इतिहासकार बड़े निर्मम रहे हैं. कहा जाता है कि उन्होंने नूरजहां को उसका उचित श्रेय नहीं दिया वरना यह भी कहा जा सकता था कि छह महान मुग़लों और एक मुग़लिया रानी ने दुनिया भर में सल्तनत का परचम लहराया. नूरजहां जितनी ख़ूबसूरत थी, उतनी ही क़ाबिल भी. 16 साल तक उसने जहांगीर के नाम पर हिंदुस्तान की गद्दी संभाली. वह पहली मुग़ल रानी थी जिसके नाम से सिक्के गढ़वाए गए और शाही फ़रमान जारी हुए. वह बेहद निपुण शिकारी थी और उतनी ही शातिर भी. एक मौका तो ऐसा भी आया कि उसने अकेले ही जहांगीर को मौत से बचाया.

कहते हैं कि बाबर ने मरते वक़्त हुमायूं को सलाह दी थी कि अपने भाइयों के प्रति बैर न रखना, चाहे वे इस काबिल ही क्यों न हों. पर ऐसा हो नहीं पाया. हर बार तलवार के ज़ोर पर ही अगले बादशाह का ऐलान हुआ. नूरजहां ऐसी शातिर शासक कही जा सकती है जिसने सल्तनत के लिए भाइयों को आपस में लड़वा दिया और ख़ूनख़राबे की ऐसी लीक बनाई जिसकी इन्तेहा औरंगज़ेब ने की. यह सब जानने से पहले उसके बचपन से बात शुरू की जाए.

पैदा होते ही अनाथ होने से बची

ईरान का ग्यास्बेग अपने मुल्क में मुफ़लिसी के दिन गुज़ार रहा था. अकबर के दरबार में शरण पाने की उम्मीद लिए एक रोज़ उसने अपनी बेगम और दो बेटों के साथ हिंदुस्तान की ओर रुख किया. इसी दौरान कंधार में उसकी बीवी ने एक बच्ची को जन्म दिया. कहते हैं कि वे उसे छोड़ के जाने वाले ही थे कि एक रहगुजर ने ग्यास्बेग को ऐसा न करने की सलाह दी जिसे उसने मान लिया.

ग्यास्बेग को अकबर के दरबार में नौकरी मिली तो परिवार के दिन बदले. बेटी को मेहरुन्निसा का नाम दिया गया. जवानी आई तो खूबसूरत मेहरुन्निसा अकबर के बेटे सलीम यानी जहांगीर की उससे नज़रें चार हो गई. इसके पहले कि इश्क़ परवान चढ़ता, अकबर को ख़बर हो गई और ग्यास्बेग को हुक्म दिया गया कि वह अपनी बेटी की शादी करके उसे आगरा से दूर कर दे. ग्यास्बेग ने उसका निकाह शेर अफ़ग़ान से करवाया जिसे अकबर ने उसे वर्धवान की जागीर दी.

जहांगीर पर उसका प्रभाव

जब जहांगीर हिंदुस्तान की गद्दी पर बैठा तो शेर अफ़ग़ान की हत्या हो गई. कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यह जहांगीर के इशारे पर हुआ था. ख़ैर, बाद में जहांगीर ने मेहरुन्निसा को आगरा बुलवा लिया और 25 मई, 1611 को उससे निकाह कर लिया. उसने उसे नूरजहां (संसार की ज्योति) का ख़िताब दिया.

1616 में हिंदुस्तान आए ब्रिटिश अफ़सर थॉमस रो ने जहांगीर के शासनकाल को तीन साल तक नज़दीकी से देखा और बड़ी ईमानदारी से उसका बयान भी किया. उसके मुताबिक़ नूरजहां उस दौर की सबसे ताक़तवर शख्सियत थी. नूरजहां का यूं ताक़तवर हो जाना एक इत्तेफ़ाक़ नहीं था. वह ख़ूबसूरत थी और होशियार भी. 1620 के आसपास जहांगीर शराब और अफ़ीम की लत के चलते दमे का रोगी हो गया था. इस दौरान नूरजहां ने सल्तनत की बागड़ोर थामी.

शाहजहां को अपने भाई का दामाद बनाना

मल्लिका-ए-हिंदुस्तान बनने के एक साल बाद उसने मुग़लों और अपने वालिद ग्यासबेग के ख़ानदानों के बीच रिश्ते मज़बूत करने के लिए 1612 में अपने भाई असफ़ ख़ान की बेटी अर्जुमंद बानो (मुमताज महल) का निकाह शाहजहां से करवाया. नूरजहां को पहले शौहर से एक औलाद थी जिसका नाम लाड़ली बेगम था. नूरजहां के पिता तो पहले ही अकबर के काल में काबुल के दीवान थे. उसके भाई असफ़ ख़ान ने आगरा दरबार पर अपना कब्ज़ा किया हुआ था. इसको और मज़बूत करने के लिए 1620 में नूरजहां ने लाड़ली बेगम का निकाह जहांगीर के चौथे बेटे शहरयार से करवाया. जहांगीर ख़ुद अपने बेटे की बारात लेकर नूरजहां के मायके गया था.

नूरजहां ने अपने वालिद को एतमाउद्दौला का ख़िताब दिलवाया. 1625 में उसने अपने भाई असफ़ ख़ान को लाहौर का गवर्नर नियुक्त करवाया. बाद में उसे शाहजहां का मुख्यमंत्री बनवाया और उसके बेटे शाइश्ता ख़ान को औरंगज़ेब का मुख्य सलाहकार नियुक्त कराया. कुल मिलाकर, 70 सालों में ईरान से आया ग्यासबेग का परिवार मुग़लों के सबसे नज़दीक हो गया था. विडंबना देखिए कि मुग़लकाल के दो सबसे खूबसूरत मक़बरे किसी मुग़ल के नहीं बल्कि ईरान से आये इस परिवार के लोगों के हैं - एक, नूरजहां के वालिद एत्मादुदौला का और दूसरा उसकी भतीजी मुमताज महल का. एत्मादुदौला का मक़बरा नूरजहां ने बनवाया था और ताजमहल इसी मक़बरे की तर्ज़ पर बना है.

पहले शाहजहां को आगे बढ़ाया

ख़ुर्रम जहांगीर के बेटों में सबसे क़ाबिल था. ख़ुद अकबर ने उसकी तालीम में दिलचस्पी ले थी और उसके तेवर भी अपने दादा की मानिंद ही थे. नूरजहां के कहने पर ही जहांगीर ने ख़ुर्रम को बड़ी फौज दी थी. वहीं दूसरी तरफ़, उसने चित्तौड़ की चढ़ाई पर ख़ुर्रम को भेजने का सुझाव दिया जो बहुत कारगर हुआ. इसी प्रकार, दक्कन की जंगें भी शाहजहां की सरपरस्ती में लड़ी गई थीं.

जहांगीर ख़ुर्रम की दक्कन में कामयाबी से इतना ख़ुश हुआ था कि उसने दरबार में अपने सिंहासन के बगल में उसका सिंहासन लगवाया और उसे ‘शाहजहां’ के ख़िताब से नवाज़ा. ख़ुर्रम दक्षिण से 23 लाख 60 हज़ार रुपये वसूल करके लाया था. उसमें से दो लाख रुपये के उपहार ख़ुर्रम ने नूरजहां को दिए थे.

तो इस प्रकार हम देखते हैं कि नूरजहां सल्तनत की बागड़ोर संचालित कर रही थी और शाहजहां से भी उसके रिश्ते दुरुस्त थे. पर मोड़ तब आया जब सल्तनत का वारिस बनने की बात आई.

शाहजहां की दूसरी दक्कन पर चढ़ाई

1620 में जब शाहजहां लाहौर में था तो दक्कन में दोबारा विद्रोह उठ गया. इसे कुचलने के लिए नूरजहां ने जहांगीर को शाहजहां का नाम सुझाया. अहमदाबाद के निज़ाम का सेनापति मलिक अंबर था जो छापामार लड़ाई में पारंगत था. शाहजहां दोबारा दक्कन नहीं जाना चाहता था पर नूरजहां अब उसे जंगों में उलझाये रखना चाहती थी.

इतिहासकार लिखते हैं कि ख़ुद को बचाने के लिए शाहजहां अपने साथ बड़े भाई खुसरव को ले गया. अब इस बात पर सहमति नहीं है कि जहांगीर के ‘हां’ कहने पर नूरजहां की रज़ामंदी थी या नहीं. ऐसा लगता है कि नूरजहां चाहती थी कि खुसरव शाहजहां के साथ जाए ताकि उसके दामाद शहरयार को तख़्तनशीं करने में आसानी हो. शाहजहां को दक्कन में दोबारा सफलता मिली. उसने अब गद्दी हथियाने की ठान ली. इसके बाद उसने खुसरव की हत्या कर पहले रोड़े को हटाया.

शाहजहां की बग़ावत

इसी दौरान ईरान के शाह अब्बास ने कंधार पर चढ़ाई कर दी. फिर नूरजहां के कहने पर जहांगीर ने उसे दक्कन कंधार कूच करने का फ़रमान सुना दिया. शाहजहां पिछले 18 महीनों से दक्कन में था वहां उसने अपनी ताक़त काफ़ी बढ़ा ली थी. वह इसमें और इज़ाफ़ा करना चाहता था ताकि लगातार बिगड़ती तबीयत से अगर जहांगीर की मौत हो जाती है तो वह नूरजहां और शहरयार के ख़िलाफ़ मजबूती से लड़ सके. उसने दो शर्तें रखीं. पहली यह कि वह बरसातों के बाद ही कंधार जाएगा और दूसरी यह कि पंजाब की पूरी फ़ौज उसकी सरपरस्ती में लड़ेगी.

उधर, नूरजहां धीरे-धीरे शाहजहां की जागीरें शहरयार को हस्तांतरित करने लगी थी. उसने जहांगीर को यह भी समझाया कि शाहजहां की शर्तें सीधे-सीधे बग़ावत का ऐलान हैं. जहांगीर ने उसकी शर्तें न मानीं और उसे तुरंत ही कंधार आने का हुक्म सुना दिया जिसे शाहजहां ने नहीं माना.

जहांगीर आहत होकर अपने बेटे के ख़िलाफ़ ही लड़ने चल दिया. उसके साथ नूरजहां भी हो ली. पर शाहजहां से टक्कर लेना आसान न था. इसके लिए नूरजहां ने अपने धुर विरोधी मुग़ल सेनापति महाबत ख़ान से हाथ मिला लिया. उधर, शाहजहां ने दक्कन में अपने दुश्मन मलिक अम्बर, उदयपुर के राणा करण सिंह और असफ़ ख़ान (नूरजहां का भाई और उसका ससुर) को अपनी ओर कर लिया. यानी बहन और भाई अब मुग़लों को मोहरा मानकर शह और मात का खेल खेल रहे थे.

नूरजहां ने शाहजहां के बेटों को रख लिया.

चंद मुठभेड़ों में शाहजहां ने जान लिया कि मुग़लिया फ़ौज से लड़ना आसान नहीं होगा. उसने जहांगीर से संधि कर ली. पर बतौर गारंटी नूरजहां ने उसके दो बेटों औरंगज़ेब और दारा शिकोह को आगरा दरबार में बुलवा लिया. शाहजहां के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था. एक बार फिर नूरजहां जीत गई. इसके तुरंत बाद उसने महाबत ख़ान को बंगाल भिजवाकर रही सही कसर पूरी कर ली. इसी बीच जहांगीर के दूसरे बेटे परवेज़ की मौत हो गई. वह अब निश्चिंत थी कि शहरयार के बादशाह बनने में सारे रोड़े हट गए हैं. पर ऐसा न हो सका.

जहांगीर की मौत और ख़ूनी खेल

कुछ ही दिनों बाद राजौरी (कश्मीर) में जहांगीर की मौत हो गई. आगरा दरबार में उस वक़्त न शाहजहां था और न ही शहरयार. एक दक्कन था और दूसरा लाहौर. शहरयार ने लाहौर में ख़ुद को सम्राट घोषित करवा दिया और ख़ज़ाने और बाकी की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लिया.

उधर, शाही सेना के ज़्यादातर सिपहसलार शाहजहां की तरफ़ थे. लाहौर से 15 किलोमीटर दूर दोनों खेमों में जंग छिड़ गई. शाही सेना की कमान असफ़ ख़ान के हाथों में थी. शहरयार ज़्यादा देर नहीं टिक पाया. कुछ ही दिनों में उसे कैद कर लिया गया और लाहौर में शाहजहां को उसकी ग़ैरमौजूदगी में सम्राट घोषित कर दिया गया. बाद में शाहजहां ने शहरयार समेत सभी को मरवा दिया. विधवा नूरजहां लाचार थी. वह कुछ न कर सकी. बेटी को मल्लिका-ए-हिंदुस्तान बनाने का उसका ख्व़ाब अधूरा रह गया. उसके ही भाई, जिसे उसने इतना आगे बढ़ाया था, ने उसे सियासत में मात दे दी.

शाहजहां ने नूरजहां से कोई बदसुलूकी नहीं की और उसका रुआब बरकार रखा. पर नूरजहां ने उससे गुज़ारिश कर लाहौर में जहांगीर की कब्र के नज़दीक रहने की इजाज़त मांगी. लाड़ली बेगम और नूरजहां ने जीवन के अंतिम साल लाहौर में गुज़ारे.