंकवाद में लिप्त दिखाए जाने की वजह से उमड़े जनाक्रोश के चलते यह सीरीज बनाने वाले दिग्गज अमेरिकी स्टूडियो एबीसी को न सिर्फ प्रियंका चोपड़ा का बचाव करना पड़ा था बल्कि सार्वजनिक रूप से माफी तक मांगनी पड़ी थी. क्या ‘सेक्रेड गेम्स’ के सीजन 2 की रिलीज के बाद इतिहास खुद को फिर से दोहराएगा?

लैला

नेटफ्लिक्स की अगली मौलिक हिंदुस्तानी वेब सीरीज का नाम है ‘लैला’. यह हिंदुस्तानी पत्रकार प्रयाग अकबर की 2017 में आई पुरस्कृत नॉवल ‘लैला’ पर आधारित है. इसे दीपा मेहता ने बनाया है और नेटफ्लिक्स पर यह 14 जून को रिलीज होगी.

मशहूर अमेरिकी सीरीज ‘द हैंडमेड्स टेल’ के मिजाज की नजर आ रहीं हुमा कुरैशी अभिनीत इस सीरीज में हिंदुस्तान के ऐसे स्याह भविष्य की कल्पना की गई है जिसमें ‘आर्यावर्त’ नामक एक सल्तनत में तानाशाह और सर्वाधिकारवादी हुकूमत का कब्जा है. इसमें केवल हिंदू धर्म के ‘शुद्ध रक्तधारी’ अनुयायियों को ही सम्मान से जीने का हक हासिल है. यहां जात-पांत और धर्म के नाम पर लोग ऊंची-ऊंची दीवारों से घिरी मुख्तलिफ कॉलोनियों में रहने को मजबूर हैं और रक्त की शुद्धता बनाए रखने के लिए आपस में इनका संपर्क न के बराबर है.

छह एपीसोड की इस सीरीज में नायिका शालिनी एक मुसलमान से शादी करती है. इस तानाशाह हुकूमत में ऐसी गैरवाजिब मानी जाने वाली शादियों से पैदा हुई मिश्रित संतानों को परिवारों से छीन लिया जाता है. ‘लैला’, एक हिंदू राष्ट्र में नायिका शालिनी (हुमा कुरैशी) द्वारा अपनी ऐसी ही ‘मिश्रित’ बेटी को ढूंढ़ने की तकलीफदेह कहानी कहने वाली है.

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दक्षिणपंथी विचारधारा के समर्थक वैसे भी नेटफ्लिक्स के देसी कंटेंट के लंबे समय से आलोचक रहे हैं. चाहे ‘सेक्रेड गेम्स’ हो या ‘घूल’, उन्हें लगता रहा है कि यह मंच हिंदूओं की स्वच्छ-साफ छवि पेश नहीं करता. ऐसे में श्रेष्ठता की सनक वाले नए भारत की मारक सोशल-पॉलिटिकल कमेंट्री करने वाली ‘लैला’ क्या एक बार फिर मोदी समर्थकों को नाराज करने वाली है? क्या ‘सेक्रेड गेम्स’ से पहले यही वह सीरीज होगी जिस पर हिंदू-फोबिया का इल्जाम लगेगा और नेटफ्लिक्स व एमेजॉन प्राइम जैसी ऑनलाइन स्ट्रीमिंग सर्विसिज को सेंसरशिप के दायरे में लाने की मांग उग्र हो जाएगी? या फिर ‘सिनेमाई अभिव्यक्ति की आजादी’ के पक्ष में खड़े होने की शुरुआत मोदी सरकार 2.0 में इसी वेब सीरीज से होगी? हमें जल्द पता चलेगा.

ऑनलाइन मंचों पर सेंसरशिप?

काफी लोग कयास लगाने लगे हैं कि वह वक्त अब दूर नहीं जब नेटफ्लिक्स, एमेजॉन प्राइम और हॉटस्टार जैसी ऑनलाइन स्ट्रीमिंग सर्विसिज को भी सेंसर बोर्ड की जद में लाने के प्रयास तेज कर दिए जाएंगे. ऐसे लोगों का मानना है कि इस सेंसरशिप को लागू करने की वजह केवल बोल्ड सीन्स या श्लील-अश्लील की डिबेट नहीं होगी, बल्कि ‘सेक्रेड गेम्स’, ‘घूल’ और ‘लैला’ जैसी वेब सीरीज में मौजूदा बंटे हुए हिंदुस्तान की सोशल-पॉलिटिकल कमेंट्री करना इसकी मुख्य वजह बनेगी.

हिंदुस्तान में पिछले पांच सालों में वैसे भी इंटरनेट सेंसरशिप में भारी बढ़ोतरी देखने को मिली है. ढेर सारी पॉर्न और टॉरेंट वेबसाइट्स पर प्रतिबंध लगाने के अलावा सरकार ने फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप पर भी कुछ हद तक अपना नियंत्रण चाहा है. कानून बनाकर इंटरनेट को नियंत्रित करने की कोशिशें मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में हो चुकी हैं, इसलिए कई लोगों को डर है कि दूसरे कार्यकाल में भी इस दिशा में दोगुनी गति से काम किया जा सकता है.

लेकिन, ऐसी सेंसरशिप लागू करते ही विश्व-भर में हिंदुस्तान की छवि चीन जैसी बन जाएगी. इंटरनेट सेंसरशिप को लेकर चीन विश्व-भर में कुख्यात है और ‘इंटरनेट फ्रीडम’ वहां के नागरिकों को नसीब नहीं है. मोदी सरकार 2.0 का सपना जिस ‘नए भारत’ की रचना करना है उसको साकार करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच भारत की बेहतर छवि बने रहना बेहद जरूरी है. ऐसे में ऑनलाइन मंचों पर सेंसरशिप का बोझ डालना हमारे मजबूत लोकतंत्र की छवि को दागदार करेगा और उम्मीद है कि ऐसा कोई कदम मोदी सरकार नहीं उठाएगी.

प्रोपेगेंडा फिल्मों की सुनामी?

यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि अब प्रोपेगेंडा फिल्मों की सूनामी आ सकती है. तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करने वालीं और शख्सियतों के काले अध्याय को व्हाइटवॉश कर उन्हें महिमामंडित करने वाली प्रोपेगेंडा फिल्में अब लगातार बनती दिख सकती हैं.

यह सोचना अतिश्योक्ति इसलिए नहीं है कि अकेले 2019 के शुरुआती पांच महीनों में ही आधा दर्जन प्रोपेगेंडा फिल्में रिलीज हो चुकी हैं! ‘उरी’, ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ और ‘ठाकरे’ से लेकर ‘द ताशकंद फाइल्स’ और ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ जैसी फिल्में न सिर्फ सत्ता प्रतिष्ठान के पक्ष में माहौल बनाने के काम आ चुकी हैं, बल्कि दक्षिणपंथी विचारधारा, उस विचारधारा से जुड़ी शख्सियतों और उसी विचारधारा से जुड़ी कॉन्स्पिरेसी थ्योरीज को बढ़-चढ़कर बढ़ावा देती हुई मालूम हुई हैं. ‘उरी’ और ‘द ताशकंद फाइल्स’ की बॉक्स-ऑफिस सफलता ने साफ भी कर दिया है कि बेहतर बनी प्रोपेगेंडा फिल्में इस देश में हाथों-हाथ स्वीकारी जाने लगी हैं.

अगर ऐसा चलन आगे भी देखने को मिलता है, तो अपनी-अपनी ‘गूगल सर्च स्किल्स’ पर काम कर लेना बेहतर रहेगा. गूगल सर्च करने से सच और झूठ के बीच फर्क करना आसान हो जाता है!

हिस्टॉरिकल ड्रामा फिल्मों में मुस्लिम पात्रों का चित्रण और राष्ट्रवाद की थीम

इतिहास को लेकर सिनेमा के माध्यम में पिछले कुछ सालों से काफी छेड़छाड़ हुई है. ‘पद्मावत’ में इतिहास को परे रखकर खिलजी को घनघोर शैतान चित्रित किया गया था. ‘केसरी’ में अपनी जमीन की रक्षा कर रहे अफगान कबीलों को घोर दुर्दांत दिखाया गया था. ‘मणिकर्णिका’ में आज के दौर का राष्ट्रवाद झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन में हस्तांतरित करने की कोशिश की गई थी.

तो क्या अगले पांच साल में बनने वालीं हिस्टॉरिकल ड्रामा फिल्में भी मुस्लिम पात्रों को स्टीरियोटाइप्ड करने को फायदे का ही सौदा समझेंगी? राष्ट्रवाद की मौजूदा परिभाषा को कभी दशकों तो कभी सदी भर पुरानी ऐतिहासिक कथाओं में ठूंसती रहेंगी? आने वाले समय में आशुतोष गोवारिकर की ‘पानीपत’ से लेकर अजय देवगन की ‘तानाजी’, विकी कौशल की ‘उधम सिंह’, अक्षय कुमार की महाराणा प्रताप पर बनने वाली अनाम फिल्म और दाराशिकोह व औरंगजेब की कहानी कहने वाली ‘तख्त’ जैसी हिस्टॉरिकल फिल्मों को इतिहास की कसौटी पर तोलना इन सवालों के जवाब जरूर देगा.

और, क्या आफत केवल मुस्लिम शख्सियतों को लेकर आएगी? या जो भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व दक्षिणपंथी विचारों के अनुरूप नहीं रहेगा उसे भी बदलने की कोशिश होती रहेगी? ऐसे सवाल सती प्रथा और राजा राममोहन राय से जुड़े ताजा विवाद के बाद दोबारा उठने लगे हैं. इन दिनों ट्विटर पर सती प्रथा का गुणगान करने वाले लोग सक्रिय हो चुके हैं (किसने सोचा था कि कभी ऐसा दिन भी आएगा!) और राजा राममोहन राय जैसे जहीन समाज सुधारक को ‘अंग्रेजों का चमचा’ बताया जा रहा है. क्या इतिहास का ऐसा शर्मनाक चीर-हरण भी किसी दिन हिंदी फिल्मों में शामिल मिलेगा? पता नहीं.

प्रतिकार करने वाले सितारों का और तेज होगा विरोध?

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक तरफ तो प्रो-मोदी सितारों और फिल्मकारों का बोलबाला है और वे ट्विटर पर भी प्रधानमंत्री के समर्थन में खूब बोलते हैं. लेकिन जावेद अ ख्तर, अनुराग कश्यप, वरुण ग्रोवर, स्वरा भास्कर, रिचा चड्ढा जैसे जो चुनिंदा सितारे और लेखक-फिल्मकार जब अपनी बात रखते हैं उन्हें घोर अपमानजनक ट्रोलिंग से गुजरना पड़ता है.

2019 के लोकसभा चुनाव में जावेद अख्तर और स्वरा भास्कर ने खुलकर दक्षिणपंथी राजनीति का प्रतिकार किया था और बॉलीवुड के पॉलिटिकल एक्टिविज्म को एक नया अर्थ दिया था. स्वरा भास्कर अपने साक्षात्कारों में यहां तक बता चुकी हैं कि कन्हैया कुमार से लेकर आतिशी मार्लेना तक का प्रचार-प्रचार करने की वजह से उनके हाथों से कई ब्रांड एंडोर्समेंट छिन चुके हैं. भाजपा द्वारा लोकसभा चुनाव जीतने के तुरंत बाद ही सोशल मीडिया पर उन्हें ‘पनौती’ बताकर अपमानित करने का दौर तक चल पड़ा था. क्योंकि उन्होंने जिन भी उम्मीदवारों के समर्थन में रैलियां की वे सभी चुनाव हार गए.

क्या इससे प्रतिकार करने वालों को ट्रोलिंग नाम की ऑनलाइन हिंसा से ऐसे ही जूझते रहना होगा? या फिर इसका थोड़ा सा स्थान दोतरफा और रचनात्मक संवाद को भी मिलेगा? इन सवालों का जवाब भी वक्त ही देगा.