तमिलनाडु के नेताओं ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के प्रस्तावों पर आपत्ति जाहिर की है. खबरों के मुताबिक द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की लोकसभा सांसद कनीमोझी ने कहा है कि उनकी पार्टी ऐसे किसी भी प्रस्ताव का विरोध करेगी. वहीं पार्टी नेता के शिवा ने इसे ‘आग से खेलने’ जैसा बताते हुए कहा, ‘अगर तमिलनाडु पर हिंदी थोपने की कोशिश की गई तो राज्य के लोग इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे. इसे रोकने के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी.’

इसी शुक्रवार को रमेश पोखरियाल निशंक ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री के तौर पर कार्यभार संभाला है. इसके बाद उन्हें डॉ कस्तूरीरंगन की अगुवाई वाली समिति की तरफ से नई एनईपी का ड्राफ्ट सौंपा गया. एनईपी के ड्राफ्ट में गैर हिंदी भाषी राज्यों के स्कूलों में हिंदी और अंग्रेजी के साथ कोई भी एक स्थानीय भाषा पढ़ाने का प्रस्ताव है. वहीं हिंदी भाषी क्षेत्रों के लिए हिंदी-अंग्रेजी के साथ किसी एक आधुनिक भारतीय भाषा को पढ़ाए जाने का प्रस्ताव दिया गया है.

इस पूरे मामले पर मक्कल निधि मय्यम (एमकेएम) के संस्थापक और अभिनेता कमल हासन का कहना है, ‘मैंने कई हिंदी फिल्मों में काम किया है लेकिन मैं नहीं समझता कि हिंदी को किसी पर थोपा जाना चाहिए. अगर किसी व्यक्ति की किसी भाषा में दिलचस्पी है तो वह उसे खुद सीख सकता है.’ वहीं पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) के संस्थापक एस रामदॉस ने भी शिक्षा नीति के इस प्रस्ताव को तमिलनाडु पर ‘थोपने’ जैसा बताया है. हालांकि इस मामले में विवाद बढ़ने पर निशंक की प्रतिक्रिया भी आ गई है. उन्होंने आश्वस्त किया है कि ‘किसी पर कोई भी भाषा नहीं थोपी जाएगी.’

वैसे यह पहला मौका नहीं है जब तमिलनाडु में हिंदी को लेकर विरोध देखने को मिला है. आजादी से पहले 1937 में भी इस पर विरोध जताया जा चुका है. तब वह विरोध 1940 तक चला था. इसके बाद 1965 में यह मुद्दा एक बार फिर उभरा था. उस वक्त इसे लेकर हुई हिंसा में कम से कम 70 लोगों की जान गई थी. इन परिस्थितियों में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गैर हिंदी भाषी राज्यों को हिंदी की अनिवार्य पढ़ाई से दूर रखने का भरोसा भी दिलाया था.