प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल में जो मंत्रिमंडल बनाया है, उसके जरिए उन्होंने कई राजनीतिक संकेत दिए हैं. पहले कार्यकाल में नरेंद्र मोदी की टीम में जो मंत्री थे उनमें से 37 उनकी नई टीम में नहीं हैं. वहीं नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल के लिए जो टीम बनाई है, उसमें उन्होंने 24 नए लोगों को जगह दी है. इस टीम के गठन को ध्यान से देखने पर पांच राजनीतिक संकेत स्पष्ट तौर पर दिखते हैं.

क्षेत्रीय संतुलन

नरेंद्र मोदी ने अपने नए मंत्रिमंडल में क्षेत्रीय संतुलन साधने की पूरी कोशिश की है. जिन राज्यों से भारतीय जनता पार्टी को सीटें मिली हैं और जिन राज्यों में उसके विस्तार की संभावना है, उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में जगह दी है. उत्तर प्रदेश से 10 तो महाराष्ट्र के सात प्रतिनधियों को नए मंत्रिमंडल में जगह मिली है. वहीं केरल जैसे राज्य में जहां भाजपा का कोई सांसद नहीं है, वहां के केवी मुरलीधरन को भी केंद्र में मंत्री बनाया गया है. तेलंगाना का प्रतिनिधित्व भी मोदी मंत्रिमंडल में है. जिन बड़े राज्यों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिला है उनमें तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश प्रमुख हैं. लोकसभा चुनावों में इन दोनों राज्यों में भाजपा का खाता नहीं खुला है. भाजपा को अपने बूते 300 से अधिक सीटें मिलने की वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास यह सुविधा रही कि वे क्षेत्रीय संतुलन साधने के लिए सहयोगी दलों के बजाय अपनी ही पार्टी के नेताओं को मंत्री बनाएं.

चुनावी राज्यों की सुध

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी टीम बनाते वक्त उन राज्यों का भी खास ध्यान रखा है जहां अगले एक साल में विधानसभा चुनाव होने हैं. इसी साल महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं. इसके अलावा कर्नाटक में चुनाव की स्थिति कभी भी बन सकती है. इसलिए इन राज्यों के राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से प्रधानमंत्री ने अपना नया मंत्रिमंडल बनाया है.

झारखंड में विधानसभा चुनावों में आदिवासी समाज को अपने साथ बनाए रखने के मकसद से पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को केंद्रीय मंत्रिमंडल में बतौर कैबिनेट मंत्री शामिल किया गया है. इसी तरह से हरियाणा को भी खासा महत्व दिया गया है. महाराष्ट्र और कर्नाटक से भी मंत्रियों की संख्या बढ़ी है. भाजपा में कहा तो यह भी जा रहा है कि इकलौते सांसद वाली रिपब्लिकन पार्टी के रामदास अठावले का मंत्री पद इसलिए बच गया क्योंकि महाराष्ट्र में इसी साल चुनाव होने हैं. महाराष्ट्र के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रावसाहब पाटिल दानवे को केंद्र में मंत्री बनाया गया. बिहार से नीतीश कुमार का जनता दल यूनाइटेड सरकार से बाहर रहा, लेकिन नरेंद्र मोदी ने बिहार के पांच नेताओं को अपने मंत्रिमंडल में जगह दी. इनमें बिहार प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष नित्यानंद राय शामिल हैं. अगले साल बिहार में भी विधानसभा चुनाव होने हैं.

प्रदर्शन को तरजीह

नरेंद्र मोदी ने अपने नए मंत्रिमंडल में प्रदर्शन को तरजीह दी है. जिन मंत्रियों के बारे में यह धारणा रही है कि पहले कार्यकाल में उनका प्रदर्शन ठीक रहा है, उन लोगों को फिर से मोदी की नई टीम में जगह मिली है. इनमें कई चेहरे विवादास्पद जरूर हैं, लेकिन बतौर मंत्री उनका कामकाज ठीक रहा है. उदाहरण के तौर पर नितिन गडकरी, निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल, धर्मेंद्र प्रधान, स्मृति ईरानी जैसे नेताओं का नाम लिया जा सकता है.

वहीं अच्छा प्रदर्शन करने वाले कुछ मंत्रियों को प्रधानमंत्री ने प्रमोशन भी दिया है. इनमें ​गिरिराज सिंह और गजेंद्र सिंह शेखावत राज्य मंत्री से कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं. वहीं संतोष गंगवार, राव इंद्रजीत सिंह और मनसुख मांडविया को राज्य मंत्री पद से प्रोन्नति देकर इन्हें स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्री के तौर पर शपथ दिलाई गई है. संगठन में भी जिन लोगों ने अच्छा काम किया है, उन्हें भी नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया है. इनमें उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडे, बिहार के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय और महाराष्ट्र के प्रदेश अध्यक्ष रावसाहिब पाटिल दानवे शामिल हैं. इन तीनों प्रदेशों में भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया है.

सहयोगी दलों को सबक

भाजपा में यह बात पूरी तरह से स्थापित है कि सरकार और संगठन दोनों मामलों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निर्णय अंतिम होता है. लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल के लिए नरेंद्र मोदी ने जो टीम बनाई है, उसके जरिए उन्होंने सहयोगी दलों को यह सबक देने का काम किया है कि उनके लोगों को केंद्र सरकार में शामिल करने के बारे में भी अंतिम निर्णय उन्हीं का होगा. पहले उन्होंने हर सहयोगी दल के लिए एक मंत्री पद का फार्मूला बनाया, चाहे किसी की कितनी भी सीटें हों. 18 लोकसभा सांसदों वाली शिव सेना इसके लिए तैयार हो गई. लेकिन 16 सांसदों वाली जनता दल यूनाइटेड एक मंत्री पद पर तैयार नहीं हुई. पार्टी के सर्वेसर्वा नीतीश कुमार ने जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को यह कहा कि एक मंत्री पद मिलने की स्थिति में उनकी पार्टी बाहर से समर्थन करेगी तो भी भाजपा दबाव में नहीं आई और अंतत: जेडीयू का कोई भी सांसद मंत्री नहीं बन पाया.

छोटे सहयोगी दलों को तो नरेंद्र मोदी ने एक भी मंत्री पद नहीं दिया. अपना दल की अनुप्रिया पटेल पिछली सरकार में मंत्री थीं लेकिन इस बार न उन्हें और न ही उनकी पार्टी को केंद्र सरकार में जगह मिली. दो सांसदों वाले अकाली दल को केंद्र सरकार में जगह मिली. वहीं रिपब्लिकन पार्टी के रामदाव अठावले के बारे में भाजपा के लोग ये कह रहे हैं कि उन्हें इसलिए मंत्री बनाया गया कि इसी साल महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने हैं और अगर वे बाहर रह जाते तो अनावश्यक बयानों के जरिए विवाद खड़ा करते रहते. मोदी की नई टीम में उनके अलावा कुल 56 मंत्रियों ने शपथ ली है. इनमें सिर्फ चार सहयोगी दलों से हैं.

सांगठनिक बदलाव की आहट

नरेंद्र मोदी के नए मंत्रिमंडल के गठन से भाजपा के अंदर बड़े सांगठनिक बदलावों की आहट स्पष्ट तौर पर दिख रही है. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह सरकार में शामिल हो गए. इसका मतलब यह हुआ कि अगले कुछ महीनों में भाजपा को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना होगा. इसके लिए मोदी की पुरानी टीम में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री रहे जगत प्रकाश नड्डा और राजस्थान भाजपा के वरिष्ठ नेता ओमप्रकाश माथुर को प्रमुख दावेदार बताया जा रहा है.

भाजपा में चर्चा यह चल रही है कि अब जो भी नया अध्यक्ष बनेगा, वह एक तरह से संगठन के स्तर पर भी नई पीढ़ी को आगे लाने का काम करेगा. नए अध्यक्ष के साथ संगठन के स्तर पर जो नई टीम बनेगी, उसमें भी कई नए चेहरे प्रमुख भूमिकाओं में दिख सकते हैं. नरेंद्र मोदी ने भाजपा के तीन प्रदेश अध्यक्षों को अपनी टीम में जगह दी है. इसका मतलब यह हुआ कि आने वाले दिनों में इन तीन प्रदेशों में भी भाजपा को सांगठनिक बदलाव करने होंगे.