भारत के आम चुनाव के परिणाम जिन दिनों आ रहे थे, उन्हीं दिनों यूरोपीय संघ के सभी 28 देशों में संघ की यूरोपीय संसद के लिए चुनाव हो रहे थे. कुछ तो इस कारण भी भारत के चुनाव-परिणामों का वहां बिल्कुल नहीं या नाममात्र का उल्लेख मिलता है. लेकिन इस उपेक्षा की बड़ी वजह यह है कि ये नतीजे यूरोपीय मीडिया की चाह के विपरीत रहे. जिन गिनी-चुनी यूरोपीय पत्र-पत्रिकाओं या रेडियो-टेलीविज़न चैनलों ने कुछ कहना उचित समझा, उन सबने भी अपने देशों को लोकतंत्र का आदर्शरूप मानते हुए, लगभग एक स्वर में, ‘हिंदू नरेंद्र मोदी’ और उनकी पार्टी को आड़े हाथों लिया. ‘अल्पसंख्यकों’ की आड़ ले कर नरेंद्र मोदी पर प्रहार के उनके घिसे-पिटे तर्क ही नहीं , शब्द भी भारत के उस अंग्रेज़ी-भाषी मीडिया से उधार लिये गये लगते हैं, जो अपने देश को यूरोप-अमेरिका के काले चश्मे से देखने के कायल हैं.

2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तो भारत के ‘अल्पसंख्यकों’ के शुभचिंतक यूरोपीय मीडिया के कुछ दिग्गज इस चिंता से अधमरे हुए जा रहे थे कि भारत में अब ‘अल्पसंख्यकों’ के ख़ून की होली खेली जायेगी. भारत में ऐसा तो कुछ हुआ नहीं. जबकि यूरोप में हो रहे जिहादी आतंकवादी हमलों से परेशान खुद यूरोप की जनता और सरकारें अपने अल्पसंख्यकों पर शक-संदेह करने और उनके कान ऐंठने लगी हैं. आत्ममुग्ध यूरोपीय मीडिया अब अटकलें लगा रहा है कि नरेंद्र मोदी का बहुमत इतना प्रचंड और विपक्ष इतना दुर्बल है कि उन्हें एक तानाशाह बनते और भारत को एक ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाते देर नहीं लगेगी. इसी मीडिया को ‘हिंदू राष्ट्र’ होने में तब कोई बुराई नज़र नहीं आती थी, जब नेपाल एक ‘हिंदू राष्ट्र’ हुआ करता था.

‘हिंदू राष्ट्र’ और तानाशाही

समाचार एजेंसी ‘एसोसिएटेड प्रेस’ (एपी) के ‘हिंदू राष्ट्र’ और तानाशाही की ओर संकेत करते एक लेख के आधार पर ब्रिटिश दैनिक ‘गार्डियन’ ने लिखा, ‘68 वर्षीय मोदी ने बड़े यत्नपूर्वक अपनी एक धार्मिक पुरुष की, एक ऐसे संभावित मठवासी की छवि बनायी है, जो विश्व में भारत को गौरवशाली स्थान दिलाने के लिए राजनीति में आया है. उन्होंने संसदीय चुनावों को सामाजिक और आर्थिक प्रश्नों पर राजनैतिक पार्टियों के बीच प्रतिस्पर्धा के बदले अपनी व्यक्तिपूजा का विषय बना दिया है.’ यहां ‘धार्मिक पुरुष’ का तात्पर्य हिंदुत्व थोपने और ‘व्यक्तिपूजा’ का अर्थ (हिटलर या स्टालिन की तरह) तानाशाह बन जाने से है.

जिस किसी यूरोपीय मीडिया ने चुनाव-परिणामों का उल्लेख किया, उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के नाम के आगे हमेशा ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ विशेषण ज़रूर जोड़ा. ऐसा केवल भारत के प्रसंग में ही होता है, किसी अन्य देश के मामले में नहीं. किसी ईसाई, बौद्ध या मुस्लिम देश की पार्टी या नेता के नाम के साथ उसके धर्म का नाम नहीं जोड़ा जाता, वह चाहे जितना कट्टर राष्ट्रवादी हो. श्रोता, दर्शक या पाठक इसका यही अर्थ नहीं तो भला और क्या अर्थ लगायेंगे कि हिंदू शायद सबसे गये-गुज़रे, सबसे घृणित और ख़तरनाक़ लोग होते हैं!

‘राष्ट्रवादी’ होना निंदा का विषय

इसी प्रकार ‘राष्ट्रवादी’ होना भी यूरोप में निंदा का विषय है. ‘राष्ट्रवाद’ का अर्थ देशप्रेम नहीं, अंध-देशभक्ति या फ़ासीवाद (फ़ासिज़्म) जैसा हो गया है. यह शब्द सुनते ही हिटलर के अत्याचारों को याद किया जाने लगता है. दूसरी ओर, तथ्य यह भी है कि 26 मई के यूरोपीय संसद के चुनावों सहित यूरोप के सभी देशों के राष्ट्रीय या प्रादेशिक चुनावों में उन पार्टियों को मिल रहे वोटों का अनुपात निरंतर बढ़ रहा है, जो इस्लाम और यूरोपीय संघ की विरोधी घोर-दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी पार्टियां हैं. विडंबना यह है कि विश्व को ‘राष्ट्र-राज्य’ की अवधारणा देने वाला यूरोप आज स्वयं ही समझ नहीं पा रहा है कि यूरोपीय संघ की चूलें हिला रहे अपने ही इस मंत्र का अंत वह कैसे करे, क्योंकि दूसरों को राष्ट्रवादी कहने वाले स्वयं भी कुछ कम राष्ट्रवादी नहीं होते.

इसी प्रकार, जर्मनी सहित यूरोप के अनेक देशों में ऐसी दक्षिणपंथी पार्टियां अभी भी सत्ता में हैं या रह चुकी हैं, जो क्रिश्चियन (ईसाई) नाम वाली हैं. वे ईसाइयत को अपनी राष्ट्रीय अस्मिता का अभिन्न अंग मानती हैं. इस पर किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होती, वामपंथियों को भी नहीं. किंतु यही लोग भारत की बात उठते ही ‘हिंदू’ या ‘राष्ट्रवादी’ होने को निन्दात्मक बताने लगते हैं. हिंदू होने के नाते महात्मा गांधी भी आलोचना कर डालते हैं.

यूरोपीय संविधानों में ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द नहीं मिलता

इसी का प्रमाण देते हुए फ्रेंच समाचार एजेंसी ‘एफपी’ और जर्मन एजेंसी ‘डीपीए’ ने प्रचारित किया कि ‘आलोचक हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी (बीजेपी) पर आरोप लगाते हैं कि वह देश के 17 करोड़ मुसलमानों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करती है. नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में उन लोगों की संख्या बढ़ गयी, जिन्हें गाय काटने या गोमांस खाने के कारण पीट-पीट कर मार डाला गया. भारत के इतिहास और उसकी संस्कृति में मुसलमानों के योगदान को घटाने के लिए स्कूली पुस्तकों को फिर से लिखा गया.’

इस बात का कोई उल्लेख नहीं किया गया कि नरेंद्र मोदी के इसी कार्यकाल में सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए. समाचार एजेंसी रॉयटर्स की जून 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भीड़ द्वारा 2010 से (तब कांग्रेस की सरकार थी) जून 2017 तक गोमांस संबंधी पिटाई के कारण कुल 28 मौतें हुई थीं, जिनमें चार हिंदू भी थे. भारत को हमेशा उसके संविधान में लिखी ‘धर्मनिरपेक्षता’ (सेक्युलरिज़्म) की याद दिलायी जाती है. यह कभी नहीं कहा जाता कि चेक गणराज्य और फ्रांस को छोड़ कर यूरोप के किसी भी देश के संविधान में ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द है ही नहीं!

जनसंख्या और अर्थव्यवस्था की दृष्टि से जर्मनी यूरोप का सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण देश है और ‘देयर श्पीगल’ उसकी सबसे अधिक बिक्री वाली साप्ताहिक पत्रिका. उसके ऑनलाइन संस्करण का स्वर इस बार किंचित हट कर रहा. उसने लिखा, ‘(भारत का) राजनैतिक तानाबाना जातियों, भाषाओं और पार्टियों का इतना बड़ा घिच-पिच है कि कुछ भी समझ पाना मुश्किल हो जाता है. ऐसा शायद ही कुछ है, जो देश को एकता प्रदान करता हो. 68 साल के हिंदू राष्ट्रवादी नरेंद्र मोदी ठीक यही एकता ला रहे हैं.’

मोदी सरकार के सामाजिक उत्थान प्रयास

2014 के चुनाव के समय के कुछ वादों की याद दिलाते हुए ‘देयर श्पीगल’ ने लिखा, ‘ मोदी सरकार ने गत पांच वर्षों में दसियों लाख शौचालय बनवाये. लगभग सभी गांवों में बिजली पहुंचायी. गांवों में जीवन बेहतर बनाया. पूरे देश में एकसमान ‘जीसटी’ कर लागू किया... लेकिन, नौकरियों की अब भी भारी कमी है. खेती-किसानी करने वाले संकटग्रस्त हैं. बड़े-बड़े सुधार अब भी नदारद हैं. हिंदू राष्ट्रवादी बीजेपी भारतीयों के गर्व को, और कभी-कभी उनकी घृणा को भी बढ़ावा देती है.’

जर्मनी के सबसे बड़े सार्वजनिक रेडियो-टीवी प्रसारण नेटवर्क ‘एआरडी’ की वेबसाइट पर उसके संवाददाता ने नयी दिल्ली से लिखा, ‘68 वर्षीय मोदी अपने आप को आत्मसम्मान से भरपूर भारत का सबसे शक्तिशाली नेता बताने में सफल रहे हैं. वे राजनैतिक संवादकला के माहिर हैं. वे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तरह पत्रकार सम्मेलनों के बदले ट्विटर के द्वारा (सीधे जनता से) अपनी बात कहते हैं... उनकी जीवनी उनकी सफलता का अभिन्न हिस्सा है. वे एक ग़रीब घर से हैं. पिता के साथ चाय बेचा करते थे. इससे वे बहुत से लोगों को अपने क़रीबी और विश्वसनीय लगते हैं. जानने वाले बताते हैं कि वे बहुत परिश्रमी हैं, केवल चार घंटे सोते हैं. कोई व्यसन आदि नहीं है. योगाभ्यास करते हैं. कहते हैं, देशसेवा ही मेरा मिशन है.’

बाज़ारवादी अर्थव्यवस्था और नौकरियां

नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल के बारे में ‘एआरडी’ के संवाददाता का कहना है कि उसके परिणाम मिले-जुले क़िस्म के हैं. भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) सात प्रतिशत की गति से बढ़ा है, पर नौकरियां पैदा करने के अपने वादे मोदी पूरा नहीं कर सके. इस वादे की बात भारतीय मीडिया की तर्ज़ पर यूरोप के लगभग उस हर मीडिया ने उठायी है जिसने भारत के संसदीय चुनावों के बारे में कुछ कहने-लिखने का कष्ट किया. लेकिन, किसी ने एक बार भी याद नहीं किया कि रोज़गार के वादे तो यूरोप के चुनावों मे भी जी भर कर होते हैं. वे यदि निभाये गये होते या निभाये जा सकते, तो आज यूरोप के देशों में भी तीन से 30 प्रतिशत तक बेरोज़गारी नहीं होती. स्वयं जर्मनी में ही 15 प्रतिशत ग़रीबी और पांच प्रतिशत बेरोज़गारी है.

भारत की ही तरह यूरोप में भी उसी बाज़ारवादी स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का प्रचलन है, जिसमें सरकारें नहीं, बाज़ार में सक्रिय निवेशक और ग्राहक, मांग और पूर्ति के अनुसार नौकरियां बनाते या बिगाड़ते हैं. सरकारें केवल उन भूतपूर्व कम्युनिस्ट देशों में नौकरियां पैदा किया करती थीं, जहां स्वतंत्र नहीं, सरकार द्वारा नियोजित और नियंत्रित अर्थव्यवस्था हुआ करती थी. यही कारण है कि आज यूरोप के देशों में भी ग़रीबी और बेरोज़गारी बढ़ती गयी है. जहां बेरोज़गारी जितनी अधिक है, वहां राष्ट्रवादी पार्टियों की ओर से आप्रवासियों और शरणार्थियों को भगाने की मांगें भी उतनी ही उग्र हैं. ये विदेशी अधिकतर मुसलमान ही हैं.

निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स की सलाह

जर्मनी के प्रतिष्ठित दैनिक ‘फ्रांकफ़ुर्टर अल्गेमाइने त्साइटुंग’ के संवाददाता क्रिस्टोफ़ हाइन ने, मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के बारे में, चुनाव-परिणाम से पूर्व, सिंगापुर से एक अलग ही तस्वीर पेश की. उसने लिखा, ‘बाज़ार भारत सरकार को ज़ोरदार उठान दे रहे हैं. निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स पिछले पतझड़ के अपने आकलन को उलट कर शेयर ख़रीदने वालों को अब सलाह दे रहा है कि वे एशिया की इस तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के निवेशपत्र धड़ल्ले से ख़रीदें. भारत की तरफ़ प्रवाहित हो रहा विदेशी धन थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से भारत का सेंसेक्स शेयर-सूचकांक 60 प्रतिशत बढ़ जाने से निवेशक अब भारत की तरफ़ जा रहे हैं. मूल्य खो रहा भारतीय रूपया इस बीच अपने क्षेत्र की सबसे मज़बूत मुद्रा बन गया है.’

‘फ्रांकफ़ुर्टर अल्गेमाइने त्साइटुंग’ के इस संवाददाता ने यह भी लिखा कि इस बदलाव का ‘मोदी की नीतियों और तेल के भाव से सीधा संबंध है.... छह महीनों के भीतर ही गोल्डमैन सैक्स को अपना आकलन बदलना पड़ा.’ नरेंद्र मोदी जब 2014 में प्रधानमंत्री बने थे, तब इसी संवाददाता ने, भारतीय मीडिया की सुनी-सुनाई के आधार पर, मोदी का बहुत ही डरावना रूप वर्णित किया था. उन्हें ‘गोधरा का ज़ल्लाद’ बताया था और भविष्यवाणी की थी कि भारत में अब मुसलमानों का ख़ून बहाने की खुली छूट मिल जायेगी. आज वही क्रिस्टोफ़ हाइन मोदी की आर्थिक नीतियों की सराहना कर रहे हैं.

मोदी के कार्यकाल में डिजिटल क्रांति

भारी बहुमत के साथ मोदी की दुबारा विजय का रहस्य जानने के लिए जर्मनी के देशव्यापी सार्वजनिक सांस्कृतिक रेडियो ‘डोएचलांडफ़ुन्क-कुल्तुअर’ ने, नयी दिल्ली में जर्मनी के फ्रीड्रिश नाउमान प्रतिष्ठान’ के निदेशक राइनहार्ड माइनार्दुस के साथ एक इंटरव्यू प्रसारित किया. माइनार्दुस ने कई कारण बताये. एक तो यह कि ‘भारत ने मोदी के कार्यकाल में एक बहुत बड़े पैमाने की डिजिटल क्रंति होते देखा है. करोड़ों लोग डिजिटल नेटवर्क से जुड़े हैं....मोदी उन लोगों तक पहुंचने के लिए, जो पहले राजनीति में विशेष दिलचस्पी नहीं लेते थे, सोशल मीडिया का बहुत ही व्यावसायिक और रणनीतिक ढंग से उपयोग करते हैं, ... मोदी की पार्टी को कुल पड़े वोटों का 37 प्रतिशत मिलना भी भारत की (ब्रिटेन जैसी) चुनाव प्रणाली को देखते हुए एक मेगा (महा) सफलता है.’

इस सफलता का एक दूसरा प्रमुख कारण बताते हुए माइनार्दुस ने कहा, ‘था तो यह एक संसदीय चुनाव, पर बन गया एक राष्ट्रपतीय चुनाव. हमें जब-तब लगा, मानो हम अमेरिका में हैं. मोदी निर्विवाद रूप से इस आन्दोलन के मुखिया थे. वे ही भारत के निर्विवाद नेता हैं. ऊपर से उन्हें यह लाभ भी मिला कि विपक्ष का प्रदर्शन बहुत ही लचर था. वह अपना कोई साझा दावेदार तक नहीं पेश कर सका. लोगों को बहकाता रहा कि हम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री-पद का अपना दावेदार पेश करेंगे. राहुल गांधी बहुत कमज़ोर उम्मीदवार थे. उनकी कांग्रेस पार्टी अपनी ही परछाईं बन कर रह गयी है. इससे मोदी का काम और भी आसान बन गया.’

लोकतंत्र सब जगह ख़तरे में

नयी दिल्ली में जर्मनी के ‘फ्रीड्रिश नाउमान प्रतिष्ठान’ के निदेशक ने अन्य लोगों के इस कथन को भी दुहराया कि भारत के 20 करोड़ मुसलमान मोदी की भारी विजय से अपने आप को ‘हाशिये पर धकेल दिया गया’ अनुभव कर रहे हैं. माइनार्दुस को आशा थी कि चुनाव के बाद मोदी सबसे पहले यही कहेंगे कि वे ‘सभी भारतीयों के प्रधानमंत्री हैं.’ नवनिर्वाचित सांसदों को अपने पहले संबोधन में नरेंद्र मोदी ने यही कहा भी.

माइनार्दुस ने यह भी याद दिलाया कि लोकतंत्र सब जगह ख़तरे में है. उनका कहना था, ‘भारत तो केवल एक उदाहरण-भर है. भारत के जनसाधारण से बात करने पर आप पायेंगे कि उनकी प्रथमिकता यह नहीं है कि उन्हें राजनैतिक मामलों में सहनिर्णय का अधिकार चाहिये. उनकी प्रथमिकता है आर्थिक विकास, रोज़गार, सामजिक प्रगति. इन मामलों में मोदी ने बहुत कुछ किया है. बहुत-सी योजनाएं बनायी हैं. एक बड़े बहुमत को उन पर विश्वास भी है.’

भारत का महत्व महसूस क्यों नहीं होता

बर्लिन से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘देयर टागेसश्पीगल’ ने जर्मनी के ‘विज्ञान और राजनीति शोध प्रतिष्ठान’ के एशिया विशेषज्ञ क्रिस्टियान वागनर के साथ एक इंटरव्यू प्रकाशित किया. मुख्य प्रश्न था, ‘भारत में एक अरब से अधिक लोग हैं. उसकी आर्थिक विकासदर काफ़ी ऊंची है. वह एक परमाणु शक्ति भी है. हम भारत के महत्व को महसूस क्यों नहीं करते?’

अपने उत्तर में क्रिस्टियान वागनर ने कहा, ‘भारत के साथ एक बड़ी समस्या है. उसके पास वे चीज़ें, वे साधन नहीं हैं, जिनके द्वारा भारतीय नेता विश्व में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका को मूर्त रूप दे सकें. उसकी राजनयिक (डिप्लोमैटिक) सेवा में कुल क़रीब 900 लोग ही काम करते हैं. इतने लोग तो सिंगापुर के पास भी हैं. मात्र इतने लोगों से राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं साकार नहीं की जा सकतीं.’

क्षमता और महत्वाकांक्षा के बीच इस अंतर पर प्रकाश डालते हुए क्रिस्टियान वागनर ने आगे कहा, ‘भारत बनना तो चाहता है महाशक्ति, पर उसके साधनस्रोत एक मंझोली शक्ति जितने ही हैं. उसका आर्थिक विकास ज़ोरदार तो है, पर उसका आर्थिक आधार अपेक्षाकृत कमज़ोर है. संयुक्त राष्ट्र की विकास सूचकांक तालिका में भारत 130वें नंबर पर है. औद्योगीकरण इस समय थम-सा गया है.’

डॉ. वागनर का आगे कहना था, ‘मोदी सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों द्वारा विदेशी निवेश आकर्षित करने के प्रयास किये हैं. तब भी भारत का आर्थिक आधार इतना बड़ा नहीं बन पाया है कि वह विदेशनीति द्वारा अपने महत्व का आभास कराने में पैसा लगा सके. वैसे तो मोदी के नेतृत्व में भी भारत इस पृथ्वी पर सबसे बड़ा लोकतंत्र है. लेकिन वह इसे अपनी विदेशनीति द्वारा समझा नहीं पा रहा है. अमेरिका और यूरोप के साथ वह अपनी समानता को रेखांकित ज़रूर करता है,किंतु दक्षिण एशिया को छोड़ कर विश्व के अन्य क्षेत्रों में लोकतंत्र को बढ़ावा देना मोदी सरकार की महत्वाकांक्षाओं में शामिल नहीं है.’ क्रिस्टियान वागनर एशिया संबंधी मामलों में चांसलर अंगेला मेर्कल के सलाहकार भी हैं.

जीत बीजेपी की नहीं, मोदी की है

स्विट्ज़रलैंड में ज्यूरिच से प्रकाशित होने वाला ‘नोए त्स्युरिशर त्साइटुंग’ उन अपवादों में से एक था जिसने भाजपा और नरेंद्र मोदी की विजय पर एक समीक्षा प्रकाशित की. उसके समीक्षक का मत था, ‘मोदी चुनाव जीते, क्योंकि मुख्यतः ग़रीब और धर्मभीरु भारतीय (भारत में दोनों की संख्या करोड़ो में है) उनमें अपना मसीहा (उद्धारक) देखते हैं. वे इसलिए भी जीते कि बीजेपी पैसों की चिकनाई वाली एक ऐसी उच्चकोटि की आधुनिक मशीन है, जो चुनाव प्रचार के समय पूर्णतः मोदी के व्यक्तित्व पर केंद्रित थी. एक ‘थिंक टैंक’ द्वारा दिल्ली में किये गये एक मतसर्वेक्षण के अनुसार, यदि मोदी बीजेपी के मुख्य प्रत्याशी नहीं रहे होते, तो बीजेपी को वोट देने वाला हर तीसरा मतदाता किसी दूसरी पार्टी को वोट देता.’

समीक्षक का यह भी कहना था कि ‘मोदी के विरोधियों के पास उनके विरुद्ध चेतावनियां देने के सिवाय कुछ नहीं था... पश्चिमी देशों में मोदी को दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों का वह भाला बताया जाता है, जो दुनिया भर में लोकतंत्र की उपलब्धियों को बींध रहा है. यह तुलना सही नहीं है. मोदी डोनाल्ड ट्रंप से कहीं अधिक बुद्धिमान हैं. ट्रंप की लोकलुभावनी पकड़ प्रायः सांस थमा देने वाले अज्ञान की अकड़ होती है. मोदी (ब्राज़ील के राष्ट्रपति) जाइर बोल्सेनारो से कहीं बारीक सूझ-बूझ वाले व्यक्ति हैं. बोल्सेनारो लोकतंत्र के प्रति अपने दुर्भाव को छिपाते नहीं. मोदी एक ऐसे देश के नेता हैं, जो एर्दोआन के तुर्की से अधिक संघात्मक है और जिसके पास अब भी एक मुखर स्वतंत्र प्रेस है.’

अपने लोकतंत्र पर गर्व भारत की एकता का आधार

स्विस समीक्षक का आगे मत है कि इस सबसे अधिक भारत एक ऐसा देश है, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होना जिसके आत्मबोध का मूलाधार है. इस समीक्षक के शब्द हैं, ‘अपने लोकतंत्र पर गर्व ही भारतीयों के लिए इस क्षति की पूर्ति है कि वे आर्थिक प्रगति की दौड़ में अपने मुख्य प्रतिस्पर्धी चीन से पिछड़ गये हैं. अपने लोकतंत्र पर गर्व ही एक अरब 30 करोड़ लोगों, दर्जनों भाषाओं और अनगिनत अल्पसंख्यकों के इस देश को एकता के सूत्र में पिरोता है.’ यह सब जानने-कहने के बावजूद समीक्षक ने यह भी लिखा है कि नरेंद्र मोदी की विजय के बाद ‘हिंदू अतिवादियों का मन और बढ़ेगा ही’, मानो हिंदू ही भारत में समस्या की जड़ व एकमात्र अतिवादी हैं.

जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड के पड़ोसी फ्रांस के प्रतिष्ठित दैनिक ‘ले मोंद’ ने अपने अंतरराष्ट्रीय संस्करण में नरेंद्र मोदी को जी भर कर कोसा. उसने लिखा, ‘नरेंद्र मोदी ने अपने प्रबल अन्तर्ज्ञान से चुनाव को अपने बारे में जनमतसंग्रह-जैसा बना दिया. आक्रमण-चातुर्य द्वारा राज करने के इस माहिर ने अपने चुनावी भाषणों को उन भयों पर केंद्रित किया, जिनसे वह अपने आप को महान राष्ट्र-रक्षक के तौर पर पेश कर सके.

मोदी हिंदू हैं, इसलिए पाखंडी हैं

‘ले मोंद’ का मानना है कि नरेंद्र मोदी हिंदू हैं, इसलिए पाखंडी हैं. उसके शब्दों में ‘हिंदुओं का यह राष्ट्रवादी नेता, पांच वर्ष पूर्व, आजकल की विश्वव्यापी लोकलुभावन लहर पर चढ़ कर सत्ता में पहुंचने वालों में से एक हुआ करता था. आर्थिक प्रगति और सुधारों द्वारा उसने विकास की गति तेज़ करने और भारत को आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण इंजन बना देने का सब्ज़बाग़ दिखाया. भारतीय समाज में धार्मिक-राजनैतिक तनाव भरे अपने प्रथम जनादेश के अंत में इस प्रधानमंत्री का आर्थिक लेखाजोखा भी कांतिहीन ही है. (2017-18 में 6.7 प्रतिशत की) ध्यानाकर्षक विकासदर होते हुए भी 1.3 अरब निवासियों की क्षमता और आवश्यकता की दृष्टि से अब तक की सारी प्रगति अपर्याप्त ही कही जायेगी.’

फ्रांस के ही एक दूसरे नामी दैनिक ‘ले फ़िगारो’ ने ‘ले मोंद’ की अपेक्षा कुछ नरम भाषा को अपनाते हुए मूलतः वही बातें लिखीं, जो ‘ले मोंद’ ने भी लिखी हैं. लगता है, दोनों ने किसी समाचार एजेंसी, संभवतः ‘एएफ़पी’ की सामग्री को आधार बना कर अपना मत बनाया. ‘ले फ़िगारो’ की टिप्पणी की मुख्य भिन्नता यह रही कि उसने राहुल गांधी की भी चर्चा की. उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के संक्षिप्त उल्लेख के बाद लिखा, ‘(चुनाव प्रचार के) अंतिम महीनों में हिंदू राष्ट्रवादियों के (सड़क समतल करने वाले) स्टीम-रोलर ने उन्हें कुचल दिया. कई महत्वपूर्ण राज्यों में उन्हें कई झटके खाने पड़े. यहां तक कि राहुल गांधी अमेठी की अपनी पारिवारिक सीट भी नहीं बचा सके.’

स्पेनी दैनिक का संपादकीय

स्पेन का सबसे प्रमुख दैनिक ‘एल पाईस’ पश्चिमी यूरोप का संभवतः अकेला ऐसा अख़बार था, जिसने भारत के चुनाव-परिणाम पर एक लंबी रिपोर्ट के साथ एक ‘संपादकीय’ भी लिखा. शीर्षक था, ‘नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी ‘बीजेपी’ की चुनावी विजय ऐतिहासिक कही जा सकती है.’ इस ऐतिहासिकता के बारे में ‘एल पाईस’ का कहना था, ‘1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि भारत की किसी एक पार्टी को पुनः पूर्ण बहुमत मिला है. मतदान से मिली इस विजय का एक अरब 30 करोड़ जनसंख्या वाले इस एशियाई भीम की (राजनैतिक) स्थिरता के लिए असाधारण महत्व है. (भारत) इस समय विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अमेरिका तथा चीन के बाद वह तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है.’

इस भूमिका के बाद ‘एल पाईस’ ने ‘विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र’ के दुबारा बने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्मुख खड़ी चुनौतियों की याद दिलायीः’अपने दूसरे कार्यकाल में उनके सामने एक स्पष्ट दुविधा होगी. यह कि वे पूरी तरह आर्थिक विकास पर ध्यान देते हुए 100 नये हवाई अड्डों जैसी आधारभूत संरचनाओं के निर्माण पर बल दें... या आगजलाऊ सांप्रदायिकता को ठुकराते हुए एक ऐसे समाज का निर्माण करें, जो धार्मिक, जातीय और लैंगिक विभाजन से परे हो.’

मोदी ने भारत की नब्ज़ पढ़ ली है

‘एल पाईस’ का कहना है कि ‘आर्थिक नीति वाले निर्णय भी आसान नहीं होते. भारतीय अर्थव्यवस्था आर्थिक संकट के प्रभावों को अपने पर्यावरण की अपेक्षा कहीं बेहतर ढंग से झेल सकी है. समस्या है जनसंख्या वाली चुनौती. भारत संभवतः 2024 तक चीन की जनसंख्या से आगे बढ़ जायेगा. युवजनों का अनुपात काफ़ी बड़ा होगा. अभी ही 30 प्रतिशत से अधिक युवा बेरोज़गार हैं. भलीभांति शिक्षित या प्रशिक्षित नहीं हैं. दूसरी ओर है हिंदू राष्ट्रवाद वाले रास्ते का लालच. उस पर चलने से जनता के सबसे रूढ़िवादी हिस्से का अंधा समर्थन मिलता रहेगा. लेकिन, वह एक महाद्वीप जितने बड़े भारत को 21वीं सदी से भटका कर उसके सबसे हिंसक अतीत के अंधेरे में धकेल देगा.’

अपने संपादकीय के अंत में ‘एल पाईस’ ने निष्कर्ष निकालते हुए लिखा, ‘बीजेपी की लगातार दूसरी विजय दिखाती है कि नरेंद्र मोदी ने भारत की नब्ज़ पढ़ ली है. अपने प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी की तुलना में, जो नेहरू-वंश के सबसे युवा प्रतिनिधि हैं, गुजरात में चाय बेचने वाले एक पिता के पुत्र मोदी एक ऐसा साधारण आदमी हैं, जिसने स्वयं ही अपने आप को असाधारण बनाया है. संभावनावाद की खुली हुई किताब लिखी है... विशिष्ट एक बार फिर इस साधारण विश्वास के सामने हार गया है कि कम से कम भारतीयों के बीच हर कोई बराबर हो सकता है — धर्म, जाति या वर्ग चाहे कुछ भी हो.’