आम चुनाव हो गए. नतीजे आ गए. चुनी हुई सरकार ने अपना कामकाज संभाल लिया है. लोकतंत्र में यह सामान्य प्रक्रिया है. लेकिन इस चुनाव के नतीजे सामान्य नहीं हैं. चुनाव परिणाम बताता है कि भारतीय राजनीति के लिहाज़ से इस बार का लोकसभा चुनाव असाधारण रहा है. भारतीय लोकतंत्र का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ है. एक नए अध्याय की शुरूआत होने जा रही है.

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और राष्ट्रनिर्माण का प्रयास भारतीय लोकतंत्र का पहला अध्याय है. यह वह दौर है जब भारत अपनी सभ्यता और संस्कृति की विरासत के साथ पश्चिमी नवजागरण के विचारों को आत्मसात करता है. भारत की आत्मा सगुण रूप लेती है. भारतीय गणराज्य और संविधान की स्थापना होती है. नेत्तृत्व के दृष्टिकोण से इस दौर को गांधी-नेहरू-पटेल-अंबेडकर मुख्य रूप से परिभाषित करते हैं.

भारतीय राजनीति का दूसरा अध्याय है राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का टूटकर एक परिवार की पार्टी में तब्दील हो जाना. यह वह दौर है जब भारत अधिनायकवाद से साक्षात्कार करता है. प्रतिरोध मुखर होता है. जनता प्रतिवाद करती है. लोकतंत्र की पुन: बहाली होती है. इस दौर को मुख्य रूप से परिभाषित करती हैं इंदिरा गांधी, जयप्रकाश नारायण और भारतीय जनमानस.

भारतीय लोकतंत्र के पहले अध्याय में नेतृत्व जनमानस बनाता है. भारत की आत्मा को जगाता है. दूसरे अध्याय में जनमानस उसी भारत की आत्मा को बचाता है. तीसरे अध्याय में भारतीय लोकतंत्र एक संक्रामक मोड़ लेता है. यह वह दौर है जब भारतीय राष्ट्रवाद और नैतिक नेतृत्व कमजोर पड़ता है. सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दो समानांतर धाराएं एक-दूसरे से संघर्ष करते हुए आगे बढ़ती हैं.

सामाजिक न्याय का रूपांतरण जातीय अस्मिता, जातिगत प्रतिनिधित्व और जातीय वर्चस्व के रूप में होता है. यह आगे जाकर और संकीर्ण होता है और परिवार विशेष में सिमटता जाता है. वहीं दूसरी तरफ़, कभी हाशिये पर रहा बहुसंख्यक हिंदू राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में हमारे सामने आता है. भारतीय लोकतंत्र का तीसरा अध्याय इन्हीं ताक़तों के परस्पर संघर्ष और समन्वय से परिभाषित होता है.

ऐसे में, साल 2019 का आम चुनाव सही मायने में असाधारण हो जाता है. इसके नतीजे भारतीय लोकतंत्र के तीसरे अध्याय की समाप्ति की उद्घोषणा करते हैं. इसके साथ ही तथाकथित सामाजिक न्याय का तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में विलय हो जाता है. और, हिंदू राष्ट्रवाद का एक चरण पूरा होता है.

यहां से भारतीय लोकतंत्र में एक नये अध्याय की शुरूआत होती है. हम संक्रमण काल से निकल कर एक ऐसी राह पर आगे बढ़ रहे है जहां भारतीय जनमानस भारत की आत्मा से दूर है. जिसमें नैतिक और भारतीय संविधान के मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाला नेतृत्व नहीं है. जिसमें न विकल्प है, न विपक्ष है और न ही वैकल्पिक विमर्श. इसमें हिंदू राष्ट्रवाद की राजनैतिक सत्ता है. और इस नये दौर के ध्वजावाहक हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और 21वीं सदी के राजनैतिक औजारों से लैस भारतीय जनता पार्टी.

क्या भारतीय लोकतंत्र इस स्थिति से बाहर निकलेगा? क्या राजनीति फिर से भारत की आत्मा से संवाद करने वाली राह पर चलेगी? क्या भारतीय जनमानस को उसी दिशा में ले जाने वाला कोई नेतृत्व उभरेगा? क्या भारतीय जनमानस ऐसे किसी नेतृत्व को उभारने या बढ़ावा देने का कोई प्रयास करेगा? इन्हीं सवालों में भारतीय लोकतंत्र का भविष्य छुपा है. आज भारत को एक नैतिक-वैकल्पिक विमर्श और राजनीति की ज़रूरत है.