लोकसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं. प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल शपथ ले चुका है. यानी चुनावी राजनीतिक कौतुक फिलहाल खत्म हो चुके हैं और अब अर्थव्यवस्था पर बात करने का समय है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक तीन से छह जून के बीच होने वाली है. आर्थिक विश्लेषक मान रहे हैं कि आरबीआई इस बैठक में रेपो रेट (कम अवधि के कर्जों पर आरबीआई द्ववारा बैंकों से वसूली जाने वाली ब्याज की दर) 25 बेसिस प्वाइंट (.25 प्रतिशत) कम कर सकती है.

आरबीआई की ब्याज दरों के सस्ता होने से आम उपभोक्ता के होम लोन और आटो लोन की ईएमआई भी सस्ती होने की संभावना से अखबार भरे पड़े हैं. सीधा सा गणित यह भी कहता है कि इसका देश की विकास दर पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है. लेकिन अर्थव्यवस्था की जटिलता में जाने पर यह कहानी उतनी सीधी नजर नहीं आती, जितनी अखबार की सुर्खियों में दिखती है. सैद्धांतिक तौर पर एमपीसी के रेट कट का फैसला महंगाई दर पर निर्भर करता है. महंगाई दर के अधिक होने पर एमपीसी ब्याज दरों को बढ़ाकर कर्ज महंगे करती है. इससे नगदी के प्रवाह में कमी आती है और चीजों की मांग और दाम घटते हैं. इसके, उलट महंगाई के नियंत्रित होने की स्थिति में आरबीआई कर्ज सस्ते कर बाजार में नगदी का प्रवाह बढ़ाती है ताकि मांग और वृद्धि दर बढ़ सकें.

चुनाव के ठीक बाद होने जा रही जून की इस एमपीसी बैठक के सामने जरा अलग किस्म की चुनौतियां हैं. पिछली कई बैठकों में एमपीसी को महंगाई के मोर्चे पर काफी राहत थी. महंगाई दर, आरबीआई के तय लक्ष्य से काफी नीचे चल रही थी. जिससे उसे ब्याज दरों की कटौती करने में कोई खास मुश्किल नहीं आई. लेकिन, इस समय महंगाई आरबीआई के तय लक्ष्य (चार फीसद) से ज्यादा भले न हो, लेकिन उसके बढ़ने की आशंका लगातार जताई जा रही है. अप्रैल में खुदरा महंगाई दर (सीपीआई) छह महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंचकर 2.92 फीसद हो गई है. हालांकि, रिजर्व बैंक के चार फीसद के लक्ष्य से यह अभी भी कम है, लेकिन जानकार मान रहे हैं कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, औसत मानसून की संभावना के चलते यह निकट भविष्य में तेजी से बढ़ सकती है.

इसके अलावा, देश की अर्थव्यवस्था में लगातार घटती मांग एक बड़ी समस्या है. यह बिंदु सीधे देश की आर्थिक वृद्धि से जुड़ा हुआ है. आटोमोबाइल सेक्टर से लेकर ,उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र तक में मांग बुरी तरह प्रभावित हुई है. औद्योगिक उत्पादन और निवेश की रिपोर्ट्स भी बेहतर नहीं हैं. ऐसे में ये क्षेत्र कर्ज सस्ते होने का इंतजार कर रहे हैं. आर्थिक वृद्धि को गति देने की चिंता सरकार को भी होगी. ऐसे में यह माना जा रहा है कि एमपीसी नगदी का प्रवाह बढ़ाने के लिए ब्याज दर में कटौती कर सकती है. समाचार एजेंसी रायटर्स, ने इस बारे में आर्थिक जानकारों के बीच एक सर्वे कराया है. इसमें ज्यादातर ने राय जताई कि आरबीआई अपनी ब्याज दरें 25 बेसिस प्वाइंट घटाएगा. स्टेट बैंक आफ इंडिया ने भी अपनी रिपोर्ट में ब्याज दरें घटाने और महंगाई के बजाय मंदी के हालात से निपटने पर जोर दिया है.

यानी एमपीसी ब्याज दरें घटाएगी, यह तय लगता है, लेकिन उसकी वजह महंगाई नहीं बल्कि आर्थिक रफ्तार की चिंता होगी. तो क्या यह मान लिया जाए कि अब एमपीसी रेट कट के फैसले महंगाई से ज्यादा आर्थिक वृद्धि को देखते हुए करेगी? 2016 में एमपीसी के बनने के बाद से नीतिगत दर बढ़ाने या घटाने के फैसले खालिस महंगाई दर पर ही आधारित रहे हैं. लेकिन आरबीआई से उर्जित पटेल के इस्तीफे के बाद यह तरीका बदलता दिखा.

शक्तिकांत दास के आरबीआई गवर्नर बनने के बाद जब ज्यादातर अर्थशास्त्री मान रहे थे कि महंगाई भले ही नियंत्रण में है, लेकिन उसके व्यापक परिदृश्य को देखते हुए ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा. लेकिन, सभी कयासों को धता बताते हुए एमपीसी ने फरवरी 2019 में ब्याज दर 6.5 से घटा 6.25 फीसद कर दी. इसके बाद अप्रैल में भी ब्याज दरें घटाईं गईं. चुनाव से पहले की इस कटौती को कुछ आलोचकों ने ‘इलेक्शन कट’ तक कहा था और इसे सस्ते कर्ज से सुस्त अर्थव्यवस्था में थोड़ी रंगत डालने की कोशिश माना गया.

जबकि, उर्जित पटेल के समय तक आरबीआई अपने महंगाई दर वाले फ्रेम वर्क पर ही अडिग था. रुपये की लगातार गिरती कीमत के बीच भी जब ब्याज दर नहीं बढ़ाई गईं थी तो उर्जित का जवाब था कि एमपीसी का काम महंगाई नियंत्रित रखना है, रुपये की विनिमय दर नहीं. लेकिन, शक्तिकांत दास इस मत के विपरीत दिखते हैं. उनका रूख आर्थिक वृद्धि को समर्थन करने वाला दिखता है जो सरकार के भी अनुकूल बैठता है.

खैर, जून की आगामी एमपीसी की बैठक के लिहाज से देखें तो तकनीकी तौर पर महंगाई नियंत्रित है, लेकिन उसके बढ़ने की पूरी संभावना है. आर्थिक जानकारों का एक खेमा मानता है कि महंगाई बढ़ने की आशंका को देखते हुए एमपीसी परंपरागत आधार पर निर्णय करे तो उसे कर्ज की दर यथावत रखनी चाहिए. लेकिन, विश्लेषकों का मानना है कि वह ब्याज दरों में कमी करेगी ही क्योंकि उसकी नजर महंगाई पर समग्र नियंत्रण से ज्यादा आर्थिक वृद्धि पर है. यह बात नवनिर्वाचित सरकार को फौरी राहत देने वाली है क्योंकि सस्ते कर्ज से अर्थव्यवस्था कुछ न कुछ रफ्तार तो पकड़ेगी ही.

खैर, अगर इस बार ब्याज दरों में कटौती होती है तो यह लगातार तीसरी कटौती होगी और ईएमआई एक बार और सस्ती होंगी. लेकिन, कुछ जानकार मान रहे हैं कि जून की एमपीसी में ब्याज दरों में कटौती शायद 2019-20 के वित्तीय वर्ष में आखिरी कटौती हो क्योंकि खराब मानूसन और ईंधन की कीमतें इस साल अपना रंग दिखा सकती हैं. इनके चलते हेडलाइन मुद्रास्फीति पांच फीसद को पार कर सकती है. एक अनुमान के मुताबिक, 2019 में औसत महंगाई दर 4.2 फीसद रह सकती है, जबकि 2020 में इसके 5.3 फीसद पहुंच जाने का अनुमान है. ऐसे में महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए या तो ब्याज दरें बढ़ेंगीं या जैसी की तैसी रहेंगी. क्योंकि महंगाई के इस स्तर पर उसकी उपेक्षा करना संभव नहींं होगा.

लेकिन, इन सबसे ज्यादा जरूरी है, आरबीआई का अपनी नीतियों में पारदर्शिता लाना. एमपीसी ब्याज दरों में कटौती किस फ्रेमवर्क के आधार पर कर रही है, यह स्पष्ट होना चाहिए. वर्ना आरबीआई पर सरकारी दखल के आरोप लगते रहेंगे.