नरेंद्र मोदी की नई सरकार में जब एस जयशंकर को कैबिनेट मंत्री के तौर पर शपथ दिलाई गई तो बहुत लोगों को हैरानी हुई. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में भी उनके मंत्रिमंडल में प्रशासनिक या विदेश सेवा से लोग आए थे. लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य मंत्री का दर्जा दिया था. जयशंकर के कैबिनेट मंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद से ही यह चर्चा चल पड़ी कि उन्हें विदेश मंत्रालय दिया जा सकता है. ऐसा ही हुआ भी. जब मंत्रालयों का बंटवारा हुआ तो पता चला कि सुषमा स्वराज की जगह पर भारत के नए विदेश मंत्री एस जयशंकर होंगे.

हालांकि, कैबिनेट मंत्री के तौर पर एस जयशंकर के शपथ लेने के बाद भी भाजपा के कुछ लोगों को इसकी उम्मीद नहीं थी कि उन्हें विदेश मंत्रालय दिया जाएगा. आम तौर पर मंत्रालयों के बंटवारे में यह माना जाता है कोई अधिकारी अगर किसी खास क्षेत्र से है तो उसे उससे संबंधित मंत्रालय नहीं दिया जाता. इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि उसी क्षेत्र में पहले अधिकारी के तौर पर काम करने की वजह से उसे बतौर मंत्री काम करने में कई अड़चनें आ सकती हैं. यही नहीं, उसके अपने प्रिय लोगों को आगे बढ़ाने और अप्रिय लोगों के खिलाफ बदले की भावना से काम करने की आशंका बनी रहती है.

यही वजह थी कि भारत के सेनाध्यक्ष रहे वीके सिंह को कभी रक्षा मंत्रालय में नहीं रखा गया और गृह सचिव रहे राजकुमार सिंह को कभी गृह मंत्रालय में नहीं रखा गया. न ही विदेश सेवा के अधिकारी रहे हरदीप पुरी को कभी विदेश मंत्रालय में रखा गया. इन तीनों लोगों को ऐसे मंत्रालयों में रखा गया ​जिनसे इनका बतौर अधिकारी पहले कोई संबंध नहीं रहा हो.

लेकिन ऐसी आशंकाओं के उलट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एस जयशंकर को विदेश मंत्रालय सौंप दिया. इसके बाद से कई लोगों के मन में यह सवाल चल रहा है कि आखिर पर्दे के पीछे ऐसा क्या हुआ कि जयशंकर पहले तो सीधे कैबिनेट मंत्री बने और फिर उन्हें भारतीय विदेश सेवा का सेवानिवृत्त अधिकारी होने के बावजूद विदेश मंत्रालय सौंपा गया.

अब भाजपा नेता इस बारे में यह बता रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एस जयशंकर को मंत्री बनने का जो पहला प्रस्ताव दिया था, उसे उन्होंने खारिज कर दिया था. प्रधानमंत्री एस जयशंकर को विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाकर लाना चाहते थे. भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी रहे हरदीप सिंह पुरी और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे राजकुमार सिंह को भी मोदी सरकार में राज्यमंत्री के तौर पर ही शामिल किया गया था. सेनाध्यक्ष रहे वीके सिंह भी सरकार में राज्यमंत्री के तौर पर शामिल किए गए थे. इसी आधार पर यह माना जा रहा था कि अगर कोई सेवानिवृत्त अधिकारी सरकार में आता है तो उसकी शुरुआत राज्यमंत्री के स्तर से होनी चाहिए.

भाजपा नेताओं की मानें तो प्रधानमंत्री की शुरुआती योजना यह थी कि सुषमा स्वराज की जगह निर्मला सीतारमण को विदेश मंत्री बनाया जाए और उसमें एस जयशंकर राज्यमंत्री के तौर पर काम करें. कुछ समय बाद जरूरत के हिसाब से जयशंकर को कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता था. वित्त मंत्रालय में पीयूष गोयल को लाने की योजना थी.

लेकिन एस जयशंकर राज्यमंत्री के तौर पर सरकार में शामिल होने के लिए तैयार नहीं थे. भाजपा के एक नेता बताते हैं, ‘जहां तक मुझे पता है कि जयशंकर ने राज्यमंत्री बनने का प्रस्ताव ये कहते हुए खारिज किया कि वे बगैर किसी पद के ही विदेश मामलों में सरकार की मदद के लिए उपलब्ध रहेंगे. प्रधानमंत्री को उम्मीद रही होगी कि पहले भी बड़े पदों पर रहने वाले अधिकारी राज्यमंत्री के पद पर सरकार में आने को तैयार हुए हैं. इसलिए जयशंकर भी तैयार हो जाएंगे. उन्हें उम्मीद नहीं रही होगी कि जयशंकर इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर देंगे.’

भाजपा के ये नेता आगे कहते हैं, ‘ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री हर हाल में जयशंकर को सरकार में लाना चाहते थे. पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से इस बारे में प्रधानमंत्री की चर्चा हुई. उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से भी विचार-विमर्श किया. इसके बाद उन्होंने जयशंकर को कैबिनेट मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया जिस पर वे राजी हो गए. यानी एक तरह से कहें तो जयशंकर का इनकार उनके पक्ष में गया. प्रधानमंत्री को लगा होगा कि जयशंकर ईमानदार और काम करने वाले व्यक्ति हैं इसलिए वे राज्यमंत्री पद के लिए तैयार नहीं हो रहे. आम तौर पर सेवानिवृत्त अधिकारी सरकार में शामिल होने का प्रस्ताव इस तरह से नहीं ठुकराते जिस तरह से जयशंकर ने ठुकराया.’