देश की नई शिक्षा नीति के मसौदे में मेडिकल क्षेत्र के लिए कई बड़े सुझाव दिए गए हैं. इनमें नर्सिंग और दंत चिकित्सा (डेंटिस्ट्री) से जुड़े स्नातकों को लैटरल एंट्री व्यवस्था के तहत सीधे एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए दाखिला देने का प्रस्ताव शामिल है. अन्य महत्वपूर्ण सुझावों में दवा, नर्सिंग और दंत चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी परिषदों की भूमिका को नियंत्रित करना, निरीक्षण और आधिकारिक मान्यता देने का काम बाहरी (इम्पैनल्ड) एजेंसियों से कराना और सभी एमबीबीएस ग्रेजुएट्स के लिए कॉमन एक्जिट एग्जाम आयोजित करना शामिल है जो पीजी कोर्सों के लिए एंट्रेस एक्जाम का काम करेगा.

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक नई शिक्षा नीति मेडिकल क्षेत्र के मौजूदा मॉडल में बड़ा बदलाव करने के संकेत देती है. इसके मसौदे के मुताबिक विज्ञान विषय में स्नातक करने वाले सभी छात्रों के लिए मेडिकल कोर्स की एक या दो साल की पढ़ाई एक जैसी होनी चाहिए, ताकि उसके बाद वे तय कर सकें कि उन्हें एमबीबीएस, बीडीएस, नर्सिंग या मेडिकल क्षेत्र के किसी अन्य कोर्स में से किसकी पढ़ाई करनी है.

लेकिन लैटरल एंट्री का मतलब प्रवेश परीक्षा से छूट मिलना नहीं है. नई शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने में योगदान देने वाले डॉ देवी शेट्टी ने अखबार को बताया कि अगर नर्सिंग या डेंटिस्ट्री के छात्रों को एमबीबीएस में एडमिशन चाहिए तो पहले उन्हें नीट परीक्षा पास करनी होगी. लेकिन उसके बाद उसे एमबीबीएस कोर्स के शेष वर्ष ही पूरे करने होंगे. यानी अगर नर्सिंग कोर्स करने वाला कोई उम्मीदवार दो साल बाद एमबीबीएस करना चाहता है तो उसे पहले नीट पास करनी होगी, और फिर बाकी बचे तीन साल (अगर एमबीबीएस कोर्स पांच साल का है) ही एमबीबीएस की पढ़ाई करनी होगी.

वहीं, कोर्स की फीस और स्कॉलरशिप के मामले संबंधित संस्थानों पर छोड़ दिए जाएंगे, चाहे वे सरकारी हों या निजी. ड्राफ्ट में लिखा है कि संस्थानों को इस संबंध में अपने वादे पूरे करने होंगे और सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को स्कॉलरशिप देनी होगी.